भारत में 22 अस्पतालों के 1,507 हार्ट फेल्योर मरीजों पर हुई TIME-HF स्टडी में नर्स की अगुवाई वाले एक खास देखभाल मॉडल से बेहतर नतीजे सामने आए हैं। इस मॉडल में मोबाइल हेल्थ तकनीक, दवाओं को बेहतर तरीके से देना, नियमित निगरानी और मरीजों को अपनी देखभाल के बारे में जानकारी देना शामिल था। स्टडी में इस समूह के मरीज ज्यादा दिन तक जीवित रहे और अस्पताल से बाहर रहे।
भारत में 22 अस्पतालों के 1,507 हार्ट फेल्योर मरीजों पर हुई TIME-HF स्टडी में नर्स की अगुवाई वाले एक खास देखभाल मॉडल से बेहतर नतीजे सामने आए हैं। इस मॉडल में मोबाइल हेल्थ तकनीक, दवाओं को बेहतर तरीके से देना, नियमित निगरानी और मरीजों को अपनी देखभाल के बारे में जानकारी देना शामिल था। स्टडी में इस समूह के मरीज ज्यादा दिन तक जीवित रहे और अस्पताल से बाहर रहे।
अस्पताल में भर्ती होने का समय हुआ कम TIME-HF में हार्ट फेल्योर के उस रूप वाले मरीज शामिल थे जिसमें दिल की पंप करने की क्षमता कम हो जाती है, जिसे HFrEF कहा जाता है। मरीजों को दो समूहों में बांटा गया था। एक समूह को सामान्य इलाज मिला, जबकि दूसरे को नर्स की अगुवाई वाली collaborative care मिली।
नर्सों ने मोबाइल हेल्थ ऐप के जरिए मरीजों से लगातार संपर्क रखा। मरीज इस ऐप पर अपना ब्लड प्रेशर, नाड़ी, वजन और सांस फूलने जैसे लक्षण दर्ज कर सकते थे। अगर कोई जानकारी तय सीमा से बाहर जाती थी, तो नर्सों को अलर्ट मिल जाता था और वे मरीज की स्थिति के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकती थीं। स्टडी में इस देखभाल मॉडल से मरीजों के जीवित रहने और अस्पताल से बाहर बिताए दिनों की संख्या में करीब 8 प्रतिशत सुधार देखा गया। 24 महीने में intervention group के मरीजों में मृत्यु का जोखिम भी 22 प्रतिशत कम था।
दवाओं पर भी रहा खास ध्यान इस मॉडल का एक अहम हिस्सा guideline-directed medical therapy यानी GDMT को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करना था। मरीजों को दवाएं नियमित लेने, खान-पान, शारीरिक गतिविधि और तंबाकू व शराब छोड़ने के बारे में भी सलाह दी गई। अस्पताल से छुट्टी मिलने के 15 दिनों के भीतर intervention group के मरीजों को अतिरिक्त संपर्क या अपॉइंटमेंट दिया गया। इसका उद्देश्य दवाओं को सही तरीके से शुरू करना और इलाज को जल्दी बेहतर करना था।
24 महीने बाद चार तरह की GDMT दवाओं के पालन की दर intervention group में 37.3 प्रतिशत थी, जबकि सामान्य इलाज वाले समूह में यह 22.1 प्रतिशत रही। तीन तरह की GDMT के मामले में यह आंकड़ा क्रमशः 64.6 प्रतिशत और 58.6 प्रतिशत था।
ग्रामीण मरीजों के लिए भी मददगार मॉडल स्टडी में करीब 60 प्रतिशत मरीज ग्रामीण इलाकों से थे। शोधकर्ताओं के मुताबिक, नर्स की निगरानी और मोबाइल हेल्थ सिस्टम से मरीजों को हर बार कार्डियोलॉजिस्ट से मिलने के लिए लंबी यात्रा नहीं करनी पड़ी। नर्स फोन या मोबाइल सिस्टम के जरिए शुरुआती स्तर पर मरीज की समस्या समझ सकती थीं और यह तय कर सकती थीं कि किस मरीज को अस्पताल या डॉक्टर के पास व्यक्तिगत रूप से दिखाने की जरूरत है। हालांकि, इस मॉडल की एक बड़ी जरूरत स्मार्टफोन तक पहुंच है। जिन मरीजों के पास स्मार्टफोन नहीं है, उनके लिए इसे लागू करना मुश्किल हो सकता है, खासकर कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में।
इलाज के दौरान कुछ साइड इफेक्ट भी ज्यादा दिखे बेहतर दवा उपचार के साथ intervention group में कुछ adverse safety events ज्यादा देखे गए, खासकर उन मरीजों में जिन्हें चार तरह की GDMT दी गई थी। इनमें सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर 95 mm Hg से कम होना, किडनी की कार्यक्षमता में कमी, खून में पोटैशियम बढ़ना और हृदय की धड़कन कम होना शामिल था। स्टडी के विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि इस पूरे मॉडल को हर स्वास्थ्य व्यवस्था में लागू करना आसान नहीं होगा। इसमें नर्सों के साथ जरूरत पड़ने पर dietician, physiotherapist और psychologist जैसे दूसरे विशेषज्ञों की भी जरूरत पड़ सकती है।
स्टडी की कुछ सीमाएं भी हैं TIME-HF के नतीजे उत्साहजनक हैं, लेकिन शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने इसकी कुछ सीमाओं की ओर भी ध्यान दिलाया है। स्टडी में सभी पात्र मरीजों में से आधे से भी कम को शामिल किया गया था, इसलिए इन नतीजों को हर मरीज पर सीधे लागू करना सही नहीं होगा। इसके अलावा, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि बेहतर नतीजों के पीछे GDMT में सुधार, मोबाइल तकनीक, नर्सों की निगरानी या इन सभी चीजों का संयुक्त असर कितना था। स्टडी में इस मॉडल की cost-effectiveness और स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का भी आकलन नहीं किया गया।
TIME-HF के शोधकर्ताओं के अनुसार, यह स्टडी दिखाती है कि शुरुआती दौर में इलाज को तेजी से बेहतर करना और उसके बाद नर्सों की लगातार कम लागत वाली निगरानी HFrEF मरीजों के इलाज में मदद कर सकती है। हालांकि, इस मॉडल को अलग-अलग स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में लंबे समय तक और समान रूप से लागू करने के लिए अभी और अध्ययन की जरूरत है।
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