भारतीय सेना ने जोधपुर में स्वदेशी लोइटरिंग म्यूनिशन ड्रोन ‘दिव्यास्त्र Mk-1’ का सफल ऑपरेशनल प्रदर्शन किया। लखनऊ स्थित स्टार्टअप Hoverit द्वारा विकसित यह ड्रोन लगभग 500 किमी रेंज, 5 घंटे की उड़ान क्षमता और 15 किलोग्राम पेलोड के साथ निगरानी तथा प्रिसिजन स्ट्राइक मिशन पूरा करने में सक्षम है। रेगिस्तानी परिस्थितियों और करीब 50 डिग्री तापमान में हुए परीक्षण के दौरान सिस्टम ने अपेक्षित प्रदर्शन किया। AI आधारित यह ड्रोन स्वॉर्म ऑपरेशन, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर जैसी आधुनिक तकनीकों से लैस है। सेना के लिए यह परीक्षण सीमावर्ती रेगिस्तानी इलाकों में निगरानी और सुरक्षा क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, साथ ही रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक और ‘मेक इन इंडिया’ को भी मजबूती देता है।
भारतीय सेना ने राजस्थान के जोधपुर सैन्य क्षेत्र में स्वदेशी लोइटरिंग म्यूनिशन सिस्टम ‘दिव्यास्त्र Mk-1’ का सफल ऑपरेशनल प्रदर्शन किया है। रेगिस्तानी परिस्थितियों में हुए इस फील्ड डेमो ने न केवल भारतीय सेना की आधुनिक युद्ध क्षमताओं को प्रदर्शित किया, बल्कि रक्षा क्षेत्र में देश की बढ़ती आत्मनिर्भरता को भी मजबूती दी है। लखनऊ स्थित रक्षा प्रौद्योगिकी स्टार्टअप Hoverit द्वारा विकसित इस प्रणाली का परीक्षण वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की मौजूदगी में किया गया।
1 जून को हुए इस प्रदर्शन की विस्तृत जानकारी अगले दिन सामने आई, जिसके बाद यह रक्षा क्षेत्र की प्रमुख चर्चित खबरों में शामिल हो गया। परीक्षण के दौरान ड्रोन को अलग-अलग सैन्य परिस्थितियों में परखा गया और इसकी निगरानी, लक्ष्य पहचान तथा सटीक हमले की क्षमता का मूल्यांकन किया गया।
दिव्यास्त्र Mk-1 को टैक्टिकल लोइटरिंग म्यूनिशन श्रेणी का प्लेटफॉर्म माना जाता है। सामान्य ड्रोन की तुलना में इसकी विशेषता यह है कि यह किसी क्षेत्र के ऊपर लंबे समय तक उड़ान भरते हुए निगरानी कर सकता है और लक्ष्य की पहचान होने पर स्वयं को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए उस पर सटीक हमला कर सकता है। आधुनिक युद्ध में इस तरह की प्रणालियां तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही हैं क्योंकि ये कम समय में वास्तविक समय की जानकारी और त्वरित कार्रवाई दोनों की सुविधा प्रदान करती हैं।
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रिपोर्टों के अनुसार इस प्लेटफॉर्म की ऑपरेशनल रेंज लगभग 500 किलोमीटर तक है। यह करीब पांच घंटे तक लगातार हवा में रह सकता है, जिससे सीमावर्ती इलाकों में लंबे समय तक निगरानी करना संभव हो जाता है। राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्रों जैसे जोधपुर, जैसलमेर और बाड़मेर के आसपास फैले विस्तृत भूभाग में ऐसी क्षमता सैन्य दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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परीक्षण के दौरान ड्रोन को व्हीकल-माउंटेड मोबाइल लॉन्चर से कई बार उड़ान भरवाई गई। सेना ने इसके जरिए इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) मिशनों के साथ-साथ प्रिसिजन स्ट्राइक प्रोफाइल की भी जांच की। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक परीक्षण के समय तापमान लगभग 50 डिग्री सेल्सियस के आसपास था और तेज गर्म हवाएं चल रही थीं। इन कठिन परिस्थितियों में भी सिस्टम ने निर्धारित मानकों के अनुरूप प्रदर्शन किया। तकनीकी दृष्टि से दिव्यास्त्र Mk-1 कई आधुनिक सुविधाओं से लैस है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन क्षमता दी गई है, जिससे लक्ष्य पहचान और मिशन प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके अलावा इसमें स्वॉर्म ऑपरेशन की सुविधा भी मौजूद है। इसका अर्थ है कि एक साथ कई ड्रोन को समन्वित तरीके से संचालित किया जा सकता है, जिससे बड़े क्षेत्र की निगरानी और जटिल सैन्य अभियानों को अंजाम देना आसान हो जाता है। ड्रोन में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर लगाए गए हैं, जो दिन और रात दोनों परिस्थितियों में लक्ष्य की पहचान करने में मदद करते हैं। कम्युनिकेशन रिले सिस्टम की मौजूदगी इसे दूरस्थ इलाकों में भी उपयोगी बनाती है। इसकी 15 किलोग्राम तक पेलोड ले जाने की क्षमता इसे विभिन्न प्रकार के वारहेड के साथ इस्तेमाल करने की सुविधा देती है। यही वजह है कि इसे उच्च प्राथमिकता वाले लक्ष्यों पर सटीक कार्रवाई के लिए उपयोगी माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक के विकास पर विशेष ध्यान दिया है। ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन को भविष्य के युद्ध का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी, घुसपैठ रोकने और त्वरित कार्रवाई के लिए इन प्रणालियों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक सैन्य उपकरणों के साथ ऐसे स्मार्ट प्लेटफॉर्म युद्धक्षेत्र में नई रणनीतिक बढ़त प्रदान कर सकते हैं।
यूक्रेन-रूस संघर्ष के दौरान भी दुनिया ने देखा कि लोइटरिंग म्यूनिशन और छोटे ड्रोन आधुनिक युद्ध के स्वरूप को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं। अपेक्षाकृत कम लागत वाले लेकिन अत्यधिक प्रभावी ये सिस्टम निगरानी और हमले दोनों कार्यों को एक साथ अंजाम देने में सक्षम होते हैं। इसी वैश्विक बदलाव को देखते हुए भारत भी स्वदेशी समाधान विकसित करने पर जोर दे रहा है।
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दिव्यास्त्र Mk-1 की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसका उच्च स्वदेशीकरण स्तर बताया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसमें लगभग 95 प्रतिशत तक स्वदेशी सामग्री और तकनीक का उपयोग किया गया है। इससे विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम करने और घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है। साथ ही यह देश के उभरते रक्षा स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए भी एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
सीमावर्ती क्षेत्रों के संदर्भ में देखें तो ऐसी प्रणालियां निगरानी क्षमता को मजबूत कर सकती हैं। लंबी दूरी तक उड़ान भरने और लंबे समय तक सक्रिय रहने की क्षमता के कारण सीमा पार गतिविधियों, संदिग्ध मूवमेंट और छोटे ड्रोन के जरिए होने वाली अवैध गतिविधियों पर नजर रखना अधिक प्रभावी हो सकता है। इससे सुरक्षा एजेंसियों को तेजी से निर्णय लेने में सहायता मिलेगी।
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हालांकि किसी भी नई सैन्य प्रणाली को बड़े पैमाने पर शामिल करने से पहले विस्तृत परीक्षण, संचालन संबंधी मूल्यांकन और लॉजिस्टिक तैयारियों की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। रखरखाव व्यवस्था, प्रशिक्षण और उत्पादन क्षमता जैसे पहलुओं की भी जांच की जाती है। दिव्यास्त्र Mk-1 का यह सफल प्रदर्शन उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
जोधपुर में हुए इस परीक्षण ने यह संकेत दिया है कि भारतीय सेना भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप नई तकनीकों को तेजी से अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। स्वदेशी रक्षा तकनीक, लंबी दूरी की निगरानी क्षमता और सटीक हमले की सुविधा को मिलाकर विकसित किया गया यह प्लेटफॉर्म आने वाले समय में भारतीय सैन्य क्षमताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
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Images are for illustrative purposes only and some editing of images done by using AI.
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3 जून 2026