विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार एल नीनो फरवरी 2027 तक बना रह सकता है। इसका असर भारत में बारिश, जलाशयों में पानी और सर्दियों के तापमान पर पड़ सकता है। कमजोर बारिश और गर्म सर्दी से गेहूं समेत रबी फसलों पर असर पड़ने की चिंता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने एल नीनो को लेकर भारत के लिए चिंता बढ़ाने वाली जानकारी दी है। WMO के अनुसार, मजबूत से बहुत मजबूत एल नीनो की स्थिति फरवरी 2027 तक बनी रह सकती है। इसका असर केवल मानसून तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि मानसून के बाद की बारिश, जलाशयों में पानी, मिट्टी की नमी, सर्दियों के तापमान और रबी फसलों पर भी पड़ सकता है।
भारत में इस साल मानसून पहले ही सामान्य से कम रहा है। ऐसे में लंबे समय तक एल नीनो रहने से किसानों के लिए आने वाला रबी सीजन अहम हो गया है। खासकर गेहूं की फसल को लेकर ज्यादा ध्यान देना होगा, क्योंकि गेहूं के लिए सर्दियों का तापमान बहुत महत्वपूर्ण होता है।
इस साल मानसून पहले ही कमजोर भारत में इस साल मानसून की बारिश सामान्य से कम रही है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, 9 सितंबर तक देश में 648 मिमी बारिश हुई थी। जून से सितंबर के बीच सामान्य बारिश 760.6 मिमी मानी जाती है। इस हिसाब से देश में अब तक करीब 15 फीसदी कम बारिश हुई है।
क्षेत्रों की बात करें तो दक्षिणी प्रायद्वीप में बारिश सामान्य से करीब 27 फीसदी कम रही। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में भी बारिश करीब 24 फीसदी कम रही है। मध्य भारत में बारिश की कमी करीब 7 फीसदी दर्ज की गई।
मानसून अब अपने आखिरी दौर में पहुंच रहा है। ऐसे समय में एल नीनो का मजबूत होना किसानों और मौसम पर नजर रखने वालों के लिए अहम माना जा रहा है।
सितंबर के बाद कैसी रह सकती है बारिश? एल नीनो का मतलब यह नहीं है कि भारत में बारिश पूरी तरह बंद हो जाएगी। इसका असर हर जगह एक जैसा नहीं होता। कुछ इलाकों में सामान्य बारिश हो सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में बारिश कम या असमान रह सकती है।
भारत में मानसून के बाद का समय भी खेती के लिए जरूरी होता है। दक्षिणी और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में मानसून के बाद होने वाली बारिश से खेतों और जल स्रोतों को पानी मिलता है।
दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्र में इस साल बारिश की कमी सबसे ज्यादा रही है। 9 सितंबर तक इस क्षेत्र में 436 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 601 मिमी होती है। अगर आने वाले समय में बारिश कम रहती है, तो इसका असर खेतों की मिट्टी में मौजूद नमी पर पड़ सकता है।
इसका सीधा असर रबी की खेती पर भी पड़ सकता है। जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा कम है, वहां किसान बारिश पर ज्यादा निर्भर रहते हैं।
जलाशयों में पानी की स्थिति क्यों जरूरी? मानसून भारत के लिए पानी का सबसे बड़ा स्रोत है। बारिश के पानी से जलाशय भरते हैं और इसी पानी का इस्तेमाल खेती, पीने के पानी और दूसरे कामों में किया जाता है।
ICICI बैंक की 4 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, 27 अगस्त तक देश के 150 निगरानी वाले जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का 68 फीसदी पानी था। पिछले साल इसी समय इन जलाशयों में 74 फीसदी पानी उपलब्ध था।
इस अंतर को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि रबी सीजन शुरू होने वाला है। अगर मानसून के आखिरी दिनों में अच्छी बारिश होती है, तो जलाशयों में पानी बढ़ सकता है। लेकिन बारिश कम या अलग-अलग इलाकों में होती है, तो कुछ क्षेत्रों में पानी की कमी बनी रह सकती है।
इस स्थिति में किसानों को रबी की फसल के लिए सिंचाई पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ सकता है।
खरीफ फसलों पर भी दिखा बारिश की कमी का असर इस साल कमजोर मानसून का असर खरीफ की बुवाई पर भी पड़ा है। ICICI बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, 28 अगस्त तक देश में कुल खरीफ क्षेत्र 107.1 मिलियन हेक्टेयर था। पिछले साल इसी समय यह क्षेत्र 109 मिलियन हेक्टेयर था। यानी कुल खरीफ क्षेत्र करीब 2 फीसदी कम रहा।
धान की बुवाई का क्षेत्र पिछले साल के मुकाबले 3.4 फीसदी कम रहा। मोटे अनाज का क्षेत्र 2.3 फीसदी और तिलहन का क्षेत्र 0.5 फीसदी घटा है।
हालांकि, दलहन की स्थिति कुछ बेहतर रही। इसका क्षेत्र करीब 1.2 फीसदी बढ़ा है। अगस्त के अंत तक सामान्य खरीफ क्षेत्र का करीब 97 फीसदी हिस्सा बोया जा चुका था।
अब खरीफ फसलों की कटाई के बाद किसान रबी की तैयारी करेंगे। इस समय मिट्टी में नमी और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता काफी मायने रखेगी।
रबी फसल के लिए क्यों अहम है आने वाला मौसम? रबी सीजन में गेहूं, सरसों, चना और दूसरी दलहन फसलें प्रमुख होती हैं। इन फसलों की अच्छी पैदावार के लिए खेतों में पर्याप्त नमी और जरूरत के समय सिंचाई का पानी मिलना जरूरी है।
अगर मानसून के बाद बारिश कम रहती है, तो खेतों में नमी कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में किसान सिंचाई के लिए नलकूप, नहर या जलाशयों के पानी पर ज्यादा निर्भर हो सकते हैं।
जिन इलाकों में पानी की सुविधा पहले से सीमित है, वहां यह स्थिति ज्यादा परेशानी पैदा कर सकती है। जलाशयों में पानी कम रहने पर सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी पर दबाव बढ़ सकता है।
गेहूं की फसल के लिए सर्दी सबसे अहम रबी फसलों में गेहूं का बड़ा स्थान है। गेहूं की फसल के लिए सर्दियों का तापमान बहुत महत्वपूर्ण होता है। फसल के बढ़ने, फूल आने और दाना भरने के समय मौसम ज्यादा गर्म नहीं होना चाहिए।
अगर सर्दियों में तापमान सामान्य से ज्यादा रहता है, तो गेहूं की फसल जल्दी पक सकती है। इससे फसल के विकास और पैदावार पर असर पड़ने की चिंता रहती है।
यही वजह है कि आने वाले महीनों में सिर्फ बारिश पर ही नहीं, बल्कि सर्दियों के तापमान पर भी नजर रखनी होगी। अगर बारिश कम रहती है और सर्दी भी सामान्य से ज्यादा गर्म होती है, तो गेहूं किसानों के सामने दोहरी चुनौती हो सकती है।
एल नीनो और भारत की सर्दी एल नीनो का असर अलग-अलग मौसम और क्षेत्रों में अलग हो सकता है। इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि पूरे भारत में सर्दी गर्म ही रहेगी। लेकिन अगर एल नीनो लंबे समय तक बना रहता है, तो मौसम में बदलाव का खतरा बढ़ सकता है।
भारत में रबी फसलों का समय आम तौर पर ठंड के मौसम से जुड़ा होता है। इसलिए सर्दियों के दौरान तापमान में ज्यादा बदलाव खेती के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
किसानों के लिए सही समय पर बुवाई, पानी की उपलब्धता और मौसम की जानकारी अहम होगी। खासकर गेहूं की खेती करने वाले किसानों को फसल के दौरान तापमान में होने वाले बदलाव पर ध्यान देना होगा।
वायु गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है असर एल नीनो और कम बारिश का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रह सकता। मानसून खत्म होने के बाद जब मौसम सर्दी की ओर बढ़ता है, तब बारिश की कमी कुछ क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता की समस्या को बढ़ा सकती है।
बारिश कम होने पर हवा में मौजूद धूल और दूसरे छोटे कण आसानी से नीचे नहीं बैठते। सर्दियों में मौसम की कुछ स्थितियां भी प्रदूषण को जमीन के पास बनाए रख सकती हैं।
इस वजह से बारिश की कमी और सर्दियों का मौसम मिलकर देश के कुछ हिस्सों में वायु गुणवत्ता की समस्या को और मुश्किल बना सकते हैं। हालांकि, इसका असर हर जगह एक जैसा नहीं होगा।
बहुत मजबूत एल नीनो की संभावना 4 सितंबर की रिपोर्ट में सितंबर से नवंबर के दौरान मजबूत से बहुत मजबूत एल नीनो की संभावना करीब 100 फीसदी बताई गई है। रिपोर्ट में बहुत मजबूत एल नीनो की संभावना बढ़ने की बात भी कही गई है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अक्टूबर, नवंबर या पूरी सर्दी में देश के हर हिस्से में सूखा रहेगा। बारिश की स्थिति अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती है। कुछ जगह सामान्य बारिश हो सकती है, जबकि कुछ इलाकों में बारिश कम रह सकती है। सबसे बड़ी चिंता बारिश के असमान रहने और मौसम में ज्यादा बदलाव की है।
किसानों के लिए आने वाले महीने अहम भारत में इस साल मानसून की कमी पहले ही दर्ज की जा चुकी है। अब मानसून के आखिरी दिनों की बारिश और उसके बाद के मौसम पर नजर रखना जरूरी होगा।
अगर सितंबर के बाद अच्छी बारिश होती है, तो मिट्टी की नमी और जलाशयों की स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है। इससे रबी की तैयारी में किसानों को मदद मिल सकती है।
वहीं, अगर बारिश कमजोर रहती है, तो सिंचाई के पानी की जरूरत बढ़ सकती है। ऐसे में जलाशयों में उपलब्ध पानी का महत्व और बढ़ जाएगा।
रबी सीजन में गेहूं सहित दूसरी फसलों के लिए मौसम की स्थिति भी अहम रहेगी। खासकर गेहूं के मामले में सर्दियों का तापमान फसल की पैदावार पर असर डाल सकता है।
फिलहाल WMO के अनुसार एल नीनो फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना है। आने वाले महीनों में बारिश, जलाशयों में पानी और सर्दियों के तापमान की स्थिति यह तय करने में अहम होगी कि इसका असर भारत की खेती और मौसम पर कितना पड़ता है।
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