कोरोना महामारी ने इलाज के कई तरीकों को बदल दिया था। अब एक नई रिसर्च में सामने आया है कि महामारी के दौरान शुरुआती स्टेज के ब्रेस्ट कैंसर से जूझ रही महिलाओं में कम समय में पूरी होने वाली रेडिएशन थेरेपी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा। इस इलाज को Ultra-Hypofractionated Whole-Breast Irradiation (UH-WBI) कहा जाता है। इसमें सामान्य रेडिएशन थेरेपी की तुलना में कम बार अस्पताल जाना पड़ता है और इलाज सिर्फ 5 सत्रों में पूरा किया जा सकता है।
कोरोना महामारी ने इलाज के कई तरीकों को बदल दिया था। अब एक नई रिसर्च में सामने आया है कि महामारी के दौरान शुरुआती स्टेज के ब्रेस्ट कैंसर से जूझ रही महिलाओं में कम समय में पूरी होने वाली रेडिएशन थेरेपी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा। इस इलाज को Ultra-Hypofractionated Whole-Breast Irradiation (UH-WBI) कहा जाता है। इसमें सामान्य रेडिएशन थेरेपी की तुलना में कम बार अस्पताल जाना पड़ता है और इलाज सिर्फ 5 सत्रों में पूरा किया जा सकता है।
American Journal of Clinical Oncology में 10 सितंबर को प्रकाशित इस रिसर्च में अमेरिका की Medicare से जुड़ी शुरुआती स्टेज के ब्रेस्ट कैंसर वाली महिलाओं के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। रिसर्च में कुल 4,086 महिलाओं के डेटा को शामिल किया गया, जिनमें 2,504 महिलाएं कोरोना से पहले के समूह में और 1,582 महिलाएं महामारी के बाद के समूह में थीं।
रिसर्च में पाया गया कि कोरोना से पहले UH-WBI का इस्तेमाल सिर्फ 1.7 प्रतिशत महिलाओं में हो रहा था। महामारी शुरू होने के बाद यह बढ़कर 8.4 प्रतिशत हो गया। यानी इस छोटे लेकिन कम समय वाले इलाज के इस्तेमाल में करीब 5 गुना बढ़ोतरी हुई। वहीं, पारंपरिक रेडिएशन थेरेपी का इस्तेमाल 23.2 प्रतिशत से घटकर 16.4 प्रतिशत रह गया।
UH-WBI को शुरुआती स्टेज के ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में प्रभावी माना जाता है और इसके समर्थन में क्लिनिकल ट्रायल के सबूत भी मौजूद हैं। इसके बावजूद अमेरिका में इसका इस्तेमाल लंबे समय से धीमी गति से बढ़ रहा था। कोरोना महामारी के दौरान अस्पतालों में मरीजों की संख्या और अनावश्यक अस्पताल यात्राओं को कम करने की जरूरत ने इस छोटे इलाज को तेजी से अपनाने में मदद की।
रिसर्च के मुताबिक, महामारी के दौरान इलाज कराने वाली महिलाओं को औसतन लगभग दो रेडिएशन सत्र कम लेने पड़े। उनका पूरा रेडिएशन इलाज भी कोरोना से पहले इलाज कराने वाली महिलाओं की तुलना में करीब तीन दिन पहले पूरा हो गया। इसका मतलब था कि मरीजों को अस्पताल और इलाज के लिए कम बार जाना पड़ा।
इस बदलाव से इलाज की लागत में भी कमी देखी गई। शोधकर्ताओं के अनुमान के अनुसार, UH-WBI अपनाने पर प्रति मरीज करीब 412 डॉलर की बचत हो सकती है। अध्ययन में रेडिएशन थेरेपी की औसत लागत UH-WBI के लिए करीब 1,848 डॉलर, जबकि पारंपरिक रेडिएशन थेरेपी के लिए करीब 8,820 डॉलर रही।
इस छोटे इलाज का सबसे ज्यादा फायदा उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जिन्हें बार-बार अस्पताल जाना मुश्किल होता है। अध्ययन में 80 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाओं और लंबे समय से कई बीमारियों से जूझ रही महिलाओं में UH-WBI के इस्तेमाल में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई।
हालांकि, रिसर्च में एक महत्वपूर्ण अंतर भी सामने आया। अमेरिका के उत्तर-पूर्वी हिस्से में UH-WBI का इस्तेमाल सबसे ज्यादा बढ़ा। सफेद महिलाओं में भी इसका इस्तेमाल काफी बढ़ा, लेकिन ब्लैक महिलाओं में ऐसी बढ़ोतरी देखने को नहीं मिली। इससे पता चलता है कि नए और कम समय वाले इलाज का फायदा सभी मरीजों तक समान रूप से पहुंचना अभी भी चुनौती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि कोरोना महामारी और उससे जुड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूरियों ने रेडिएशन थेरेपी के इस नए और कम समय वाले तरीके को तेजी से अपनाने में भूमिका निभाई हो सकती है। उनका मानना है कि इस बदलाव से यह सीख मिल सकती है कि जब किसी प्रभावी नए इलाज के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हों, तो उन्हें मरीजों तक तेजी से पहुंचाने के तरीके खोजे जा सकते हैं।
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