ग्रामीण विकास मंत्रालय की DAY-NRLM योजना के तहत शुरू की गई नई राष्ट्रीय मुहिम का लक्ष्य 50,000 जमीनी महिला नेताओं को प्रशिक्षित कर 50 लाख ग्रामीण महिलाओं को उद्यमिता से जोड़ना है। इस पहल के तहत महिलाओं को बिज़नेस ट्रेनिंग, माइक्रो-फाइनेंस, डिजिटल कौशल और बाजार से जुड़ने में मदद दी जाएगी, ताकि वे छोटे व्यवसाय शुरू कर अपनी आय बढ़ा सकें।
भारत के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की भूमिका लंबे समय तक परिवार, खेती और घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित मानी जाती रही है। लेकिन पिछले एक दशक में यह तस्वीर तेजी से बदली है। अब लाखों महिलाएं न केवल स्वयं सहायता समूहों (SHG) के जरिए बचत और ऋण गतिविधियों से जुड़ रही हैं, बल्कि छोटे व्यवसाय भी चला रही हैं। इसी बदलाव को अगले स्तर तक ले जाने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत संचालित दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) ने एक नई राष्ट्रीय मुहिम शुरू की है।
इस पहल का उद्देश्य 50,000 जमीनी महिला नेताओं को प्रशिक्षित करना और उनके माध्यम से अगले कुछ वर्षों में 50 लाख ग्रामीण महिलाओं को उद्यमिता की मुख्यधारा से जोड़ना है। सरकार का लक्ष्य केवल महिलाओं को स्वरोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसे उद्यम खड़े करने के लिए तैयार करना है जो स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा कर सकें।
ग्रामीण भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने को लेकर पिछले कई वर्षों से प्रयास किए जा रहे हैं। स्वयं सहायता समूहों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन समूहों ने महिलाओं को बचत की आदत विकसित करने, बैंकिंग प्रणाली से जुड़ने और छोटे ऋण प्राप्त करने का अवसर दिया। इसके परिणामस्वरूप लाखों महिलाओं ने डेयरी, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और अन्य घरेलू व्यवसाय शुरू किए।
हालांकि नीति निर्माताओं का मानना है कि अब समय केवल छोटे स्तर की आय गतिविधियों तक सीमित रहने का नहीं है। नई रणनीति महिलाओं को "रोजगार खोजने वाली" से "रोजगार देने वाली" बनाने पर केंद्रित है। यही वजह है कि नई मुहिम में उद्यमिता, बाजार संपर्क, वित्तीय प्रबंधन और व्यवसाय विस्तार पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
इस अभियान के पहले चरण में 50,000 "ग्रासरूट लीडर्स" यानी जमीनी महिला नेताओं को प्रशिक्षित किया जाएगा। ये महिलाएं अपने-अपने क्षेत्रों में अन्य महिलाओं को व्यवसाय शुरू करने, वित्तीय योजना बनाने, बाजार समझने और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करने में मदद करेंगी। इस मॉडल का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर नेतृत्व विकसित करना है ताकि प्रशिक्षण केवल शहरों तक सीमित न रहे।
Continue Reading3 जून 2026
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी का प्रभाव केवल व्यक्तिगत आय तक सीमित नहीं रहता। कई अध्ययनों में पाया गया है कि जब महिलाओं की आय बढ़ती है तो उसका सकारात्मक असर परिवार की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण पर भी पड़ता है। यही कारण है कि महिला उद्यमिता को सामाजिक और आर्थिक विकास दोनों से जोड़कर देखा जाता है।
नई मुहिम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि महिलाओं को पारंपरिक गतिविधियों से आगे बढ़ाकर नए क्षेत्रों में अवसर तलाशने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। अब फोकस केवल सिलाई, कढ़ाई या डेयरी जैसे व्यवसायों तक सीमित नहीं रहेगा। महिलाओं को कृषि प्रसंस्करण, ई-कॉमर्स, डिजिटल सेवाओं, स्थानीय पर्यटन और ग्रामीण नवाचार आधारित व्यवसायों से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है।
भारत में डिजिटल तकनीक की पहुंच बढ़ने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी नए अवसर पैदा हुए हैं। मोबाइल इंटरनेट और ऑनलाइन मार्केटप्लेस ने छोटे उद्यमियों को बड़े बाजार तक पहुंचने का मौका दिया है। पहले जहां गांव में बना उत्पाद केवल स्थानीय बाजार तक सीमित रहता था, वहीं अब उसे देश के दूसरे हिस्सों तक भी बेचा जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि महिलाओं को सही प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच मिले तो वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा बदल सकती हैं। कई राज्यों में इसके उदाहरण पहले ही देखने को मिल चुके हैं, जहां महिला समूहों ने खाद्य उत्पाद, हस्तशिल्प और कृषि आधारित व्यवसायों के जरिए उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने में विभिन्न सामाजिक उद्यम और इन्क्यूबेशन संस्थान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। तेलंगाना का WE Hub जैसे संस्थान महिला उद्यमियों को व्यवसायिक मार्गदर्शन, निवेशकों तक पहुंच, कानूनी सलाह और विपणन सहायता उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसे मॉडल अब देश के अन्य हिस्सों में भी चर्चा का विषय बन रहे हैं।
Continue Reading3 जून 2026
हाल के वर्षों में महिलाओं द्वारा संचालित व्यवसायों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2026 तक नए व्यवसाय पंजीकरणों में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी महिलाओं की हो चुकी है। यह बदलाव केवल महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि कुछ दशक पहले तक उद्यमिता को मुख्य रूप से पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। सामाजिक धारणाओं, पूंजी की कमी और सीमित अवसरों के कारण महिलाओं के लिए व्यवसाय शुरू करना आसान नहीं था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसी महिलाएं सामने आई हैं जिन्होंने छोटे स्तर से शुरुआत कर अपने व्यवसाय को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। ऐसी कहानियां अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का काम कर रही हैं। कुछ उद्यमियों ने स्थानीय उत्पादों को ब्रांड के रूप में विकसित किया है, जबकि कुछ ने डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर नए बाजार तैयार किए हैं।
नई राष्ट्रीय मुहिम का एक प्रमुख उद्देश्य महिलाओं को वित्तीय संसाधनों तक आसान पहुंच दिलाना भी है। कई बार व्यवसाय शुरू करने की इच्छा होने के बावजूद पूंजी की कमी सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। माइक्रो-फाइनेंस, बैंकिंग सहायता और सरकारी योजनाओं के जरिए इस समस्या को कम करने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही बाजार से जुड़ाव पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। केवल उत्पाद बनाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसे सही ग्राहक तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। इसलिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों में विपणन, ब्रांडिंग और डिजिटल बिक्री जैसे विषयों को शामिल किया जा रहा है।
इस पहल का असर केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहेगा। यदि लक्ष्य के अनुसार लाखों महिलाएं छोटे और मध्यम स्तर के उद्यम स्थापित करती हैं, तो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं। कई व्यवसाय ऐसे होंगे जो स्थानीय स्तर पर एक से पांच लोगों को काम दे सकेंगे। इससे गांवों में आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित हो सकते हैं।
ग्रामीण भारत लंबे समय से रोजगार के लिए शहरों की ओर होने वाले पलायन की चुनौती का सामना करता रहा है। यदि स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के अवसर बढ़ते हैं तो कुछ हद तक इस प्रवृत्ति को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव आने वाले वर्षों में ही स्पष्ट होगा।
Continue Reading2 जून 2026
युवा महिलाओं और छात्राओं के लिए भी यह अभियान महत्वपूर्ण संदेश देता है। लंबे समय तक नौकरी को ही आर्थिक सफलता का प्रमुख रास्ता माना जाता रहा है, लेकिन उद्यमिता अब एक वैकल्पिक और आकर्षक विकल्प के रूप में उभर रही है। प्रशिक्षण और सहयोग मिलने पर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं भी सफल व्यवसाय स्थापित कर सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि महिला उद्यमिता केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है। जब महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत होती हैं तो परिवार और समुदाय में उनकी निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ती है। इससे व्यापक सामाजिक बदलाव की संभावनाएं पैदा होती हैं।
हालांकि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। वित्तीय साक्षरता, डिजिटल कौशल, बाजार तक पहुंच और सामाजिक बाधाएं कई क्षेत्रों में महिलाओं की प्रगति को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए केवल प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि लंबे समय तक सहयोग और मार्गदर्शन की भी आवश्यकता होगी।
फिर भी, 50 लाख ग्रामीण महिलाओं को उद्यमिता से जोड़ने का लक्ष्य देश के ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि यह अभियान अपने उद्देश्यों के अनुरूप आगे बढ़ता है, तो इसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत आय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गांवों की स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक संरचना पर भी दिखाई दे सकता है। ग्रामीण भारत में महिला नेतृत्व और उद्यमिता को बढ़ावा देने की यह कोशिश ऐसे समय में हो रही है जब देश आर्थिक विकास के नए चरण की ओर बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में यह अभियान इस बात की परीक्षा भी होगा कि प्रशिक्षण, वित्त और बाजार समर्थन के जरिए किस तरह लाखों महिलाओं को आर्थिक रूप से अधिक सक्षम बनाया जा सकता है।
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3 जून 2026