अमेरिका में एक नई किताब के बाद स्कूलों में मोबाइल, टैबलेट और अन्य डिजिटल उपकरणों के उपयोग को लेकर बहस तेज हो गई है। कई स्कूल बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम, मानसिक स्वास्थ्य और ध्यान क्षमता पर पड़ने वाले असर को देखते हुए मोबाइल प्रतिबंध और पारंपरिक किताबों की ओर लौटने पर विचार कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर #ScreenFreeSchools और #BackToBooks जैसे अभियान भी ट्रेंड कर रहे हैं। वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक को पूरी तरह हटाने के बजाय उसका संतुलित और जिम्मेदार उपयोग ही बेहतर समाधान है। भारत में भी डिजिटल शिक्षा और स्क्रीन टाइम के बीच संतुलन बनाने को लेकर चर्चा बढ़ रही है।
पिछले एक दशक में शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। स्मार्ट क्लासरूम, ऑनलाइन असाइनमेंट, डिजिटल नोट्स और टैबलेट आधारित पढ़ाई अब दुनिया के कई देशों में आम बात हो चुकी है। कोविड-19 महामारी के बाद तो डिजिटल शिक्षा को और अधिक बढ़ावा मिला। लेकिन अब इसी मॉडल पर सवाल उठने लगे हैं।
अमेरिका में हाल ही में प्रकाशित एक नई किताब ने शिक्षा जगत में बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। यह किताब बच्चों के जीवन में बढ़ते स्क्रीन टाइम और स्कूलों में डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक उपयोग के संभावित दुष्प्रभावों पर केंद्रित है। किताब के सामने आने के बाद कई शिक्षकों, अभिभावकों और नीति निर्माताओं ने यह सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि क्या तकनीक पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता बच्चों के विकास को प्रभावित कर रही है।
यही वजह है कि अमेरिका में "स्क्रीन-फ्री स्कूल" की चर्चा तेजी से फैल रही है और इसका असर अब अन्य देशों तक भी पहुंच रहा है।
सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे अभियान किताब के प्रकाशित होने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर #ScreenFreeSchools, #BackToBooks और #DigitalDetoxForKids जैसे हैशटैग तेजी से ट्रेंड करने लगे हैं।
इन अभियानों के समर्थकों का कहना है कि बच्चों का अधिकांश समय पहले ही मोबाइल फोन, वीडियो प्लेटफॉर्म, गेमिंग और सोशल मीडिया पर बीत रहा है। ऐसे में अगर स्कूलों में भी पढ़ाई पूरी तरह स्क्रीन आधारित हो जाए तो बच्चों का वास्तविक दुनिया से जुड़ाव कम हो सकता है। कई माता-पिता ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि लंबे समय तक स्क्रीन देखने के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई जैसी परेशानियां बढ़ी हैं।
स्कूलों में बदल रही नीतियां रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका के कुछ स्कूल जिलों ने कक्षा में व्यक्तिगत मोबाइल फोन के उपयोग को सीमित करने पर विचार शुरू किया है।
कुछ स्कूलों में छात्रों के लिए मोबाइल फोन को लॉकर्स में रखने की व्यवस्था पर चर्चा हो रही है। वहीं कुछ संस्थान लिखित परीक्षाओं और कागज आधारित मूल्यांकन को फिर से बढ़ावा देने की योजना बना रहे हैं।
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कई शिक्षकों का मानना है कि पारंपरिक किताबों के साथ पढ़ाई करने पर छात्रों की एकाग्रता बेहतर रहती है। उनका कहना है कि स्क्रीन पर पढ़ते समय छात्रों का ध्यान बार-बार भटक सकता है, जबकि किताब पढ़ने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत अधिक केंद्रित होती है।
क्या सचमुच स्क्रीन टाइम नुकसान पहुंचा रहा है? विशेषज्ञों के बीच इस विषय पर पूरी तरह एक राय नहीं है, लेकिन कई शोध यह संकेत देते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के व्यवहार और स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है।
कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा देर रात तक मोबाइल या टैबलेट इस्तेमाल करने से नींद की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार डिजिटल कंटेंट देखने से बच्चों की ध्यान क्षमता कम होने का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि समस्या केवल तकनीक नहीं बल्कि उसके उपयोग के तरीके में है।
तकनीक के पक्ष में भी हैं मजबूत तर्क इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही मजबूत है। कई शिक्षक और शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि आज की दुनिया में तकनीक से पूरी तरह दूरी बनाना व्यावहारिक नहीं है। उनका कहना है कि डिजिटल कौशल भविष्य की नौकरियों और आधुनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म, इंटरैक्टिव कंटेंट, वर्चुअल लैब और एआई आधारित शिक्षा उपकरण कई छात्रों के लिए सीखने की प्रक्रिया को आसान और रोचक बनाते हैं।
Continue Reading2 जून 2026
विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा ने गुणवत्तापूर्ण सामग्री तक पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक को हटाने के बजाय उसका संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना अधिक उचित होगा। भारत में भी शुरू हुई चर्चा अमेरिका में शुरू हुई यह बहस भारत में भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है।
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के बाद देश में डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है। कई राज्यों ने स्मार्ट क्लासरूम, ऑनलाइन सामग्री और तकनीक आधारित शिक्षण मॉडल को अपनाया है।
इसके साथ ही एडटेक कंपनियों का विस्तार भी तेजी से हुआ है। लाखों छात्र ऑनलाइन कोर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पढ़ाई कर रहे हैं।
लेकिन दूसरी ओर कई अभिभावक अब बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर चिंतित दिखाई दे रहे हैं। परीक्षा के दौरान कई परिवार "डिजिटल डिटॉक्स" जैसे प्रयोग अपना रहे हैं, जिसमें बच्चों के मोबाइल और सोशल मीडिया उपयोग को सीमित किया जाता है।
महामारी के बाद बदली सोच कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई एक आवश्यकता बन गई थी। उस समय मोबाइल फोन और लैपटॉप ही शिक्षा का प्रमुख माध्यम बन गए थे।
हालांकि स्कूल खुलने के बाद कई शिक्षकों ने महसूस किया कि लगातार ऑनलाइन रहने की आदत का असर छात्रों के व्यवहार और सामाजिक कौशल पर भी पड़ा है।
Continue Reading3 जून 2026
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को केवल डिजिटल दुनिया में सीमित रखने के बजाय उन्हें खेल, समूह गतिविधियों और आमने-सामने संवाद के अवसर भी मिलने चाहिए। क्या है संतुलित रास्ता? शिक्षा विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इस बहस का समाधान तकनीक को पूरी तरह अपनाने या पूरी तरह छोड़ने में नहीं है।
उनका सुझाव है कि स्कूलों में डिजिटल उपकरणों का उपयोग केवल उन परिस्थितियों में किया जाए जहां वे वास्तव में सीखने की प्रक्रिया को बेहतर बनाते हों।
इसके साथ ही बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय की जा सकती है। स्कूलों और परिवारों को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें किताबें, खेल, रचनात्मक गतिविधियां और तकनीक सभी का संतुलित उपयोग हो। भविष्य की शिक्षा कैसी होगी?
आने वाले वर्षों में शिक्षा व्यवस्था में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), वर्चुअल रियलिटी और अन्य नई तकनीकों की भूमिका और बढ़ने की संभावना है। लेकिन साथ ही यह बहस भी जारी रहेगी कि तकनीक का कितना उपयोग उचित है और कहां उसकी सीमा तय की जानी चाहिए।
अमेरिका में शुरू हुई "स्क्रीन-फ्री स्कूल" चर्चा ने दुनिया भर के शिक्षा विशेषज्ञों को एक महत्वपूर्ण सवाल पर सोचने के लिए मजबूर किया है—क्या बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए तकनीक ही सबसे बड़ा समाधान है, या फिर किताबों, खेल और मानवीय संवाद की पारंपरिक भूमिका आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?
फिलहाल इसका जवाब किसी एक पक्ष के पास नहीं है। लेकिन इतना तय है कि शिक्षा का भविष्य केवल डिजिटल या केवल पारंपरिक नहीं होगा, बल्कि दोनों के बीच संतुलन खोजने की कोशिशों से तय होगा।
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2 जून 2026