नेपाल में विनाशकारी फ्लैश फ्लड के बाद राहत और बचाव अभियान जारी है। बाढ़ में अब तक 788 लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है, जबकि करीब 2,502 लोग लापता हैं। वहीं, लगभग 933 कर्मचारी विभिन्न हाइड्रोपावर परियोजनाओं में फंसे बताए जा रहे हैं। रासुवा और भोटेकोशी क्षेत्र में भारी तबाही के बीच शवों की पहचान, फंसे लोगों का रेस्क्यू और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को बहाल करना प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है।
नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने बड़े पैमाने पर जान-माल को नुकसान पहुंचाया है। 31 अगस्त तक नेपाल में मृतकों की संख्या 788 तक पहुंचने की जानकारी सामने आई है, जबकि हजारों लोग अब भी लापता हैं। करीब 933 लोगों के विभिन्न हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में फंसे होने की आशंका ने राहत और बचाव अभियान की चुनौती और बढ़ा दी है।
नेपाल के रासुवा जिले से शुरू हुई बाढ़ ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र के जरिए बड़े क्षेत्र को प्रभावित किया। बाढ़ के साथ पानी, मिट्टी, चट्टानों और मलबे का तेज बहाव आया, जिसने सड़कें, पुल, बस्तियां और हाइड्रोपावर परियोजनाओं से जुड़ी संरचनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। रासुवा, नुवाकोट, धादिंग और चितवन समेत कई जिले प्रभावित हुए हैं।
933 हाइड्रोपावर कर्मचारी फंसे होने की आशंका नेपाल की आपदा प्रबंधन एजेंसी के मुताबिक करीब आधा दर्जन हाइड्रोपावर परियोजनाओं में 933 कर्मचारी अब भी फंसे या लापता बताए जा रहे हैं। कई कर्मचारी परियोजनाओं की सुरंगों और कठिन पहाड़ी इलाकों में मौजूद थे, जहां बाढ़ और मलबे के कारण पहुंचना बेहद मुश्किल हो गया है। नेपाल की सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियां सुरंगों तक पहुंचने के लिए बचाव अभियान चला रही हैं। कुछ स्थानों पर बचावकर्मियों को ड्रिलिंग और भारी मशीनरी की मदद लेनी पड़ रही है। इससे पहले त्रिशूली-3ए हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग से 208 लोगों को जीवित बाहर निकाले जाने की खबर भी सामने आई थी।
788 मौतें, 2,500 से ज्यादा लोग लापता 31 अगस्त को सामने आई जानकारी के अनुसार नेपाल में बाढ़ से मरने वालों की संख्या 788 हो गई थी और करीब 2,502 लोग अभी भी लापता थे। राहत एजेंसियों के सामने एक बड़ी चुनौती बरामद शवों की पहचान और सुरक्षित संरक्षण की भी है। विदेश सचिव अमृत बहादुर राय के अनुसार बड़ी संख्या में शवों को सुरक्षित रखने के लिए फ्रीजर यूनिट और डीएनए जांच किट की जरूरत है। चितवन जिले में बाढ़ के साथ बहकर आए करीब 250 अज्ञात शवों की पहचान का काम भी चुनौती बना हुआ है। पहचान में देरी होने के कारण कुछ शवों को अस्थायी रूप से दफन करना पड़ा है। नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र को मिलाकर इस आपदा में मरने वालों की संख्या 797 से अधिक बताई गई है। हालांकि अलग-अलग समय पर जारी आंकड़ों में बदलाव हुआ है, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग अभी लापता हैं और बचाव दल लगातार नए शव बरामद कर रहे हैं।
आखिर कैसे आई इतनी भयावह बाढ़? प्रारंभिक आकलनों के अनुसार बाढ़ की शुरुआत नेपाल-चीन सीमा के पास ऊपरी हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के खिसकने से हुई। इस प्रक्रिया के कारण पानी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ और अस्थायी रूप से पानी जमा होने के बाद अचानक उसका दबाव बढ़ गया। इसके बाद पानी और मलबे का तेज बहाव भोटेकोशी नदी में पहुंचा और देखते ही देखते निचले इलाकों की ओर फैल गया। WHO के अनुसार शुरुआती जानकारी में चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से भोटेकोशी में अचानक पानी बढ़ने और ल्हेंदे नदी के अस्थायी अवरोध से इसका संबंध सामने आया है। हालांकि घटना के पूरे भूगर्भीय कारण की पुष्टि के लिए आकलन जारी है। वैज्ञानिक आकलनों में यह भी सामने आया है कि जिस भूकंपीय संकेत को शुरुआती दौर में भूकंप से जोड़ा गया था, वह संभवतः खुद ग्लेशियर या चट्टानी ढांचे के टूटने से पैदा हुआ हो सकता है। इसलिए आपदा के सटीक कारण को लेकर अंतिम निष्कर्ष अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है।
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बाढ़ ने हाइड्रोपावर और परिवहन ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचाया बाढ़ का असर केवल आबादी वाले इलाकों तक सीमित नहीं रहा। हाइड्रोपावर परियोजनाएं, बिजली से जुड़ी संरचनाएं, सड़कें और पुल भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। रासुवागढ़ी सीमा क्षेत्र में कस्टम कार्यालय, इमिग्रेशन पोस्ट और मितेरी पुल के बह जाने की जानकारी सामने आई है। बाढ़ ने बड़ी संख्या में वाहनों को भी बहा दिया। कई नदी निगरानी केंद्र भी पानी और मलबे की चपेट में आकर नष्ट हो गए। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के अनुसार कई प्रमुख हाइड्रोपावर और ट्रांसमिशन सुविधाओं को नुकसान पहुंचने से बिजली उत्पादन और राष्ट्रीय ग्रिड पर भी असर पड़ा है।
हजारों लोगों को बचाया गया, लेकिन चुनौती बरकरार आपदा के बाद नेपाल सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल को बड़े पैमाने पर राहत एवं बचाव अभियान में लगाया गया। बचाव दलों ने प्रभावित क्षेत्रों से हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला है। रविवार तक 8,000 से ज्यादा लोगों को जीवित बचाए जाने की जानकारी सामने आई थी। हालांकि पहाड़ी भूभाग, खराब मौसम, क्षतिग्रस्त सड़कें और लगातार बने हुए भूस्खलन के खतरे के कारण कई इलाकों तक पहुंचना अभी भी मुश्किल है। कुछ स्थानों पर नदी के जलस्तर और नए जलभराव के खतरे के कारण बचाव अभियान को अस्थायी रूप से रोकना भी पड़ा।
शवों की पहचान बनी बड़ी चुनौती आपदा के कई दिन बाद राहत अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा शवों की बरामदगी और पहचान बन गया है। तेज बहाव में शव कई किलोमीटर दूर तक बहकर चले गए, जिससे उन्हें मूल स्थान से अलग जिलों में बरामद किया जा रहा है। चितवन में बड़ी संख्या में अज्ञात शव पहुंचने के बाद प्रशासन और फोरेंसिक टीमों पर दबाव बढ़ गया है। डीएनए नमूने, तस्वीरें और अन्य पहचान संबंधी जानकारी दर्ज की जा रही है ताकि परिवारों को अपने लापता परिजनों की पहचान करने में मदद मिल सके।
नेपाल को अंतरराष्ट्रीय मदद आपदा के बाद कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने नेपाल की मदद की है। भारत, चीन, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य देशों की ओर से राहत सामग्री, आर्थिक सहायता या विशेषज्ञ सहयोग की घोषणा की गई है। भारत ने राहत सामग्री उपलब्ध कराई है, जबकि अन्य देशों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भी बचाव, चिकित्सा और मानवीय सहायता में सहयोग की पेशकश की है। 31 अगस्त को चीन ने नेपाल के बाढ़ पीड़ितों के लिए 2.2 मिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। इसमें चीनी सरकार की ओर से करीब 2 मिलियन डॉलर और चीनी रेड क्रॉस की ओर से 200,000 डॉलर की सहायता शामिल है।
जलवायु और हिमालयी जोखिम पर फिर ध्यान इस आपदा ने हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों पर भी ध्यान केंद्रित किया है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने इसे हिमालयी पर्यावरण की संवेदनशीलता का गंभीर उदाहरण बताया है। वैज्ञानिक और स्थानीय समुदाय लंबे समय से हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों और जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों को लेकर चेतावनी देते रहे हैं। हालांकि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करना वैज्ञानिक रूप से जल्दबाजी होगी। लेकिन हिमालय में ग्लेशियरों और बर्फीली झीलों में बदलाव तथा चरम मौसम की घटनाओं के बढ़ते जोखिम ने आपदा तैयारी और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को महत्वपूर्ण बना दिया है।
नेपाल के सामने अब राहत से पुनर्वास की चुनौती फिलहाल नेपाल की प्राथमिकता लापता लोगों की तलाश, सुरंगों में फंसे कर्मचारियों को निकालना, शवों की पहचान, घायलों का इलाज और प्रभावित परिवारों तक जरूरी सहायता पहुंचाना है। इसके साथ ही क्षतिग्रस्त सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करना भी बड़ी चुनौती होगी। नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने मौजूदा स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए कहा है कि रासुवा और भोटेकोशी क्षेत्र में नुकसान का पूरा आकलन करना कठिन बना हुआ है। खराब मौसम, कठिन पहाड़ी भूगोल और लगातार मौजूद जोखिमों के बीच बचाव और राहत अभियान जारी है। नेपाल की यह आपदा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। बड़ी संख्या में लोग लापता हैं और हाइड्रोपावर परियोजनाओं में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने का अभियान जारी है। इसलिए आने वाले दिनों में मृतकों, लापता लोगों और आर्थिक नुकसान के आंकड़ों में बदलाव संभव है।
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