संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2026 को “इंटरनेशनल ईयर ऑफ़ द वुमन फ़ार्मर” घोषित किए जाने के बाद भारत में महिला किसानों की भूमिका को नई पहचान मिलने लगी है। खेतों में मेहनत करने वाली महिलाएं अब सिर्फ सहायक नहीं, बल्कि फैसले लेने वाली किसान और कृषि नवाचार की अगुवाई करने वाली ताकत के रूप में सामने आ रही हैं।
भारत के गांवों में सुबह का एक आम दृश्य है—सिर पर घास का बोझ, हाथ में बीज की थैली और खेत में घंटों मेहनत करती महिलाएं। लेकिन विडंबना यह रही कि जिन महिलाओं ने वर्षों तक खेती की असली जिम्मेदारी संभाली, उन्हें अक्सर “किसान” की पहचान ही नहीं मिली। अब यह तस्वीर बदलने की शुरुआत हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2026 को “इंटरनेशनल ईयर ऑफ़ द वुमन फ़ार्मर” घोषित किए जाने के बाद दुनिया भर में महिला किसानों की भूमिका पर नई चर्चा शुरू हो गई है, और भारत इस बदलाव के केंद्र में दिखाई दे रहा है।
संयुक्त राष्ट्र और खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की इस पहल का मकसद सिर्फ सम्मान देना नहीं, बल्कि उस अदृश्य मेहनत को औपचारिक पहचान दिलाना है जिस पर पूरी खाद्य व्यवस्था टिकी हुई है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहां खेतों में काम करने वाली महिलाओं की संख्या करोड़ों में है, लेकिन जमीन के कागज़ों, बैंकिंग रिकॉर्ड और सरकारी योजनाओं में उनकी मौजूदगी बेहद सीमित है।
ग्रामीण भारत में लंबे समय से खेती को पुरुषों का पेशा माना जाता रहा है। महिलाएं खेत में बोवाई से लेकर कटाई तक हर काम करती हैं, पशुपालन संभालती हैं, पानी लाती हैं और बीज सुरक्षित रखती हैं, लेकिन जब “मुख्य किसान” की बात आती है तो उनका नाम पीछे छूट जाता है। अब सोशल मीडिया कैंपेन, सरकारी कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय मंच इस सोच को चुनौती दे रहे हैं।
2026 के अभियान में सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया जा रहा है कि “किसान” शब्द किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है। कैंपेन पोस्टरों और वीडियो में भारतीय महिलाओं को खेतों में नई तकनीक अपनाते, बाजार में फसल का दाम तय करते और जल संरक्षण के फैसले लेते हुए दिखाया जा रहा है। इससे यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि खेती सिर्फ शारीरिक मेहनत नहीं, बल्कि ज्ञान, प्रबंधन और वैज्ञानिक सोच का भी काम है।
बिहार, झारखंड, राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्यों में कई संगठनों ने महिला किसानों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं। इन कार्यक्रमों में महिलाओं को रीजेनेरेटिव एग्रीकल्चर की तकनीकें सिखाई जा रही हैं। इसमें मल्चिंग, इंटर-क्रॉपिंग, जैविक खाद का उपयोग और पानी बचाने वाले तरीके शामिल हैं। इन तकनीकों का मकसद सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत को सुधारना और जलवायु परिवर्तन के असर को कम करना भी है।
बिहार के कुछ जिलों में महिला किसान समूहों ने सामूहिक खेती की शुरुआत की है। यहां महिलाएं मिलकर बीज बैंक चला रही हैं और रासायनिक खाद पर निर्भरता घटाने की दिशा में काम कर रही हैं। कई गांवों में महिलाएं मोबाइल ऐप और व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिए मौसम की जानकारी और बाजार भाव भी हासिल कर रही हैं। इससे उनकी आर्थिक समझ और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत हो रही है।
सोशल मीडिया पर चल रही कहानियां भी इस बदलाव को नई ताकत दे रही हैं। कई महिलाओं ने साझा किया कि परिवार के पुरुष सदस्यों के शहरों में काम करने चले जाने के बाद खेत की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। शुरुआत में उन्हें बैंक, मंडी और सरकारी दफ्तरों में गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खुद फैसले लेना सीखा और खेती को संभाला। आज ऐसी महिलाएं गांवों में दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि महिला किसानों को औपचारिक पहचान मिलने से सिर्फ कृषि क्षेत्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। जब जमीन महिला के नाम पर दर्ज होती है, तो उसे सीधे बैंक से लोन लेने, सरकारी सब्सिडी पाने और किसान योजनाओं में रजिस्ट्रेशन कराने का अधिकार मिलता है। इससे आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ती है और घरेलू फैसलों में उनकी भागीदारी मजबूत होती है।
कई अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि महिलाएं आमतौर पर अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा, पोषण और घर की बुनियादी जरूरतों पर खर्च करती हैं। यही कारण है कि महिला किसानों को सशक्त बनाने को सिर्फ कृषि सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक विकास से भी जोड़कर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि महिलाओं को बराबरी का अवसर मिले, तो कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा दोनों में बड़ा सुधार हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में महिला किसानों की भूमिका और अहम मानी जा रही है। गांवों में पानी बचाने, पारंपरिक बीज सुरक्षित रखने और कम संसाधनों में खेती करने की जो समझ महिलाओं के पास है, उसे अब “लोकल नॉलेज” के रूप में महत्व दिया जा रहा है। कई जगहों पर महिलाएं सूखा-रोधी फसलों और जैविक खेती के प्रयोग भी कर रही हैं।
हालांकि चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में कई महिलाएं आज भी जमीन के मालिकाना हक से वंचित हैं। कृषि प्रशिक्षण कार्यक्रमों और तकनीकी संसाधनों तक उनकी पहुंच सीमित है। कई बार सामाजिक दबाव और पारिवारिक सोच भी उन्हें आगे बढ़ने से रोकती है। लेकिन इसके बावजूद बदलाव की रफ्तार अब पहले से तेज दिखाई दे रही है।
“इंटरनेशनल ईयर ऑफ़ द वुमन फ़ार्मर” सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय अभियान नहीं, बल्कि उस सोच को बदलने की कोशिश है जिसने दशकों तक महिला किसानों की मेहनत को अनदेखा किया। भारत में यह पहल उन लाखों महिलाओं को नई पहचान देने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है जो वर्षों से खेतों में काम कर रही थीं, लेकिन कभी “मुख्य किसान” नहीं कहलायीं।
आने वाले वर्षों में अगर नीतियां, बैंकिंग व्यवस्था और कृषि योजनाएं सचमुच महिला केंद्रित बनती हैं, तो देश की खेती की तस्वीर बदल सकती है। तब खेतों में काम करती महिलाएं सिर्फ मजदूर या सहायक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच रखने वाली निर्णयकर्ता किसान के रूप में पहचानी जाएंगी। “मैं भी किसान, मैं भी वैज्ञानिक” का संदेश अब धीरे-धीरे गांवों से निकलकर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।
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