बचपन में मिट्टी में खेलकर भी मन राजा जैसा रहता था, पर आज उम्र बढ़ने के साथ कंधे भले मजबूत हुए हों, लेकिन दिमाग पर टेंशन का बोझ बढ़ता जा रहा है। सच कहें तो परेशानी काम ज्यादा होने से नहीं, बल्कि हर बात को सिर पर बैठा लेने की हमारी आदत से पैदा होती है। अगर हम रोजमर्रा की सोच को थोड़ा सा बदल लें, तो जिंदगी फिर से बेहद आसान हो सकती है।
जरा दो मिनट रुकिए और अपने बचपन के उन दिनों को याद कीजिए। जब हम गली-मोहल्ले में दोस्तों के साथ कंचे या गिल्ली-डंडा खेलते थे, या घर में किसी टूटे-फूटे खिलौने को जोड़ने बैठते थे। उस वक्त क्या दिमाग में कोई चिंता होती थी? बिल्कुल नहीं! पूरा ध्यान बस इस बात पर रहता था कि खेल में जीतना कैसे है और दिनभर मजे कैसे करने हैं। रात को बिस्तर पर लेटते ही सेकंडों में गहरी नींद आ जाती थी।
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लेकिन फिर वक्त बदला। हम धीरे-धीरे बड़े हुए, कंधों पर घर-गृहस्थी, नौकरी और जिम्मेदारियां आ गईं। और इन सब के साथ जिंदगी में एक ऐसी चीज घुस आई जो दिन-रात हमारा पीछा करती है—टेंशन यानी तनाव।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर बढ़ती उम्र में तनाव के कारण क्या हैं? क्या सचमुच हमारे पास काम इतना ज्यादा है? अगर आप ठंडे दिमाग से सोचेंगे तो पाएंगे कि काम ज्यादा नहीं है, बल्कि हमारी आदत बन गई है कि हम काम का हल निकालने के बजाय उसका गैर-जरूरी लोड (बोझ) अपने सिर पर लाद लेते हैं।
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जैसे-जैसे उम्र का पहिया आगे बढ़ता है, हमारी सोचने की आदतें बिगड़ने लगती हैं। जिन चीजों को हम बचपन में हंसकर टाल देते थे, बड़े होकर उन्हीं बातों पर पूरा दिन माथापच्ची करते रहते हैं:
इस बात को समझने के लिए बच्चों की परीक्षा का सबसे बढ़िया उदाहरण है।
एग्जाम से एक रात पहले ज्यादातर बच्चे क्या करते हैं? वे किताब खोलकर शांति से पढ़ने के बजाय सिर्फ इस डर में सूखते रहते हैं कि "अगर पेपर मुश्किल आ गया तो क्या होगा? अगर मैं फेल हो गया तो घरवाले क्या कहेंगे?" इसका सीधा नतीजा क्या निकलता है?
हम बड़े भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में यही बचकाना खेल खेल रहे हैं। हम दफ्तर के काम, पैसे की तंगी या परिवार की उलझनों को सुलझाने के लिए हाथ-पैर चलाने के बजाय बस सोफे पर बैठकर सिर पकड़ लेते हैं और पूरा दिन चिंता की आग में जलते रहते हैं।
जब आप 24 घंटे किसी बात को लेकर घुटते रहेंगे, तो शरीर भी जवाब देने लगता है:
जिंदगी कोई सजा नहीं है जिसे रो-रोकर काटना पड़े। अगर आप चाहते हैं कि दिल फिर से हल्का रहे, तो तनाव से बचने के तरीके बहुत सीधे और जमीन से जुड़े हैं:
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उम्र का बढ़ना कोई बीमारी नहीं है। अगर हम काम का फालतू लोड अपने सिर पर लादना बंद कर दें और रोज की उलझनों को सहज होकर सुलझाएं, तो आज भी जिंदगी उतनी ही मस्त और बेफिक्र हो सकती है जितनी बचपन में हुआ करती थी।
प्रश्न 1: उम्र बढ़ने के साथ लोग ज्यादा टेंशन क्यों लेने लगते हैं?
उत्तर: उम्र बढ़ने पर काम से ज्यादा हमारी सोच भारी हो जाती है। हम समस्याओं का हल निकालने के बजाय हर छोटी-बात का लोड अपने सिर पर लेने लगते हैं, जिससे तनाव बढ़ता है।
प्रश्न 2: रात को टेंशन की वजह से नींद न आए तो क्या करना चाहिए?
उत्तर: बिस्तर पर जाने से पहले मोबाइल छोड़ दें, गहरी सांस लें और जिस बात की चिंता सता रही हो, उसे एक डायरी में लिख लें ताकि दिमाग को लगे कि कल इस पर काम करेंगे।
प्रश्न 3: क्या अपनों से बात शेयर करने से सच में टेंशन कम होती है?
उत्तर: बिल्कुल, जब हम मन की बात किसी भरोसेमंद दोस्त या परिवार के सदस्य से खुलकर कह देते हैं, तो दिल का भारीपन तुरंत कम हो जाता है और कभी-कभी बातचीत से उलझन का सीधा रास्ता भी मिल जाता है।
प्रश्न 4: रोजमर्रा के कामों को बोझ बनने से कैसे रोकें?
उत्तर: कामों को मजबूरी समझकर मत कीजिए। पूरे दिन के कामों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट लें और बीच-बीच में थोड़ा वक्त खुद के आराम और चाय-पानी के लिए जरूर निकालें।
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