अमेरिकी रिसर्च जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 40 करोड़ सालों में चांद करीब 148 फीट (42 से 46 मीटर) सिकुड़ चुका है। वहीं, अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी (पीआरएल) के वैज्ञानिक प्रोफेसर जयेश पबारी के शोध से सामने आया है कि अंतरिक्षीय धूल के कारण चांद का वजन बढ़ रहा है और उसकी सतह से हर साल करीब 6 किलो बर्फ अंतरिक्ष में बिखर रही है।
बचपन से हम 'चंदा मामा' की कहानियां सुनते आ रहे हैं, लेकिन करोड़ों वर्षों से पृथ्वी का चक्कर लगा रहे हमारे चंद्रमा के भीतर कई गहरे और हैरान करने वाले बदलाव चल रहे हैं। हाल ही में अमेरिकी रिसर्च जर्नल 'द प्लेनेटरी साइंस जर्नल' में छपी एक रिपोर्ट ने दुनिया भर के खगोलविदों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
इस रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 400 मिलियन यानी 40 करोड़ वर्षों में चांद लगभग 148 फीट (42 से 46 मीटर) तक सिकुड़ चुका है। इस रहस्यमयी बदलाव और इसके इंसानी जीवन पर पड़ने वाले असर को लेकर अहमदाबाद के फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी (PRL) के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रोफेसर जयेश पबारी ने कई चौंकाने वाले तथ्य साझा किए हैं।
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प्रोफेसर जयेश पबारी के अनुसार, उपग्रह से ली गई तस्वीरों के बारीक विश्लेषण से पता चला है कि चांद के अंदरूनी हिस्से की गर्मी लगातार कम हो रही है। जब कोई खगोलीय पिंड ठंडा होता है, तो वह धीरे-धीरे सिकुड़ता है। चांद के अंदरूनी तापमान में आ रही इस गिरावट की वजह से उसकी सतह पर मौजूद मिट्टी और धूल के कण अत्यधिक दबाव के कारण आपस में दब रहे हैं।
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इस सिकुड़न के चलते चांद की सतह पर छोटी-छोटी दरारें (Scarps) और लकीरें उभर आई हैं। सतह का कुछ हिस्सा थोड़ा ऊपर उठ गया है, तो कुछ हिस्सा नीचे धंस गया है। यह प्रक्रिया बेहद धीमी गति से हो रही है, जिसकी रफ्तार प्रति 10 लाख वर्ष में लगभग 11 सेंटीमीटर आंकी गई है।
हालांकि, प्रोफेसर पबारी स्पष्ट करते हैं कि इससे केवल चांद का सतही क्षेत्रफल घट रहा है और घनत्व प्रभावित हो सकता है, लेकिन इसका कुल द्रव्यमान केवल सिकुड़ने से कम नहीं होता।
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अमेरिकी जर्नल की रिपोर्ट में जहां चांद के छोटे होने की बात सामने आई, वहीं प्रोफेसर जयेश पबारी के शोध ने एक और दिलचस्प पहलू उजागर किया है—चांद का वजन धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
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हमारे सौरमंडल में ग्रहों के बीच अंतरिक्ष में बहुत ही बारीक ठोस कण तैरते रहते हैं, जिन्हें इंटरप्लेनेटरी डस्ट पार्टिकल्स (IDPs) कहा जाता है। चूंकि चंद्रमा पर वायुमंडल (Atmosphere) नहीं है, इसलिए ये धूल के कण बिना किसी रुकावट के सीधे चांद की सतह पर गिरते रहते हैं।
समय-समय पर कुछ कण सतह से टकराकर अंतरिक्ष में वापस भी चले जाते हैं। लेकिन अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि जितने कण चांद छोड़कर बाहर जाते हैं, उससे कहीं अधिक कण बाहरी अंतरिक्ष से आकर वहां जमा हो जाते हैं। इस वजह से चांद की सतह पर धूल की एक परत जम रही है और उसका कुल द्रव्यमान (वजन) धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
प्रोफेसर पबारी ने वर्ष 2020 में 'इम्पैक्ट थ्योरी' के आधार पर यह महत्वपूर्ण खोज की थी कि चांद की सतह से धूल के साथ-साथ बर्फ भी अंतरिक्ष में जा रही है।
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चांद के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां कभी सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती। इन्हें 'परमानेंटली शैडोड रीजन्स' (PSRs) कहा जाता है, जहां भारी मात्रा में पानी की बर्फ जमी हुई है।
जब तेज रफ्तार इंटरप्लेनेटरी धूल के कण इन अंधेरे और बर्फीले गड्ढों से टकराते हैं, तो वहां एक तरह का फव्वारा (Ejecta Fountain) बनता है। इस टकराव से मलबे के साथ-साथ सतह की बर्फ भी छिटक कर अंतरिक्ष में चली जाती है। वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक, हर साल लगभग 6 किलोग्राम बर्फ चांद से निकलकर अंतरिक्ष में खो रही है।
भविष्य में इंसानी बस्तियों और मून मिशनों के लिए पानी की बर्फ सबसे महत्वपूर्ण संसाधन मानी जाती है, इसलिए इस प्रक्रिया को समझना बेहद जरूरी है।
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आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या चांद के सिकुड़ने या बर्फ खोने से हमारी जिंदगी पर कोई असर पड़ेगा? इस पर प्रोफेसर जयेश पबारी ने साफ किया है कि इन बदलावों की रफ्तार इतनी धीमी है कि इनका प्रभाव दिखने में लाखों-करोड़ों साल लग जाएंगे। इंसानी जीवनकाल के सामने यह समय बहुत ही लंबा है, इसलिए हमारे दैनिक जीवन या पृथ्वी पर इसका कोई तात्कालिक खतरा या प्रभाव नहीं पड़ेगा।
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अन्य ग्रहों की तुलना में यह प्रक्रिया हमारे चांद पर अधिक सक्रिय इसलिए है क्योंकि इसका अंदरूनी हिस्सा अभी पूरी तरह ठंडा नहीं हुआ है और वह अब भी उस दौर से गुजर रहा है। अहमदाबाद के फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी के प्लेनेटरी साइंसेज डिवीजन में पिछले 25 वर्षों से कार्यरत प्रोफेसर जयेश पबारी सौरमंडल के धूल कणों और ग्रहों पर लगातार शोध कर रहे हैं।
FREQUENTLY ASKED QUESTIONS — अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल 1: चांद पिछले 40 करोड़ सालों में कितना सिकुड़ चुका है?
जवाब: वैज्ञानिक आंकड़ों और सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार, पिछले 40 करोड़ वर्षों में चांद करीब 148 फीट (42 से 46 मीटर) सिकुड़ चुका है।
सवाल 2: क्या चांद का वजन कम हो रहा है या बढ़ रहा है?
जवाब: चांद का सतही आकार सिकुड़ रहा है, लेकिन अंतरिक्ष से लगातार गिरने वाली धूल (इंटरप्लेनेटरी डस्ट पार्टिकल्स) के कारण उसका कुल द्रव्यमान यानी वजन धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
सवाल 3: चांद की सतह से बर्फ अंतरिक्ष में कैसे जा रही है?
जवाब: प्रोफेसर जयेश पबारी के शोध के अनुसार, जब अंतरिक्षीय धूल के तेज रफ्तार कण चांद के ध्रुवों पर मौजूद बर्फीले गड्ढों से टकराते हैं, तो फव्वारे जैसी स्थिति बनती है और सालाना करीब 6 किलो बर्फ अंतरिक्ष में बिखर जाती है।
सवाल 4: क्या चांद के सिकुड़ने से इंसानों पर कोई तात्कालिक खतरा है?
जवाब: नहीं, यह प्रक्रिया लाखों वर्षों में बहुत धीमी गति से होती है, इसलिए आम इंसानी जीवन या पृथ्वी पर इसका कोई तात्कालिक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
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