सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आधुनिक तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल से अपराधों की जांच अधिक जटिल हो रही है। कोर्ट ने जांच एजेंसियों को वैज्ञानिक जांच और डिजिटल जानकारी जुटाने के दौरान लोगों के निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत बताई।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि आज तकनीक तेजी से बदल रही है और इसकी वजह से अपराध की जांच पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल हो गई है। जांच एजेंसियों पर एक तरफ वैज्ञानिक तरीके से जांच करने का दबाव रहता है, जबकि दूसरी तरफ डिजिटल जानकारी जुटाने के दौरान लोगों की निजता के अधिकार का भी ध्यान रखना पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि इन दोनों के बीच सही संतुलन बनाना जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। पीठ में जस्टिस Joymalya Bagchi और जस्टिस V Mohana भी शामिल थे। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियों के सामने एक मुश्किल स्थिति बन गई है, क्योंकि जांच में तकनीक का इस्तेमाल जरूरी होता जा रहा है।
जांच में तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने अपराध की जांच का तरीका काफी बदल दिया है। अब जांच में सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी भी अहम हो सकती है।
लेकिन ऐसी जानकारी हासिल करते समय लोगों की निजता का सवाल भी सामने आता है। कोर्ट के मुताबिक, जांच एजेंसियों को वैज्ञानिक तरीके से जांच नहीं करने पर अदालत और पीड़ित की ओर से सवालों का सामना करना पड़ता है। वहीं, अगर जांच के दौरान किसी व्यक्ति की डिजिटल जानकारी जुटाई जाती है तो निजता के अधिकार को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं।
इसी वजह से कोर्ट ने कहा कि जांच की जरूरत और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए।
पत्रकार Abhishek Upadhyay की याचिका सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला पत्रकार Abhishek Upadhyay की ओर से दाखिल आवेदन से जुड़ा है। Abhishek Upadhyay ने खुद को राम मंदिर के चंदे में कथित गड़बड़ी को सामने लाने वाला व्हिसलब्लोअर बताया है।
उन्होंने Ghaziabad Police पर आरोप लगाया है कि पुलिस ने एक कथित रोड रेज मामले में FIR दर्ज की और इसी मामले को आधार बनाकर उनकी डिजिटल जानकारी हासिल करने की कोशिश की।
आवेदन में दावा किया गया है कि पुलिस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से 1 जून से उनकी डिजिटल गतिविधियों से जुड़ी जानकारी मांगना चाहती है। उनका आरोप है कि इस जानकारी का इस्तेमाल उनके सूत्रों का पता लगाने के लिए किया जा सकता है।
डिजिटल फुटप्रिंट को लेकर सवाल इस मामले में डिजिटल फुटप्रिंट का मुद्दा अहम है। सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी उसके संपर्कों और बातचीत के बारे में जानकारी दे सकती है। पत्रकारों के मामले में उनके सूत्रों की पहचान भी एक संवेदनशील मुद्दा हो सकती है।
Abhishek Upadhyay ने आरोप लगाया है कि Ghaziabad Police जिस सड़क विवाद के मामले में FIR की बात कर रही है, उसे उनकी डिजिटल जानकारी हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में पुलिस की ओर से इन आरोपों पर कोई जवाब नहीं दिया गया है। इसलिए इस मामले में लगाए गए आरोपों को अभी आरोप के तौर पर ही देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों के सामने आने वाली इस मुश्किल को समझने की बात कही। कोर्ट ने कहा कि तकनीक ने अपराध की जांच को ज्यादा जटिल बना दिया है।
एक तरफ जांच एजेंसियों से उम्मीद की जाती है कि वे वैज्ञानिक तरीके से जांच करें। दूसरी तरफ जब जांच के लिए किसी व्यक्ति की डिजिटल जानकारी मांगी जाती है तो निजता के अधिकार का सवाल उठता है।
इसी संदर्भ में पीठ ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। यानी जांच को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी तकनीक का इस्तेमाल हो, लेकिन इससे किसी व्यक्ति की निजता के अधिकार पर बेवजह असर न पड़े।
पत्रकारों के सूत्रों से जुड़ा मामला इस मामले में पत्रकार के सूत्रों की जानकारी सामने आने का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है। Abhishek Upadhyay का कहना है कि उनकी डिजिटल जानकारी हासिल करने की कोशिश का मकसद उनके स्रोतों तक पहुंचना हो सकता है।
पत्रकारों के लिए उनके सूत्रों की पहचान अहम होती है। हालांकि, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने अभी मुख्य सवाल यह है कि जांच के दौरान डिजिटल जानकारी हासिल करने की जरूरत और व्यक्ति के निजता के अधिकार के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाए।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है। कोर्ट की टिप्पणी ने यह साफ किया है कि आधुनिक जांच में तकनीक का इस्तेमाल करते समय निजता के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही, जांच एजेंसियों के लिए वैज्ञानिक जांच की जरूरत भी बनी हुई है।
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