अल्ज़ाइमर रोग की शुरुआती पहचान को आसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। अमेरिकी FDA ने Elecsys p Tau 181 ब्लड टेस्ट को मंजूरी दी है, जबकि आने वाले समय में यह जांच समुदाय स्तर की क्लीनिकों तक पहुंचने की तैयारी में है।
"अल्ज़ाइमर रोग की शुरुआती पहचान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रगति सामने आई है। अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने Elecsys p Tau 181 नाम के एक ब्लड टेस्ट को मंजूरी दी है। यह जांच मस्तिष्क में अल्ज़ाइमर से जुड़ी एमिलॉयड प्लाक की मौजूदगी का संकेत देने वाले टाउ (Tau) प्रोटीन के एक विशेष रूप को मापती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे रोग की पहचान पहले की तुलना में अधिक आसान और कम जटिल हो सकती है।
अब तक अल्ज़ाइमर की पुष्टि के लिए PET स्कैन या अन्य उन्नत जांचों का सहारा लेना पड़ता था, जो महंगी होने के साथ हर अस्पताल या क्लीनिक में उपलब्ध भी नहीं होती हैं। ऐसे में ब्लड टेस्ट आधारित जांच स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
पिवोटल स्टडीज़ में Elecsys p Tau 181 टेस्ट ने 97.9 प्रतिशत का नेगेटिव प्रेडिक्टिव वैल्यू (Negative Predictive Value) दर्ज किया। इसका अर्थ यह है कि यदि जांच में अल्ज़ाइमर की संभावना नहीं दिखाई देती है, तो अधिकांश मामलों में यह निष्कर्ष सही पाया गया। इससे चिकित्सकों को यह तय करने में मदद मिलेगी कि किन मरीजों को आगे PET स्कैन जैसी महंगी और विशेष जांच की आवश्यकता है और किन्हें नहीं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की शुरुआती स्क्रीनिंग से अस्पतालों पर अनावश्यक जांच का बोझ कम हो सकता है। साथ ही मरीजों और उनके परिवारों को समय रहते आगे की चिकित्सकीय योजना बनाने में भी सुविधा मिलेगी।
रिपोर्टों के अनुसार, यह ब्लड टेस्ट 2026 की शुरुआत तक समुदाय स्तर की क्लीनिकों में उपलब्ध कराया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो बड़ी संख्या में लोगों को कम इनवेसिव और अपेक्षाकृत सरल जांच का लाभ मिलेगा। इससे स्मृति संबंधी शुरुआती शिकायतों वाले मरीजों की जांच पहले से अधिक तेजी से की जा सकेगी।
इसी दौरान अमेरिका में NIH के सहयोग से p-tau 217 जैसे नए बायोमार्कर पर भी शोध जारी है। शुरुआती अध्ययनों में यह बायोमार्कर बीमारी शुरू होने के संभावित समय का तीन से चार वर्ष के दायरे में अनुमान लगाने की क्षमता दिखा रहा है। हालांकि इस तकनीक पर अभी और अध्ययन तथा व्यापक सत्यापन की आवश्यकता बनी हुई है।
इलाज के क्षेत्र में भी कुछ नई दवाओं ने उम्मीद जगाई है। Leqembi (lecanemab) और Kisunla (donanemab) जैसी दवाओं के क्लीनिकल परीक्षणों में शुरुआती चरण के मरीजों में संज्ञानात्मक क्षमता में आने वाली गिरावट को लगभग 27 से 35 प्रतिशत तक धीमा करने के परिणाम सामने आए हैं। इसके बावजूद इन दवाओं के उपयोग को लेकर उनकी लागत, संभावित दुष्प्रभाव और किन मरीजों के लिए वे उपयुक्त होंगी, जैसे मुद्दों पर चिकित्सा समुदाय में चर्चा जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में ब्लड टेस्ट नियमित शुरुआती जांच का हिस्सा बनता है, तो स्मृति से जुड़ी समस्याओं वाले लोगों को बीमारी की आशंका का पता पहले चल सकेगा। इससे परिवारों को उपचार संबंधी विकल्पों पर विचार करने, आर्थिक और सामाजिक योजना बनाने तथा जीवनशैली में आवश्यक बदलाव अपनाने के लिए अधिक समय मिल सकता है। नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी जैसे उपायों पर भी अधिक ध्यान दिया जा सकेगा।
हालांकि चिकित्सक यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल बायोमार्कर पॉजिटिव आने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति में अल्ज़ाइमर के क्लीनिकल लक्षण निश्चित रूप से विकसित होंगे। इसलिए किसी भी ब्लड टेस्ट के परिणाम की व्याख्या विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह के साथ ही की जानी चाहिए। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त जांच, काउंसलिंग और नियमित फॉलो-अप भी उपचार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेंगे।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अल्ज़ाइमर की जल्द पहचान की दिशा में यह प्रगति महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे अंतिम निदान का विकल्प नहीं माना जा सकता। आने वाले वर्षों में यदि ब्लड टेस्ट व्यापक स्तर पर उपलब्ध होता है, तो यह शुरुआती जांच की प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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