क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी CKD आज दुनिया की बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। The Lancet में प्रकाशित शोध-पत्रों की एक नई श्रृंखला के अनुसार, कई मरीजों में किडनी की बीमारी का समय पर पता नहीं चल पाता। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि CKD की शुरुआत में अक्सर कोई खास लक्षण नहीं दिखाई देते। जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक किडनी को काफी नुकसान हो चुका हो सकता है।
क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी CKD आज दुनिया की बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। The Lancet में प्रकाशित शोध-पत्रों की एक नई श्रृंखला के अनुसार, कई मरीजों में किडनी की बीमारी का समय पर पता नहीं चल पाता।
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि CKD की शुरुआत में अक्सर कोई खास लक्षण नहीं दिखाई देते। जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक किडनी को काफी नुकसान हो चुका हो सकता है।
दुनिया में करोड़ों लोग CKD से प्रभावित शोध के अनुसार, दुनियाभर में करीब 84.4 करोड़ वयस्क CKD से प्रभावित हैं। अनुमान है कि अगर इस बीमारी की रोकथाम और इलाज पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, तो वर्ष 2040 तक यह दुनिया में मौत का पांचवां सबसे बड़ा कारण बन सकती है।
सिंगापुर में करीब 14.9 प्रतिशत लोगों में CKD होने का अनुमान है। वहां समुदाय में इस बीमारी से प्रभावित करीब 70 प्रतिशत लोगों को शायद यह पता ही नहीं होता कि उन्हें किडनी की बीमारी है। इससे पता चलता है कि CKD का पता चलने से पहले ही बीमारी काफी समय तक शरीर में रह सकती है।
किडनी खराब होने पर भी लक्षण नहीं दिखते CKD में किडनी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। किडनी का काम खून से गंदगी और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालना है। लेकिन बीमारी के शुरुआती दौर में किडनी कमजोर होने के बावजूद व्यक्ति को कोई खास परेशानी महसूस नहीं हो सकती। यही कारण है कि कई लोग जांच नहीं कराते।
जब बीमारी बढ़ जाती है, तब शरीर में कई तरह की समस्याएं शुरू हो सकती हैं। गंभीर स्थिति में किडनी की काम करने की क्षमता बहुत कम हो सकती है और डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है।
सिर्फ ब्लड और यूरिन टेस्ट से हो सकती है पहचान CKD की शुरुआती जांच के लिए हमेशा बहुत महंगी या जटिल जांच की जरूरत नहीं होती।
साधारण ब्लड टेस्ट और यूरिन टेस्ट से किडनी की स्थिति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है। ब्लड टेस्ट से किडनी की कार्यक्षमता का पता लगाने में मदद मिलती है, जबकि यूरिन टेस्ट से पेशाब में प्रोटीन जैसे संकेत देखे जा सकते हैं।
इसी वजह से जोखिम वाले लोगों में समय-समय पर जांच कराना महत्वपूर्ण हो सकता है। किन लोगों को ज्यादा सावधान रहना चाहिए? कुछ लोगों में CKD का खतरा दूसरों की तुलना में ज्यादा हो सकता है।
इनमें खास तौर पर शामिल हैं: डायबिटीज वाले लोग हाई ब्लड प्रेशर वाले लोग मोटापे से परेशान लोग हृदय रोग वाले लोग परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास रखने वाले लोग
बढ़ती उम्र के लोग ऐसे लोगों में केवल लक्षण आने का इंतजार करने के बजाय डॉक्टर की सलाह से नियमित जांच पर ध्यान देना जरूरी हो सकता है। बीमारी का पता देर से चलने पर बढ़ सकता है खतरा अगर CKD का समय पर पता नहीं चलता और इलाज शुरू नहीं होता, तो किडनी की हालत धीरे-धीरे खराब हो सकती है।
गंभीर स्थिति में किडनी फेल्योर हो सकता है। इसके बाद मरीज को डायलिसिस की जरूरत पड़ सकती है और कुछ मामलों में किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता भी हो सकती है।
CKD का संबंध हृदय से जुड़ी बीमारियों और समय से पहले मृत्यु के बढ़े हुए खतरे से भी बताया गया है। डायबिटीज और हाई BP हैं बड़े जोखिम शोध में CKD से जुड़े कई कारणों और जोखिमों पर ध्यान दिया गया है। इनमें डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और हृदय रोग प्रमुख हैं।
उम्र बढ़ने के साथ भी CKD का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए जिन लोगों में ये जोखिम मौजूद हैं, उनके लिए समय पर जांच और बीमारी की निगरानी ज्यादा जरूरी हो सकती है।
महिलाओं और पुरुषों में भी अलग हो सकता है असर The Lancet की इस श्रृंखला में CKD से जुड़े लिंग आधारित अंतर पर भी चर्चा की गई है। शोधकर्ताओं ने बीमारी के अलग-अलग कारणों और इलाज के नए तरीकों पर भी ध्यान दिया है।
इसके साथ ही CKD की रोकथाम और इलाज के लिए अलग-अलग स्वास्थ्य सेवाओं के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई गई है। भविष्य में नई जांच तकनीकें भी मददगार हो सकती हैं। इनमें नए बायोमार्कर, जेनेटिक टेस्ट, किडनी बायोप्सी, डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शामिल हैं।
इन तकनीकों से बीमारी को ज्यादा सही तरीके से समझने और मरीज के हिसाब से इलाज तय करने में मदद मिल सकती है। सबसे जरूरी बात क्या है?
CKD की सबसे बड़ी समस्या यह है कि किडनी धीरे-धीरे खराब होने के बावजूद मरीज लंबे समय तक खुद को सामान्य महसूस कर सकता है। इसलिए बीमारी के लक्षण आने का इंतजार करना सही तरीका नहीं हो सकता, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें डायबिटीज, हाई BP, मोटापा, हृदय रोग या परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास है।
समय पर ब्लड और यूरिन टेस्ट से बीमारी का शुरुआती पता लगाने में मदद मिल सकती है। जल्दी पता चलने पर इलाज और जीवनशैली में जरूरी बदलावों के जरिए बीमारी की बढ़त को धीमा करने और किडनी फेल्योर के खतरे को कम करने की संभावना बढ़ सकती है। ध्यान रखें: अगर आप जोखिम वाली श्रेणी में आते हैं, तो नियमित जांच के बारे में डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।
किडनी की बीमारी, क्रॉनिक किडनी डिजीज, CKD, किडनी फेल्योर, किडनी की जांच, ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी स्वास्थ्य, किडनी रोग के लक्षण
kidney ki bimari, chronic kidney disease, CKD, kidney failure, kidney ki jaanch, blood test, urine test, diabetes, high BP, kidney health
किडनी की बीमारी का समय पर पता कैसे लगाएं, क्रॉनिक किडनी डिजीज की शुरुआती जांच, ब्लड और यूरिन टेस्ट से किडनी की जांच, डायबिटीज और हाई BP से किडनी की बीमारी का खतरा, शुरुआती स्टेज में किडनी की बीमारी के लक्षण, early detection of chronic kidney disease, kidney disease screening with blood and urine tests
किडनी, CKD, स्वास्थ्य, हेल्थ न्यूज, किडनी रोग, डायबिटीज, हाई BP, मेडिकल रिसर्च, NetGramNews, NetGram News
Disclaimer
Disclaimer :
Images are for illustrative purposes only and some editing of images done by using AI. अस्वीकरण: तस्वीरें केवल उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल की गई हैं। तस्वीरों में कुछ बदलाव या संपादन AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मदद से किया गया है।
Published by: Zoya. For newsroom standards, byline transparency, and correction requests, review our editorial standards and corrections policy.
Need to contact the newsroom directly? Email netgramnews@gmail.com or visit the team page.