जनवरी 2022 में प्रशांत महासागर में टोंगा के पास हुआ हंगा ज्वालामुखी विस्फोट पिछली एक सदी के सबसे शक्तिशाली ज्वालामुखी विस्फोटों में से एक था। अब एक अंतरराष्ट्रीय शोध टीम ने इस विस्फोट के बाद समुद्र के नीचे हुए बड़े बदलावों का अध्ययन किया है। शोध में सामने आया है कि इस घटना के दौरान समुद्र की तलहटी से करीब 8.9 घन किलोमीटर ज्वालामुखीय पदार्थ खिसक गया। यह मात्रा करीब 1,500 ग्रेट पिरामिड या 89,000 आधुनिक विमानवाहक पोतों के बराबर बताई गई है।
जनवरी 2022 में प्रशांत महासागर में टोंगा के पास हुआ हंगा ज्वालामुखी विस्फोट पिछली एक सदी के सबसे शक्तिशाली ज्वालामुखी विस्फोटों में से एक था। अब एक अंतरराष्ट्रीय शोध टीम ने इस विस्फोट के बाद समुद्र के नीचे हुए बड़े बदलावों का अध्ययन किया है। शोध में सामने आया है कि इस घटना के दौरान समुद्र की तलहटी से करीब 8.9 घन किलोमीटर ज्वालामुखीय पदार्थ खिसक गया। यह मात्रा करीब 1,500 ग्रेट पिरामिड या 89,000 आधुनिक विमानवाहक पोतों के बराबर बताई गई है।
यह अध्ययन Auckland University of Technology (AUT) की समुद्री भू-विज्ञानी डॉ. मार्टा रिबो के नेतृत्व में किया गया और इसके नतीजे Nature Geoscience में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों ने समुद्र की गहराई और तलहटी में हुए बदलावों को समझने के लिए हाई-रिजॉल्यूशन समुद्री मानचित्रों और पानी के अंदर किए गए अवलोकनों का इस्तेमाल किया।
शोध के अनुसार, विस्फोट के दौरान हंगा ज्वालामुखी का कैल्डेरा यानी ज्वालामुखी के ऊपर बना बड़ा गड्ढा करीब 150 मीटर से गहरा होकर 850 मीटर तक पहुंच गया। इतनी तेजी से कैल्डेरा के ढहने से समुद्र के नीचे भारी मात्रा में ज्वालामुखीय सामग्री खिसकी। वैज्ञानिकों का कहना है कि कुल 8.9 घन किलोमीटर सामग्री के विस्थापन में सबसे बड़ा योगदान कैल्डेरा के ढहने का था। बाकी हिस्सा विस्फोट से पैदा हुई तेज समुद्री धाराओं के कारण सतह के कटाव से हुआ।
इस विस्फोट का असर केवल समुद्र की तलहटी तक सीमित नहीं रहा। इससे खतरनाक ज्वालामुखीय सुनामी, वैश्विक स्तर पर वायुमंडलीय दबाव की लहरें और समुद्र के भीतर तेज और विनाशकारी धाराएं पैदा हुईं। इन धाराओं में बड़ी मात्रा में ज्वालामुखीय पदार्थ समुद्र में पहुंचा, जिससे समुद्र के नीचे मौजूद संचार केबलों को भी भारी नुकसान हुआ।
वैज्ञानिकों के अनुसार, कैल्डेरा के ढहने की तेज गति और उसकी खड़ी बनावट के कारण हंगा विस्फोट से पैदा हुई सुनामी बेहद शक्तिशाली थी। इसकी लहरें ज्वालामुखी से करीब 100 किलोमीटर दूर तक लगभग 40 मीटर ऊंची थीं। इसकी तुलना 1883 में इंडोनेशिया के क्राकाटोआ विस्फोट से भी की गई है, जिसने 30,000 से ज्यादा लोगों की जान ली थी और बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। हंगा विस्फोट से स्थानीय स्तर पर भारी नुकसान हुआ, हालांकि सौभाग्य से इसमें बहुत कम लोगों की मौत हुई।
शोध में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई। समुद्र के नीचे खिसकी 8.9 घन किलोमीटर सामग्री हंगा के मैग्मा रिजर्व यानी जमीन के नीचे मौजूद मैग्मा भंडार के 30 प्रतिशत से भी कम थी। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलती है कि इतने बड़े विस्फोट के बाद भी ज्वालामुखी के नीचे कितना बड़ा मैग्मा भंडार मौजूद था।
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डॉ. मार्टा रिबो के अनुसार, टोंगा-कर्माडेक आर्क के आसपास कम से कम 74 समुद्री ज्वालामुखी हैं, जिनमें 20 कैल्डेरा कॉम्प्लेक्स शामिल हैं। इसके बावजूद इनमें से ज्यादातर ज्वालामुखी अब तक अच्छी तरह खोजे या मैप नहीं किए गए हैं। यही वजह है कि समुद्र के नीचे मौजूद ज्वालामुखियों से होने वाले खतरे को समझना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
हंगा विस्फोट से पहले और बाद में समुद्र की तलहटी की मैपिंग करना इस शोध की सबसे महत्वपूर्ण खासियत रही। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के लगातार समुद्री नक्शे उपलब्ध होने से यह समझने में मदद मिलती है कि समुद्र के नीचे ज्वालामुखी का कैल्डेरा कैसे बनता और अचानक कैसे ढहता है। इससे सुनामी और समुद्र के अंदर बनने वाली तेज धाराओं जैसे खतरों का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि 2022 की घटना ने दुनिया की समुद्र के नीचे होने वाले ज्वालामुखीय खतरों से निपटने की तैयारी में एक बड़ी कमी को उजागर किया है। इसलिए समुद्र की तलहटी की हाई-रिजॉल्यूशन और बार-बार मैपिंग करना जरूरी है। इससे ज्वालामुखियों की निगरानी बेहतर होगी, सुनामी की शुरुआती चेतावनी प्रणाली मजबूत होगी और समुद्र के नीचे मौजूद जरूरी संचार केबल जैसी महत्वपूर्ण सुविधाओं को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
यह शोध AUT के नेतृत्व में हुआ, जिसमें टोंगा, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन की अलग-अलग शोध संस्थाओं के 22 सहयोगी वैज्ञानिक शामिल थे।
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