जोधपुर AIIMS ने गंभीर मरीजों के इलाज के लिए “ओपन केयर ज़ोन” मॉडल शुरू किया है, जहां ICU निगरानी के साथ मरीजों को खुली हवा और प्राकृतिक धूप दी जा रही है। अस्पताल का मानना है कि इससे मरीजों की मानसिक और शारीरिक रिकवरी पहले से बेहतर हो सकती है।
राजस्थान के जोधपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी AIIMS जोधपुर ने गंभीर मरीजों के इलाज में एक नया और अनोखा प्रयोग शुरू किया है। अस्पताल प्रशासन ने ICU इलाज को सिर्फ बंद कमरों तक सीमित रखने के बजाय अब “ओपन केयर ज़ोन” मॉडल पर काम शुरू किया है। इस पहल के तहत कुछ चुनिंदा मरीजों को ICU स्तर की निगरानी के साथ खुले वातावरण, प्राकृतिक धूप और ताज़ी हवा में समय बिताने का मौका दिया जा रहा है।
अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक बंद ICU कमरों में रहने वाले मरीजों पर मानसिक दबाव बढ़ जाता है। कई मरीज तनाव, घबराहट, नींद की कमी और अकेलेपन जैसी समस्याओं का सामना करते हैं। ऐसे में मरीजों को नियंत्रित और सुरक्षित माहौल में कुछ समय खुले वातावरण में रखने से उनकी मानसिक स्थिति बेहतर होती है, जिसका असर उनकी रिकवरी पर भी दिखाई देता है। AIIMS जोधपुर की यह पहल इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि भारत में सरकारी अस्पतालों में ICU देखभाल को लेकर अक्सर मशीनों और तकनीक पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है, जबकि मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक स्थिति पर कम चर्चा होती है। अब अस्पताल मरीजों की रिकवरी को केवल दवाइयों और मशीनों तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि “होलिस्टिक हीलिंग” यानी संपूर्ण देखभाल की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
जानकारी के मुताबिक, अस्पताल ने ऐसे मरीजों को इस मॉडल में शामिल किया है जिनकी स्थिति स्थिर है लेकिन उन्हें अभी भी ICU स्तर की निगरानी की जरूरत है। इन मरीजों को ओपन केयर ज़ोन में लाने के दौरान पूरी मेडिकल सुरक्षा का ध्यान रखा जा रहा है। स्वास्थ्यकर्मी पोर्टेबल मॉनिटर, ऑक्सीजन सपोर्ट सिस्टम और इमरजेंसी मेडिकल किट के साथ हर समय मौजूद रहते हैं। इससे मरीज की स्थिति पर लगातार नजर बनी रहती है और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत इलाज दिया जा सकता है।
Continue Reading9 मई 2026
डॉक्टरों का कहना है कि प्राकृतिक धूप और ताज़ी हवा शरीर के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बेहद जरूरी मानी जाती है। लंबे समय तक ICU में रहने वाले कई मरीजों में “ICU स्ट्रेस सिंड्रोम” जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं, जिसमें मरीज भ्रम, बेचैनी, डर और डिप्रेशन महसूस करने लगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अगर मरीज को नियंत्रित तरीके से प्रकृति के करीब समय बिताने का मौका मिले, तो उसका मानसिक संतुलन बेहतर रहता है और शरीर की रिकवरी प्रक्रिया भी तेज हो सकती है। AIIMS जोधपुर के इस मॉडल में मरीजों को अस्पताल परिसर के विशेष रूप से तैयार किए गए खुले हिस्से में लाया जाता है, जहां हरियाली, खुली हवा और शांत वातावरण मौजूद है। यहां मरीज अपने परिजनों से सीमित समय के लिए बातचीत भी कर सकते हैं, जिससे उन्हें भावनात्मक सहारा मिलता है। डॉक्टरों का मानना है कि परिवार का साथ और सकारात्मक माहौल भी इलाज का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार इस पहल के शुरुआती परिणाम काफी सकारात्मक दिखाई दिए हैं। कई मरीजों में तनाव का स्तर कम हुआ है, नींद की गुणवत्ता बेहतर हुई है और कुछ मामलों में रिकवरी की गति में भी सुधार देखा गया है। हालांकि डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि यह सुविधा केवल उन्हीं मरीजों को दी जा रही है जिनकी मेडिकल स्थिति इसकी अनुमति देती है।
Continue Reading13 मई 2026
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के कई विकसित देशों में “हीलिंग एनवायरनमेंट” और “नेचर-बेस्ड रिकवरी” मॉडल पर पहले से काम हो रहा है। अब भारत में भी धीरे-धीरे अस्पताल केवल तकनीकी इलाज से आगे बढ़कर मरीजों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को इलाज का अहम हिस्सा मानने लगे हैं। AIIMS जोधपुर की यह पहल उसी दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मॉडल सफल रहता है, तो आने वाले समय में देश के दूसरे बड़े अस्पताल भी ICU देखभाल में इसी तरह के बदलाव अपना सकते हैं। इससे गंभीर मरीजों की रिकवरी को अधिक मानवीय और मानसिक रूप से सहायक बनाया जा सकेगा। फिलहाल AIIMS जोधपुर का यह प्रयोग चिकित्सा क्षेत्र में एक नई सोच और आधुनिक हेल्थकेयर मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।
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13 मई 2026
11 मई 2026