देश में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के साथ आग लगने के जोखिम भी बढ़ रहे हैं, लेकिन कई राज्यों में फायर स्टेशन, उपकरण और प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता अभी भी आवश्यक मानकों से पीछे है। एक हालिया विश्लेषण ने फायर सेफ्टी व्यवस्था और शहरी विकास के बीच मौजूद असंतुलन को रेखांकित किया है।
"भारत के शहर तेजी से फैल रहे हैं। नए आवासीय प्रोजेक्ट, ऊंची इमारतें, औद्योगिक क्षेत्र और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स लगातार बढ़ रहे हैं। लेकिन इसी रफ्तार से फायर सेफ्टी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित नहीं हो पाया है। बिज़नेस स्टैंडर्ड की “डेटानोमिक्स” रिपोर्ट में सामने आया है कि बढ़ते शहरी जोखिमों के बावजूद देश की फायर सर्विस कई जगहों पर संसाधनों की कमी से जूझ रही है।
रिपोर्ट के अनुसार कई राज्यों में फायर स्टेशन, फायर टेंडर और प्रशिक्षित कर्मचारियों की संख्या निर्धारित जरूरतों से कम है। यह स्थिति तब है जब शहरी आबादी और घनी बस्तियों का विस्तार लगातार हो रहा है। ऊंची इमारतों और बड़े वाणिज्यिक परिसरों में किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए विशेष उपकरणों और प्रशिक्षित मानव संसाधन की आवश्यकता होती है, लेकिन कई इलाकों में यह क्षमता सीमित बनी हुई है।
विश्लेषण बताता है कि शहरी विस्तार और सुरक्षा व्यवस्था के बीच तालमेल की कमी एक बड़ी चुनौती बन रही है। कई नए विकसित क्षेत्रों में रियल एस्टेट परियोजनाएं तेजी से खड़ी हो जाती हैं, जबकि उनके अनुरूप फायर स्टेशन या आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र विकसित होने में समय लगता है। इसका असर किसी दुर्घटना की स्थिति में प्रतिक्रिया समय पर पड़ सकता है।
पुराने शहरों की स्थिति अलग लेकिन उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। संकरी गलियां, अव्यवस्थित निर्माण, बिजली के तारों का जाल और ज्वलनशील सामग्री का अनियंत्रित भंडारण आग की घटनाओं को अधिक गंभीर बना सकता है। कई स्थानों पर बड़े फायर टेंडरों का प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है, जिससे राहत और बचाव कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
रिपोर्ट में फायर सेफ्टी ऑडिट की प्रक्रिया पर भी ध्यान दिलाया गया है। कई मामलों में सुरक्षा ऑडिट समय पर नहीं हो पाते या फिर उनकी रिपोर्टों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती। नियमों के तहत इमरजेंसी एग्जिट, फायर अलार्म, स्प्रिंकलर सिस्टम और नियमित फायर ड्रिल"
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