यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) के नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि तेजी से बढ़ रहे रॉकेट लॉन्च और सैटेलाइट मेगाकॉन्स्टेलेशन पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। शोध के अनुसार, 2029 तक अंतरिक्ष क्षेत्र के कुल जलवायु प्रभाव का लगभग 42% हिस्सा इन मेगाकॉन्स्टेलेशन से जुड़ा हो सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि रॉकेटों से निकलने वाली कालिख ऊपरी वायुमंडल में लंबे समय तक बनी रहती है और सामान्य प्रदूषण की तुलना में जलवायु पर कहीं अधिक असर डाल सकती है। फिलहाल प्रभाव सीमित है, लेकिन विशेषज्ञ समय रहते नियमन और निगरानी की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।
एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि इंटरनेट उपलब्ध कराने वाली विशाल सैटेलाइट प्रणालियों और लगातार बढ़ते रॉकेट लॉन्च पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल पर असर डाल रहे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि 2029 तक अंतरिक्ष क्षेत्र से होने वाले कुल जलवायु प्रभाव का बड़ा हिस्सा मेगाकॉन्स्टेलेशन सैटेलाइटों से जुड़ी गतिविधियों के कारण हो सकता है। फिलहाल प्रभाव सीमित है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि समय रहते निगरानी और नियमन की जरूरत है।
अंतरिक्ष उद्योग पिछले कुछ वर्षों में जिस गति से बढ़ा है, उसने वैज्ञानिकों का ध्यान केवल तकनीकी उपलब्धियों की ओर ही नहीं बल्कि पर्यावरणीय प्रभावों की ओर भी खींचा है। कभी रॉकेट लॉन्च अपेक्षाकृत दुर्लभ घटनाएं हुआ करती थीं और उनका पर्यावरण पर असर बेहद सीमित माना जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। दुनिया भर में इंटरनेट सेवाओं के विस्तार के लिए हजारों सैटेलाइट पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजे जा रहे हैं और इनके साथ रॉकेट लॉन्च की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन में पाया गया है कि रॉकेट लॉन्च, अंतरिक्ष में छोड़े गए रॉकेट हिस्सों और अपने जीवनकाल के अंत में वायुमंडल में जलकर खत्म होने वाले सैटेलाइटों से निकलने वाला प्रदूषण धीरे-धीरे ऊपरी वायुमंडल में जमा हो रहा है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहे तो 2029 तक मेगाकॉन्स्टेलेशन सैटेलाइट प्रणालियां अंतरिक्ष क्षेत्र से होने वाले कुल जलवायु प्रभाव का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा बन सकती हैं।
यह अध्ययन जर्नल Earth’s Future में प्रकाशित हुआ है। इसमें 2020 से 2022 के बीच के उत्सर्जन का विश्लेषण किया गया और फिर दशक के अंत तक संभावित प्रभावों का आकलन किया गया।
शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष ब्लैक कार्बन यानी कालिख (सूट) से जुड़ा है। सामान्य परिस्थितियों में वाहनों, कारखानों या अन्य औद्योगिक स्रोतों से निकलने वाली कालिख पृथ्वी के निचले वायुमंडल में रहती है और बारिश तथा मौसम संबंधी प्रक्रियाओं के कारण धीरे-धीरे साफ हो जाती है। लेकिन रॉकेटों के मामले में स्थिति अलग है।
रॉकेट अपनी उड़ान के दौरान कालिख और अन्य कणों को वायुमंडल की बहुत ऊंची परतों तक पहुंचा देते हैं। इन ऊंचाइयों पर हवा की गति धीमी होती है और प्राकृतिक सफाई की प्रक्रियाएं भी कम प्रभावी होती हैं। नतीजतन, ये कण वर्षों तक वहां बने रह सकते हैं।
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अध्ययन के अनुसार, ऊपरी वायुमंडल में छोड़ी गई कालिख जलवायु को प्रभावित करने के मामले में पृथ्वी की सतह के पास छोड़ी गई कालिख की तुलना में लगभग 540 गुना अधिक प्रभावी हो सकती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक इस विषय को गंभीरता से देख रहे हैं, भले ही कुल उत्सर्जन अभी अन्य बड़े औद्योगिक स्रोतों की तुलना में काफी कम हो।
अध्ययन के प्रमुख लेखक कॉनर बार्कर ने कहा कि रॉकेट लॉन्च प्रदूषण का एक अनोखा स्रोत हैं क्योंकि वे सीधे वायुमंडल की ऊपरी परतों में रसायन पहुंचाते हैं। उनके अनुसार यह पृथ्वी के उन क्षेत्रों में से एक है जो अभी तक अपेक्षाकृत स्वच्छ माने जाते हैं।
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दिलचस्प बात यह है कि इस कालिख का प्रभाव केवल तापमान बढ़ाने तक सीमित नहीं है। शोधकर्ताओं ने पाया कि रॉकेटों से निकलने वाले कुछ कण सूर्य के प्रकाश का एक हिस्सा रोक सकते हैं, जिससे पृथ्वी की सतह पर हल्का शीतलन प्रभाव दिखाई दे सकता है। पहली नजर में यह वैश्विक तापमान वृद्धि के दौर में सकारात्मक लग सकता है, लेकिन वैज्ञानिक इसे समाधान नहीं मानते।
UCL की प्रोफेसर एलोइस मराइस ने इसे “एक छोटे पैमाने का अनियमित भू-इंजीनियरिंग प्रयोग” बताया है। भू-इंजीनियरिंग उन तकनीकों को कहा जाता है जिनका उद्देश्य जानबूझकर पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित करना होता है। उदाहरण के लिए, कुछ वैज्ञानिक अवधारणाओं में सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने के लिए समताप मंडल में कण छोड़ने का विचार शामिल है।
लेकिन मौजूदा स्थिति अलग है। यहां कोई सरकार या संस्था जलवायु को नियंत्रित करने के लिए ऐसा नहीं कर रही, बल्कि अंतरिक्ष उद्योग की तेजी से बढ़ती गतिविधियां अनजाने में ऐसा प्रभाव पैदा कर रही हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ऊपरी वायुमंडल में मौजूद कालिख एक तरफ पृथ्वी की सतह को थोड़ा ठंडा कर सकती है, जबकि दूसरी ओर ऊपरी परतों को गर्म भी कर सकती है। इस तरह के मिश्रित प्रभावों के दीर्घकालिक परिणाम अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।
वैज्ञानिकों की चिंता का एक बड़ा कारण सैटेलाइट मेगाकॉन्स्टेलेशन हैं। ये हजारों छोटे सैटेलाइटों के समूह होते हैं जो पृथ्वी की कक्षा में मिलकर वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क बनाते हैं।
सबसे चर्चित उदाहरण स्टारलिंक है, जिसे स्पेसएक्स संचालित करता है। रिपोर्ट के अनुसार, स्टारलिंक के 10,000 से अधिक सैटेलाइट पहले ही कक्षा में मौजूद हैं। इसके अलावा अमेजन का प्रोजेक्ट कुइपर और चीन की गुओवांग जैसी योजनाएं भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं।
इन नेटवर्कों का उद्देश्य दूरदराज के इलाकों तक इंटरनेट पहुंचाना है। जहां पारंपरिक फाइबर या मोबाइल नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है, वहां सैटेलाइट इंटरनेट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन इस मॉडल की एक कीमत भी है। बड़ी संख्या में सैटेलाइट भेजने पड़ते हैं और समय-समय पर पुराने सैटेलाइटों को बदलना भी पड़ता है। इसका मतलब है अधिक रॉकेट लॉन्च और अधिक पुनःप्रवेश (री-एंट्री)।
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UCL के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में दुनिया भर में 114 रॉकेट लॉन्च हुए थे। 2025 तक यह संख्या बढ़कर 329 पहुंच गई। इस वृद्धि में स्पेसएक्स के फाल्कन-9 रॉकेटों की बड़ी भूमिका रही है।
फाल्कन-9 में इस्तेमाल होने वाला ईंधन केरोसीन आधारित है, जो दहन के दौरान कालिख उत्पन्न करता है। जैसे-जैसे लॉन्च बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे यह उत्सर्जन भी बढ़ रहा है।
अध्ययन का अनुमान है कि 2029 तक अंतरिक्ष उद्योग हर साल लगभग 870 टन कालिख वायुमंडल में छोड़ सकता है। शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना ब्रिटेन की सभी यात्री कारों से एक वर्ष में निकलने वाली कालिख के बराबर बताई है। हालांकि वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि अंतरिक्ष उद्योग अभी भी वैश्विक जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण नहीं है। जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन, परिवहन और भारी उद्योगों की तुलना में इसका योगदान बहुत छोटा है। लेकिन चिंता का विषय उत्सर्जन की मात्रा नहीं बल्कि उसका स्थान है।
जब प्रदूषण सीधे ऊपरी वायुमंडल में पहुंचता है तो उसके प्रभाव अपेक्षाकृत लंबे समय तक बने रह सकते हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहते।
शोध में ओजोन परत पर संभावित प्रभावों का भी अध्ययन किया गया। ओजोन परत पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है। रॉकेट लॉन्च और वायुमंडल में जलने वाले सैटेलाइट ऐसे रसायन और कण छोड़ सकते हैं जो ओजोन रसायन विज्ञान को प्रभावित करते हैं। फिलहाल शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 2029 तक सभी रॉकेट लॉन्च मिलकर वैश्विक ओजोन में लगभग 0.02 प्रतिशत की कमी ला सकते हैं। यह आंकड़ा उन पदार्थों की तुलना में बहुत कम है जिन्हें मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत नियंत्रित किया गया था और जिनसे लगभग 2 प्रतिशत ओजोन क्षरण जुड़ा था।
फिर भी वैज्ञानिक इसे पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानते। उनका कहना है कि वर्तमान अनुमान वास्तविक स्थिति से कम भी हो सकते हैं क्योंकि लॉन्च गतिविधियां उनकी शुरुआती गणनाओं से अधिक तेजी से बढ़ रही हैं।
इससे पहले 2024 में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन ने भी चेतावनी दी थी कि वायुमंडल में जलकर खत्म होने वाले सैटेलाइट एल्युमिनियम ऑक्साइड के सूक्ष्म कण पैदा करते हैं। ये कण ओजोन को सीधे नष्ट नहीं करते, लेकिन ऐसी रासायनिक प्रतिक्रियाओं को बढ़ावा दे सकते हैं जो ओजोन परत को कमजोर करती हैं।
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उस अध्ययन में अनुमान लगाया गया था कि यदि प्रस्तावित सैटेलाइट नेटवर्क पूरी तरह स्थापित हो जाते हैं तो हर साल सैकड़ों टन एल्युमिनियम आधारित कण वायुमंडल में पहुंच सकते हैं।
अंतरिक्ष गतिविधियों से जुड़ी चिंताएं केवल जलवायु और ओजोन तक सीमित नहीं हैं। खगोलविद लंबे समय से सैटेलाइटों की बढ़ती संख्या पर चिंता जता रहे हैं। हजारों सैटेलाइट रात के आकाश में प्रकाश प्रदूषण बढ़ाते हैं और दूरबीनों से होने वाले वैज्ञानिक अवलोकनों में बाधा डालते हैं।
कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि सैटेलाइट रेडियो खगोल विज्ञान को प्रभावित करने वाले संकेत उत्सर्जित कर सकते हैं। इससे ब्रह्मांड के दूरस्थ स्रोतों से आने वाले कमजोर रेडियो संकेतों का अध्ययन कठिन हो जाता है। इन सभी चुनौतियों के बीच वैज्ञानिकों का मुख्य संदेश यह है कि अभी कार्रवाई का समय है। उनका कहना है कि वर्तमान प्रभाव सीमित हैं और यही वह चरण है जब उचित नियम और मानक बनाकर भविष्य की समस्याओं को रोका जा सकता है।
प्रोफेसर मराइस के अनुसार, अभी स्थिति इतनी गंभीर नहीं हुई है कि उसे नियंत्रित न किया जा सके। लेकिन यदि अंतरिक्ष उद्योग की वृद्धि इसी गति से जारी रहती है और नियमन पीछे रह जाता है, तो बाद में सुधार करना कहीं अधिक कठिन हो सकता है।
अंतरिक्ष मानव प्रगति का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। सैटेलाइट इंटरनेट, मौसम पूर्वानुमान, संचार, आपदा प्रबंधन और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे अनेक क्षेत्रों में इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। लेकिन नए अवसरों के साथ नई जिम्मेदारियां भी आती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि अंतरिक्ष गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों को शुरुआत से ही समझना और उनका आकलन करना जरूरी है। अभी तक चर्चा का केंद्र मुख्य रूप से रॉकेटों की लागत, तकनीक और व्यावसायिक संभावनाएं रही हैं, जबकि ऊपरी वायुमंडल पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा है।
नए अध्ययन ने इस विषय को फिर से केंद्र में ला दिया है। संदेश स्पष्ट है—अंतरिक्ष भले ही विशाल और खाली दिखाई देता हो, लेकिन वहां होने वाली मानवीय गतिविधियों के निशान पृथ्वी के वातावरण तक पहुंच रहे हैं। जैसे-जैसे हजारों नए सैटेलाइट कक्षा में पहुंचेंगे, उन निशानों का असर भी बढ़ सकता है। वैज्ञानिक चाहते हैं कि इस बदलाव को समय रहते समझा जाए ताकि तकनीकी प्रगति और पर्यावरणीय संतुलन के बीच उचित संतुलन बनाया जा सके।
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3 जून 2026