जर्मनी की वुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी (University of Würzburg) के शोधकर्ताओं ने इंसानी दिमाग की सीखने और याद रखने की क्षमता की नकल करने वाला एक नया नैनोस्केल इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस विकसित किया है। लैंथेनम एलुमिनेट और स्ट्रोंटियम टाइटनेट जैसे जटिल ऑक्साइड पदार्थों के संयोजन से तैयार यह अकेला सूक्ष्म कंपोनेंट एक साथ ट्रांजिस्टर, मेमरिस्टर और मेमकैपेसिटर के रूप में काम कर सकता है। यह खोज भविष्य में ऊर्जा की भारी बचत करने वाले न्यूरोमॉर्फिक हार्डवेयर, एआई और स्मार्ट मेडिकल सेंसर बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग के क्षेत्र में वैज्ञानिकों को एक अभूतपूर्व सफलता हाथ लगी है। जर्मनी की वुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी (University of Würzburg) के भौतिकविदों की एक टीम ने जटिल ऑक्साइड पदार्थों (Complex Oxides) का इस्तेमाल करके एक ऐसा नैनोस्केल इलेक्ट्रॉनिक उपकरण विकसित किया है, जो जैविक तंत्रिका तंत्र (बायोलॉजिकल नर्वस सिस्टम) यानी इंसानी दिमाग के न्यूरॉन्स और सिनैप्स की तरह काम कर सकता है।
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इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रमुख वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) में प्रकाशित किए गए हैं। इस नवाचार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह चिप न केवल गणनाएं करने में सक्षम है, बल्कि बाहरी संकेतों से सीधे कंपोनेंट के स्तर पर सीख भी सकता है।
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पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग सिलिकॉन चिप्स और कंपोनेंट्स की आवश्यकता होती है। लेकिन वुर्जबर्ग के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित यह नैनो कंपोनेंट अपनी वायरिंग और उपयोग के आधार पर तीन अलग-अलग भूमिकाएं निभा सकता है:
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इस बहुमुखी क्षमता के कारण इसे इलेक्ट्रॉनिक दुनिया का 'ऑल-राउंडर' कहा जा रहा है।
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शोधकर्ताओं ने इस उपकरण को बनाने के लिए दो मुख्य ऑक्साइड सामग्रियों का इस्तेमाल किया है—लैंथेनम एलुमिनेट (LaAlO₃) और स्ट्रोंटियम टाइटनेट (SrTiO₃)। हालांकि ये दोनों पदार्थ स्वतंत्र रूप से विद्युत के कुचालक (इंसुलेटर) हैं, लेकिन जब इन्हें एक साझा इंटरफेस पर मिलाया जाता है, तो वहां एक अत्यंत पतली चालक परत बनती है, जिसे 'क्वासी-टू-डायमेंशनल इलेक्ट्रॉन गैस' कहा जाता है।
जब इस इंटरफेस से विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो ऑक्सीजन परमाणु अपनी जगह से विस्थापित हो सकते हैं। इससे उपकरण का विद्युत प्रतिरोध बदल जाता है। बिल्कुल उसी तरह जैसे किसी व्यक्ति का दिमाग बाहरी उद्दीपनों (एक्सटर्नल स्टिम्युली) और अनुभवों से सीखकर अपने सिनैप्स को मजबूत या कमजोर करता है, इस उपकरण की चालकता को भी एक न्यूरल नेटवर्क की तरह 'ट्रेन' किया जा सकता है।
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शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य के पोर्टेबल और पहनने योग्य (वियरेबल) हेल्थ सेंसर्स के लिए गेम-चेंजर साबित होगी। इस तरह के बायो-सेंसर्स इंसान के शरीर के तापमान, हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर और ब्लड ग्लूकोज जैसे महत्वपूर्ण मापदंडों की चौबीसों घंटे निगरानी कर सकते हैं और किसी बड़े कंप्यूटर या भारी ऊर्जा खर्च के बिना सीधे शरीर पर ही डेटा का सटीक और त्वरित विश्लेषण कर सकते हैं।
Q1: जर्मन वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह नैनोचिप क्या काम करती है?
उत्तर: यह चिप इंसानी दिमाग के सीखने और याद रखने के जैविक तंत्र की नकल करती है। यह डेटा प्रोसेसिंग के साथ-साथ सीधे कंपोनेंट के भीतर जानकारी को स्टोर और 'लर्न' कर सकती है।
Q2: इस नैनो डिवाइस को किन सामग्रियों से बनाया गया है?
उत्तर: इसे दो जटिल ऑक्साइड पदार्थों—लैंथेनम एलुमिनेट (Lanthanum Aluminate - LaAlO₃) और स्ट्रोंटियम टाइटनेट (Strontium Titanate - SrTiO₃) के इंटरफेस से तैयार किया गया है।
Q3: यह अकेला कंपोनेंट कौन-से तीन कार्य कर सकता है?
उत्तर: वायरिंग के आधार पर यह सिंगल नैनोस्केल कंपोनेंट एक ट्रांजिस्टर, मेमरिस्टर (रेजिस्टेंस मेमोरी) या मेमकैपेसिटर की तरह काम कर सकता है।
Q4: भविष्य में इसका उपयोग किस क्षेत्र में सबसे ज्यादा हो सकता है?
उत्तर: इसका इस्तेमाल ऊर्जा-कुशल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हार्डवेयर, न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग और स्मार्ट बायो-सेंसर (जो ब्लड प्रेशर, ग्लूकोज आदि की मौके पर ही जांच कर सकें) में हो सकता है।