युगांडा के कई कॉफी उत्पादक क्षेत्रों में किसान पुनर्योजी कृषि तकनीकों को अपनाकर जलवायु परिवर्तन और सूखे की चुनौती का सामना कर रहे हैं। मिट्टी की सेहत, जल संरक्षण और जैव-विविधता पर आधारित खेती से कॉफी उत्पादन में सुधार देखने को मिला है।
"पूर्वी अफ्रीकी देश युगांडा में जलवायु परिवर्तन और लगातार पड़ रहे सूखे के बीच कॉफी किसानों ने खेती का ऐसा मॉडल अपनाया है, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी नई उम्मीद जगाई है। मसाका समेत कई कॉफी उत्पादक इलाकों में किसान पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture) की तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका असर केवल उत्पादन बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता, पानी के संरक्षण और खेतों की दीर्घकालिक उत्पादकता पर भी सकारात्मक रूप से दिखाई दे रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार, रोबस्टा कॉफी की खेती करने वाले किसानों ने मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा बढ़ाने, वर्षा जल को अधिक समय तक रोककर रखने और खेतों में जैव-विविधता को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया है। कम बारिश के बावजूद कई किसानों को पहले की तुलना में बेहतर उत्पादन मिला है। इससे यह संकेत मिलता है कि खेती के पारंपरिक तरीकों में बदलाव कर जलवायु संकट के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
युगांडा के बुलेला नाबुम्बुगु क्षेत्र की किसान नाकियेम्बा हाज़िया इसका एक प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने अपने सात एकड़ के कॉफी फार्म में बायोचार आधारित उर्वरकों का उपयोग शुरू किया। इसके साथ ही मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए खेतों में ट्रेंच तैयार किए गए और छाया देने वाले पेड़ लगाए गए। इन उपायों से मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व भी बेहतर तरीके से मिलते हैं। इसका असर कॉफी की फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर देखा गया है।
मसाका क्षेत्र में एक पायलट कार्यक्रम के तहत किसानों को बेहतर पौधे उपलब्ध कराने के लिए नई नर्सरी और ""मदर गार्डन"" विकसित किए जा रहे हैं। इनका उद्देश्य मजबूत और जलवायु परिस्थितियों का सामना करने वाली रोबस्टा कॉफी की किस्मों को किसानों तक पहुंचाना है। इससे भविष्य में अधिक टिकाऊ उत्पादन प्रणाली तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पुनर्योजी कृषि केवल उर्वरकों का विकल्प नहीं है, बल्कि यह खेती की पूरी प्रणाली को अधिक संतुलित बनाने का तरीका है। इसमें मिट्टी को जीवित बनाए रखने, पेड़-पौधों की संख्या बढ़ाने, जैविक पदार्थों का उपयोग करने और खेतों में पानी के प्राकृतिक प्रवाह को नियंत्रित करने पर जोर दिया जाता है। इससे भूमि की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है और फसलें मौसम की अनिश्चितताओं का बेहतर सामना कर पाती हैं।
जिन इलाकों में पहले लगातार सूखे और अनियमित बारिश के कारण कॉफी उत्पादन प्रभावित हो रहा था, वहां अब बड़े आकार और बेहतर गुणवत्ता वाले कॉफी बीन्स मिलने लगे हैं। कई किसानों ने खेतों में छोटे-छोटे जल अवरोधक ढांचे बनाए हैं, जिससे बारिश का पानी तेजी से बहने के बजाय जमीन में समा जाता है। इसके साथ खेतों में लगाए गए पेड़ तापमान को नियंत्रित रखने और मिट्टी की नमी बचाने में भी मदद कर रहे हैं।
इस बदलाव का असर केवल कॉफी तक सीमित नहीं है। जिन खेतों में पुनर्योजी कृषि अपनाई गई है, वहां अन्य फसलों की स्थिति भी पहले की तुलना में बेहतर बताई जा रही है। मिट्टी की गुणवत्ता सुधरने से खेती की लागत पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और किसानों की आय अधिक स्थिर बनने की संभावना बढ़ती है।
वैश्विक स्तर पर भी इस मॉडल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण कई कॉफी उत्पादक देशों में उत्पादन प्रभावित हुआ है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। यदि टिकाऊ खेती के ऐसे मॉडल अधिक क्षेत्रों में अपनाए जाते हैं, तो भविष्य में कॉफी की वैश्विक आपूर्ति को अधिक स्थिर बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इससे उपभोक्ताओं को गुणवत्ता और उपलब्धता दोनों के स्तर पर लाभ मिलने की संभावना रहेगी।
युगांडा के किसानों का यह अनुभव दूसरे देशों के लिए भी उपयोगी माना जा रहा है। भारत सहित ऐसे क्षेत्रों में, जहां सूखा, अनियमित मानसून और मिट्टी की गिरती गुणवत्ता खेती के सामने बड़ी चुनौती बन रही है, वहां स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार पुनर्योजी कृषि की तकनीकों पर काम करने की संभावनाएं बढ़ रही हैं। छोटे स्तर पर किए गए ऐसे प्रयोग यह दिखाते हैं कि जलवायु परिवर्तन से मुकाबला केवल बड़े निवेश से ही नहीं, बल्कि खेत स्तर पर अपनाए गए व्यावहारिक उपायों से भी किया जा सकता है।
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