मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बढ़ते सैन्य तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिकी फेड की संभावित ब्याज दर बढ़ोतरी की आशंका से सोने पर दबाव बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना तीन हफ्ते से अधिक के निचले स्तर पर पहुंच गया, जबकि भारत में भी MCX पर सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज हुई। अब बाजार की नजर अमेरिकी रोजगार आंकड़ों, डॉलर, Treasury yields और फेड की अगली नीति पर है।
मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। महंगे तेल से महंगाई बढ़ने और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दर बढ़ाने की आशंका मजबूत हुई, जिसका असर गैर-ब्याज देने वाली संपत्तियों में शामिल सोने पर पड़ा। भारत में भी 2 सितंबर को MCX पर सोने के भाव में तेज गिरावट दर्ज की गई।
बुधवार के कारोबार में अंतरराष्ट्रीय हाजिर सोना 0.6 फीसदी गिरकर 4,302.99 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया। यह 7 अगस्त के बाद का सबसे निचला स्तर है और लगातार चौथे कारोबारी सत्र में वैश्विक सोने की कीमत में कमजोरी दर्ज हुई। सोना 200-दिवसीय मूविंग एवरेज जैसे महत्वपूर्ण तकनीकी स्तर के नीचे बना हुआ है।
भारत में भी सोने पर दबाव अंतरराष्ट्रीय बाजार की कमजोरी का असर भारतीय बाजार पर भी दिखाई दिया। 2 सितंबर को MCX पर सोना करीब 1. 1 फीसदी गिरकर लगभग 1,50,074 रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार करता दिखा। कुछ कारोबार के दौरान गिरावट करीब 1,655 रुपये प्रति 10 ग्राम रही। चांदी में भी कमजोरी रही और MCX सिल्वर करीब 1.
42 फीसदी नीचे 2,32,097 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास कारोबार कर रही थी। दिल्ली के खुदरा बाजार में 2 सितंबर को 24 कैरेट सोने की कीमत करीब 1,54,230 रुपये प्रति 10 ग्राम बताई गई। खुदरा कीमतों में शहर, ज्वेलर, शुद्धता, मेकिंग चार्ज और अन्य शुल्क के कारण अंतर हो सकता है। यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट का असर भारत में सिर्फ वायदा बाजार तक सीमित नहीं है। स्थानीय सर्राफा बाजार में भी सोने के भाव कमजोर हुए हैं, हालांकि अलग-अलग शहरों और ज्वेलर्स के रेट एक समान नहीं होते।
अमेरिका-ईरान तनाव से क्यों गिरा सोना? आमतौर पर भू-राजनीतिक तनाव के समय सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन इस बार बाजार की प्रतिक्रिया अलग रही। अमेरिका और ईरान के बीच नए सैन्य हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। 2 सितंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 95.
68 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी WTI करीब 90.
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83 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। तेल की कीमतों में तेजी से वैश्विक महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका है। यही चिंता अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर बाजार की उम्मीदों को बदल रही है। यदि महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है तो फेडरल रिजर्व के लिए मौद्रिक नीति को नरम करना मुश्किल हो सकता है। ऊंची ब्याज दरों का असर सोने पर इसलिए पड़ता है क्योंकि सोना नियमित ब्याज या आय नहीं देता। जब सरकारी बॉन्ड जैसे ब्याज देने वाले निवेशों पर यील्ड बढ़ती है, तो निवेशकों के लिए सोने की तुलना में उन विकल्पों का आकर्षण बढ़ सकता है।
मजबूत डॉलर और Treasury Yield ने बढ़ाया दबाव अमेरिकी डॉलर भी मजबूत बना हुआ है। डॉलर में मजबूती आने पर दूसरी मुद्राओं में सोना खरीदने वाले निवेशकों के लिए इसकी कीमत अपेक्षाकृत महंगी हो जाती है। इससे अंतरराष्ट्रीय मांग पर दबाव पड़ सकता है। इसके साथ अमेरिकी Treasury yields में भी बढ़ोतरी हुई है। डॉलर और बॉन्ड यील्ड दोनों में मजबूती ने सोने पर अतिरिक्त दबाव बनाया है। इससे पहले 1 सितंबर को भी सोना 2 फीसदी से ज्यादा गिरकर दो हफ्ते के निचले स्तर पर पहुंच गया था।
फेड की ब्याज दर पर बाजार की नजर अब निवेशकों का मुख्य ध्यान अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सितंबर बैठक पर है। बाजार में सितंबर में ब्याज दर बढ़ाए जाने की संभावना काफी बढ़ चुकी है। उपलब्ध बाजार आकलन में CME FedWatch के अनुसार यह संभावना करीब 65-68 फीसदी के आसपास थी। फेड गवर्नर माइकल बार ने संकेत दिया है कि यदि महंगाई पर्याप्त तेजी से कम नहीं होती है तो ब्याज दर बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। इससे बाजार में यह धारणा मजबूत हुई है कि महंगे तेल के कारण पैदा होने वाला महंगाई दबाव फेड के अगले फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अमेरिकी रोजगार आंकड़े तय कर सकते हैं अगली दिशा अब अमेरिकी रोजगार बाजार से जुड़े आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण हैं। ADP रोजगार रिपोर्ट और शुक्रवार को आने वाले नॉनफार्म पेरोल्स के आंकड़ों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति और फेड की आगे की नीति को लेकर बाजार को संकेत मिल सकते हैं। कमजोर रोजगार आंकड़े ब्याज दर बढ़ोतरी की उम्मीदों को कम कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में Treasury yields और डॉलर पर दबाव आने से सोने को कुछ राहत मिल सकती है। इसके उलट मजबूत रोजगार आंकड़े और महंगाई को लेकर सख्त फेड रुख सोने की कीमतों पर दबाव बढ़ा सकता है। इसलिए आने वाले दिनों में सोने के लिए केवल अमेरिका-ईरान तनाव ही महत्वपूर्ण नहीं रहेगा। तेल की कीमत, डॉलर, Treasury yields, अमेरिकी महंगाई और रोजगार के आंकड़े मिलकर बाजार की दिशा तय करेंगे।
अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स भी फिसले अंतरराष्ट्रीय हाजिर बाजार के साथ अमेरिकी सोने के वायदा भाव में भी कमजोरी रही। दिसंबर डिलीवरी वाले अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स में करीब 1.1 फीसदी की गिरावट के साथ भाव 4,349.90 डॉलर प्रति औंस के आसपास रहा। यह अंतर बताता है कि हाजिर और वायदा दोनों बाजारों में बिकवाली का दबाव बना हुआ है। वैश्विक बाजार में सोना लगातार चौथे सत्र कमजोर रहा और तीन सप्ताह से ज्यादा समय के निचले स्तर तक पहुंच गया।
चांदी, प्लैटिनम और पैलेडियम भी कमजोर सोने की तरह दूसरी कीमती धातुओं में भी गिरावट दर्ज की गई। स्पॉट सिल्वर करीब 0. 9 फीसदी गिरकर 63. 68 डॉलर प्रति औंस पर आ गई। प्लैटिनम में भी करीब 0. 9 फीसदी की कमजोरी रही और यह 1,725. 03 डॉलर प्रति औंस के आसपास रहा। पैलेडियम करीब 1.
3 फीसदी गिरकर 1,293. 86 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। भारतीय बाजार में भी चांदी पर दबाव दिखा। MCX पर 2 सितंबर के कारोबार में सिल्वर करीब 1. 42 फीसदी नीचे 2,32,097 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास रही।
भारत के लिए तेल और रुपये का असर भी अहम भारत में सोने की कीमत केवल अंतरराष्ट्रीय गोल्ड रेट से तय नहीं होती। डॉलर-रुपया विनिमय दर भी घरेलू कीमतों को प्रभावित करती है। 2 सितंबर को बढ़ती तेल कीमतों और अमेरिकी Treasury yields के बीच रुपये पर भी दबाव की आशंका जताई गई। भारत अपनी बड़ी तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर घरेलू अर्थव्यवस्था, महंगाई और रुपये पर पड़ सकता है। रुपये में कमजोरी आती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना सस्ता होने के बावजूद भारत में उसकी कीमत पर गिरावट सीमित रह सकती है। यही वजह है कि भारतीय निवेशकों के लिए अंतरराष्ट्रीय गोल्ड प्राइस के साथ MCX, डॉलर-रुपया और घरेलू बुलियन बाजार के रेट को भी देखना जरूरी है।
अभी सोने के लिए कौन से संकेत महत्वपूर्ण हैं? फिलहाल सोने के बाजार में कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव तेल की कीमतों को ऊपर रख रहा है, जबकि महंगा तेल महंगाई की चिंता बढ़ा रहा है। इसके साथ मजबूत डॉलर और Treasury yields सोने की तेजी को सीमित कर रहे हैं। दूसरी ओर, यदि मध्य पूर्व का तनाव कम होता है, तेल की कीमतों में नरमी आती है या अमेरिकी आर्थिक आंकड़े कमजोर पड़ते हैं, तो ब्याज दर बढ़ने की उम्मीद घट सकती है। ऐसे माहौल में सोने को फिर से समर्थन मिल सकता है। फिलहाल बाजार के लिए अगला बड़ा संकेत अमेरिकी रोजगार आंकड़ों और फेड की ब्याज दर संबंधी टिप्पणियों से मिलेगा। भारत में निवेशकों को इसके साथ MCX गोल्ड, रुपये की चाल और स्थानीय सर्राफा बाजार के भाव पर भी नजर रखनी होगी।
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