राजस्थान सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने के लिए ‘राज-ममता’ पहल शुरू की है। इस योजना के तहत जयपुर में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, हर ज़िले में मेंटल हेल्थ सेल और Tele-MANAS जैसी सेवाओं के विस्तार से लोगों को घर के पास ही काउंसलिंग और मदद मिल सकेगी।
राजस्थान में अब मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है। राज्य सरकार ने 2026-27 बजट के तहत ‘राज-ममता’ नाम की नई पहल शुरू करने का ऐलान किया है, जिसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को गांव-गांव और ज़िला स्तर तक पहुंचाना है। लंबे समय तक मानसिक तनाव, डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी समस्याएं समाज में “छिपी हुई बीमारी” मानी जाती रहीं, लेकिन अब सरकार इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के एक अहम हिस्से के रूप में देख रही है।
इस नई पहल के तहत जयपुर में मानसिक स्वास्थ्य का एक अत्याधुनिक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जाएगा। इसके अलावा राज्य के हर ज़िला मुख्यालय पर मेंटल हेल्थ केयर सेल स्थापित किए जाएंगे। इन केंद्रों पर काउंसलिंग, टेली-मेडिसिन, मनोवैज्ञानिक सहायता और रिहैबिलिटेशन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इसका सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हो सकता है जो अब तक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों तक पहुंच ही नहीं बना पाते थे।
सरकार की यह योजना मौजूदा राष्ट्रीय टेली-मेंटल हेल्थ प्रोग्राम Tele-MANAS को और मज़बूत करेगी। Tele-MANAS पहले से ही राजस्थान में हजारों लोगों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता दे रहा है। आंकड़ों के मुताबिक अब तक राज्य में 71 हजार से अधिक लोग इस हेल्पलाइन के ज़रिए टेलीफोनिक काउंसलिंग ले चुके हैं। हेल्पलाइन नंबर 14416 और 1800-891-4416 के माध्यम से लोग सीधे विशेषज्ञों से बात कर सकते हैं।
जयपुर में मई 2023 और जोधपुर में नवंबर 2023 से यह सेवा सक्रिय है। अब ‘राज-ममता’ के आने के बाद उम्मीद की जा रही है कि यह नेटवर्क और ज़्यादा मज़बूत होगा। खास बात यह है कि इस योजना का फोकस सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शुरुआती पहचान और जागरूकता पर भी रहेगा।
नई योजना के तहत स्कूलों और कॉलेजों में विशेष काउंसलिंग सत्र आयोजित किए जाएंगे। छात्रों के बीच बढ़ते स्ट्रेस, सोशल मीडिया प्रेशर, करियर की चिंता और अकेलेपन जैसी समस्याओं को देखते हुए यह कदम काफी अहम माना जा रहा है। इसके अलावा ASHA कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि वे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े शुरुआती संकेतों को पहचान सकें और समय रहते लोगों को मदद दिला सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि सामाजिक झिझक भी है। आज भी कई परिवार डिप्रेशन, एंग्जायटी या भावनात्मक तनाव को “कमज़ोरी” मानते हैं। लोग खुलकर मदद मांगने से डरते हैं क्योंकि उन्हें समाज के जजमेंट का डर रहता है। ऐसे माहौल में सरकार का इस विषय पर खुलकर निवेश करना एक बड़ा सामाजिक संदेश माना जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में महामारी, बेरोज़गारी, आर्थिक दबाव, जलवायु संकट और डिजिटल लाइफस्टाइल ने मानसिक तनाव को तेजी से बढ़ाया है। युवाओं में एंग्जायटी और बर्नआउट के मामले बढ़े हैं, जबकि बुज़ुर्गों में अकेलेपन और भावनात्मक असुरक्षा की समस्या सामने आई है। ऐसे समय में अगर जिला स्तर पर संवेदनशील और आसानी से उपलब्ध सेवाएं मिलती हैं, तो यह लाखों लोगों के लिए राहत बन सकती है।
ग्रामीण और छोटे शहरों के लोगों के लिए यह पहल खास तौर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अभी तक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ ज्यादातर बड़े शहरों तक सीमित थे। कई परिवारों को इलाज के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता था, जिससे समय और पैसे दोनों की परेशानी होती थी। लेकिन अगर ज़िला स्तर पर मेंटल हेल्थ सेल सही तरीके से काम करते हैं, तो लोगों को अपने ही शहर में सहायता मिल सकेगी।
सामाजिक स्तर पर भी इस पहल को एक सकारात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत होना आज भी भारतीय समाज में आसान नहीं है। लेकिन जब सरकार खुद इस मुद्दे को प्राथमिकता देती है, हेल्पलाइन शुरू करती है और ट्रेनिंग पर निवेश करती है, तो परिवारों के लिए भी इस विषय पर बातचीत करना थोड़ा आसान हो जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य सिर्फ बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और बेहतर जीवन गुणवत्ता से भी जुड़ा हुआ विषय है। अगर किसी व्यक्ति को समय पर सही सलाह और काउंसलिंग मिल जाए, तो कई गंभीर स्थितियों को शुरुआत में ही संभाला जा सकता है।
राजस्थान की ‘राज-ममता’ पहल को इसी सोच के साथ देखा जा रहा है। यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि उस सोच में बदलाव की शुरुआत हो सकती है जहां मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए जितनी डायबिटीज, ब्लड प्रेशर या अन्य शारीरिक बीमारियों को दी जाती है।
अगर यह मॉडल ज़मीन पर प्रभावी तरीके से लागू होता है, तो आने वाले समय में राजस्थान मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में दूसरे राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह पहल उन लोगों को आवाज़ देने की कोशिश कर रही है जो लंबे समय से अपने दर्द को चुपचाप छिपाकर जी रहे थे।
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