अमेरिका–ईरान संघर्ष दो महीने से ज्यादा लंबा खिंच चुका है और इसकी लागत 29 अरब डॉलर के पार पहुंच गई है। बावजूद इसके, युद्ध विराम बेहद कमजोर स्थिति में है और स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाज़ार और अर्थव्यवस्था की चिंता बढ़ा दी है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष अब सिर्फ मिसाइलों और हवाई हमलों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल सप्लाई और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए भी बड़ा संकट बनता जा रहा है। दो महीने से ज्यादा समय से चल रहे इस युद्ध में अमेरिका को अब तक कम से कम 29 अरब डॉलर की लागत उठानी पड़ी है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है और आने वाले हफ्तों में इसमें और तेजी देखी जा सकती है।
हालांकि अप्रैल में घोषित अस्थायी युद्ध विराम से उम्मीद जगी थी कि हालात सामान्य हो सकते हैं, लेकिन अब वही युद्ध विराम बेहद कमजोर स्थिति में दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी हाल ही में इसे “ऑन लाइफ़ सपोर्ट” बताया, जिससे साफ संकेत मिला कि दोनों देशों के बीच भरोसा लगभग खत्म हो चुका है।
युद्ध की शुरुआत फरवरी के आखिर में हुई थी, जब अमेरिका और इज़रायल ने मिलकर ईरान के कई सैन्य ठिकानों, मिसाइल नेटवर्क और सरकारी ढांचों पर बड़े पैमाने पर हमले किए। इन हमलों का मकसद ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना बताया गया था। इसके जवाब में ईरान ने भी अमेरिकी हितों और समुद्री मार्गों को निशाना बनाते हुए कई चेतावनी भरे कदम उठाए।
स्थिति तब कुछ नरम होती दिखी जब अप्रैल में पाकिस्तान में शुरुआती बातचीत हुई और उसके बाद दो हफ्तों के लिए युद्ध विराम लागू किया गया। लेकिन यह समझौता स्थायी शांति में नहीं बदल सका। दोनों पक्षों के बीच कई अहम मुद्दों पर गहरी दूरी बनी रही।
अब नए दौर की बातचीत में ईरान ने युद्ध समाप्ति, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत, जमे हुए विदेशी परिसंपत्तियों की बहाली और स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ में मालवाहक जहाज़ों की निर्बाध आवाजाही जैसी मांगें रखी हैं। ट्रंप प्रशासन ने इन शर्तों को “अव्यावहारिक” और “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताते हुए खारिज कर दिया। इसके बाद ईरानी नेतृत्व ने भी सख्त रुख अपनाया और चेतावनी दी कि अगर संघर्ष दोबारा तेज हुआ तो अमेरिका को “अप्रत्याशित जवाब” मिल सकता है।
अमेरिकी कांग्रेस में हुई हालिया सुनवाई में कार्यवाहक पेंटागन कम्प्ट्रोलर ने बताया कि युद्ध की लागत तेजी से बढ़ रही है। दो हफ्ते पहले जहां यह आंकड़ा लगभग 25 अरब डॉलर बताया गया था, वहीं अब यह बढ़कर 29 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। इसमें लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइलें, टॉमहॉक मिसाइल, पैट्रियट इंटरसेप्टर सिस्टम और अन्य हाई-टेक हथियारों के इस्तेमाल की भारी लागत शामिल है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका अब तक 1,100 से ज्यादा स्टेल्थ क्रूज़ मिसाइलें और 1,000 से अधिक टॉमहॉक मिसाइलें इस्तेमाल कर चुका है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या सामान्य सालाना उत्पादन और खरीद से कहीं ज्यादा है। इसका असर भविष्य के हथियार भंडार पर भी पड़ सकता है।
हालांकि पेंटागन सार्वजनिक रूप से यह दावा कर रहा है कि अमेरिकी सेना के पास “जरूरी मिशन पूरे करने के लिए पर्याप्त संसाधन” हैं, लेकिन बंद कमरे की बैठकों में सहयोगी देशों को हथियार सप्लाई में देरी की आशंकाओं को लेकर भरोसा दिलाना पड़ रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि युद्ध का दबाव सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी बढ़ रहा है।
दूसरी तरफ, खुफिया रिपोर्टों से यह भी सामने आया है कि ईरान की सैन्य क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आकलनों के मुताबिक ईरान अपनी लगभग 70 प्रतिशत मिसाइल क्षमता अब भी बचाए हुए है। देशभर में उसके 70 प्रतिशत से ज्यादा मोबाइल लॉन्चर अभी भी सक्रिय बताए जा रहे हैं।
सबसे ज्यादा चिंता स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ को लेकर है। यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। रिपोर्टों के मुताबिक होरमुज़ के आसपास मौजूद 33 मिसाइल साइटों में से 30 तक ईरान की दोबारा पहुंच बन चुकी है। इसका मतलब यह है कि अमेरिकी युद्धपोतों और अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों पर खतरा अब भी बना हुआ है।
यही वजह है कि वैश्विक बाजार लगातार अस्थिर बने हुए हैं। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है और कई देशों को ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता सता रही है। मध्य पूर्व के विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर युद्ध विराम पूरी तरह टूट गया तो अगला चरण पहले से ज्यादा महंगा और खतरनाक हो सकता है।
एक तरफ अमेरिका को लगातार बढ़ती सैन्य लागत, हथियारों के भंडार और घरेलू राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है, वहीं दूसरी तरफ ईरान आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद सैन्य रूप से अभी भी मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है। यही संतुलन इस संघर्ष को और जटिल बना रहा है।
भारत समेत कई विकासशील देशों पर भी इसका असर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर पेट्रोल और डीजल के दामों से लेकर रोजमर्रा की चीजों तक पहुंच सकता है। महंगाई बढ़ने का खतरा पहले ही बाजारों में महसूस किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर होरमुज़ में तनाव और बढ़ा या तेल सप्लाई प्रभावित हुई तो इसका असर सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा। नौकरी, निवेश, शेयर बाजार और रुपया–डॉलर विनिमय दर पर भी दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या दोनों देश किसी नए समझौते तक पहुंच पाएंगे या फिर यह संघर्ष एक और बड़े सैन्य टकराव में बदल जाएगा।
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