भारत में राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं के गाली देने पर शुरू हुई बहस अब लैंगिक भेदभाव तक पहुंच गई है। पीएम मोदी की टिप्पणी के बाद राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि पुरुषों और महिलाओं के लिए भाषा के अलग-अलग नियम क्यों हों। विवाद के बीच सोशल मीडिया पर एक 15 वर्षीय लड़की को धमकियों का मामला भी सामने आया।
भारत में हाल के राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान कुछ युवा महिलाओं के गाली देने के मामले ने नई बहस शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि महिलाओं की भाषा पर ही ज्यादा सवाल क्यों किए जा रहे हैं। मामला अब भाषा के साथ-साथ लड़के और लड़कियों के लिए अलग सोच से भी जुड़ गया है।
राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर समेत कई जगहों पर Cockroach Janta Party (CJP) के प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में शिक्षा में सुधार और परीक्षा में पेपर लीक जैसे मुद्दे उठाए गए। इसी दौरान कुछ युवा महिला प्रदर्शनकारियों के वीडियो सामने आए, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया था। इन वीडियो पर प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने महिलाओं की भाषा को ‘culture shock’ बताया और कहा कि सभ्य समाज में इस तरह की भाषा ठीक नहीं मानी जाती। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कम उम्र में गलतियां हो सकती हैं और युवाओं को अपनी गलती सुधारने का मौका मिलना चाहिए।
राहुल गांधी ने महिलाओं को लेकर अलग सोच पर सवाल उठाया पुणे में छात्रों के एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर मोदी की टिप्पणी को लेकर सवाल किया। उनका कहना था कि प्रदर्शन में पुरुषों ने भी आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था, फिर महिलाओं के मामले को अलग से क्यों देखा गया?
राहुल गांधी ने इसे समाज की पुरानी सोच से जोड़ते हुए कहा कि लड़कों को जिस तरह की आजादी मिलती है, वही आजादी लड़कियों को भी मिलनी चाहिए। उनके मुताबिक, किसी के व्यवहार को सिर्फ इस आधार पर अलग नजर से नहीं देखा जाना चाहिए कि वह पुरुष है या महिला। 15 साल की लड़की को ऑनलाइन धमकियां मिलने का मामला विवाद का एक गंभीर पहलू सोशल मीडिया पर भी सामने आया। एक 15 साल की लड़की का वीडियो वायरल होने के बाद उसे ऑनलाइन गालियों और धमकियों का सामना करना पड़ा। बाद में लड़की ने अपने शब्दों के लिए माफी मांगी और वीडियो हटाने की बात कही।
लड़की की मां के अनुसार, मामला इतना बढ़ गया कि परिवार को कई बार घर बदलना पड़ा। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस के दौरान किसी को धमकाने और परेशान करने के तरीके पर भी सवाल उठे। क्या महिलाओं का गाली देना नई बात है? जेंडर मामलों पर लिखने वाली पत्रकार नमिता भंडारे का कहना है कि भारत में महिलाओं के गाली या अपशब्द बोलने की बात नई नहीं है। उन्होंने उत्तर भारत की कुछ शादियों का उदाहरण दिया, जहां दुल्हन पक्ष की महिलाएं बारात के स्वागत के दौरान ऐसे गीत गाती हैं जिनमें अपशब्द होते हैं। कई जगहों पर इसे परंपरा के तौर पर स्वीकार किया जाता है।
इसी वजह से यह सवाल उठ रहा है कि जब कुछ सामाजिक मौकों पर महिलाओं की ऐसी भाषा को सामान्य माना जाता है, तो राजनीतिक प्रदर्शन में उनके गाली देने पर इसे अलग नजर से क्यों देखा जाता है।
गाली-गलौज सिर्फ प्रदर्शनों तक सीमित नहीं सार्वजनिक जीवन में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। टीवी बहसों, संसद और दूसरे सार्वजनिक मंचों पर भी नेताओं और दूसरी सार्वजनिक हस्तियों के बीच तीखी भाषा और व्यक्तिगत हमले देखने को मिलते रहे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता सुनील जालान लंबे समय से गाली-गलौज के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। उनके संगठन के एक सर्वे में 28 राज्यों और आठ केंद्रशासित प्रदेशों के 70 हजार से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया था। सर्वे में 55 प्रतिशत लोगों ने अपशब्दों के इस्तेमाल की बात स्वीकार की।
किन राज्यों में ज्यादा लोगों ने गाली देने की बात मानी? 2025 के Gali Map of India के अनुसार, कुछ उत्तरी राज्यों में अपशब्दों के इस्तेमाल की जानकारी ज्यादा मिली। सर्वे में दिल्ली में यह आंकड़ा 80 प्रतिशत, पंजाब में 78 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश तथा बिहार में 74 प्रतिशत बताया गया। दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्यों में यह आंकड़ा 44 प्रतिशत से कम रहा। पूर्वोत्तर में यह करीब 15 से 18 प्रतिशत के बीच बताया गया। इन आंकड़ों को पूरे समाज का अंतिम सच नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये सर्वे में शामिल लोगों के जवाबों पर आधारित हैं।
युवा प्रदर्शनकारी इसे विरोध का तरीका मानते हैं CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने BBC से बातचीत में कहा कि विरोध और तीखी भाषा का संबंध लंबे समय से रहा है। उनके मुताबिक, प्रदर्शनकारी कई बार जानबूझकर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं ताकि ज्यादा लोगों का ध्यान उनके मुद्दे की ओर जाए।
समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन ने भी सार्वजनिक जीवन में बढ़ती गाली-गलौज को बड़ी समस्या से जोड़ा। उनका कहना है कि जब बातचीत और तर्क कमजोर पड़ते हैं, तो बहस में अपशब्दों का इस्तेमाल बढ़ सकता है। पूरे विवाद में दो बातें साथ-साथ सामने आ रही हैं। पहली बात यह कि सार्वजनिक जगहों पर किसी के खिलाफ गाली-गलौज को सही माना जाए या नहीं। दूसरी बात यह कि क्या पुरुषों और महिलाओं के लिए भाषा और व्यवहार को लेकर समाज के नियम अलग हैं।
महिलाओं के गाली देने पर उठे सवाल ने इसी फर्क को चर्चा के बीच ला दिया है। एक तरफ सार्वजनिक बातचीत में सम्मानजनक भाषा की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि महिलाओं के मामले में भाषा को उनके संस्कार और सामाजिक भूमिका से क्यों जोड़ा जाता है। यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ एक राजनीतिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि महिला-पुरुष के लिए समाज की अलग सोच पर भी चर्चा हो रही है।
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