अमेरिका की पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (EPA) ने पावर प्लांट से निकलने वाले पारे और दूसरी जहरीली भारी धातुओं पर सख्त नियंत्रण वाले नियमों को वापस ले लिया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर आने वाले वर्षों में बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर समुदायों की सेहत पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।
अमेरिका में पर्यावरण नीति को लेकर एक बड़ा और विवादित फैसला सामने आया है। अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी यानी EPA ने हाल ही में उन सख्त संशोधनों को वापस ले लिया है, जो 2024 में बिजलीघरों और पावर प्लांट से निकलने वाले पारे (Mercury) और दूसरी भारी धातुओं के उत्सर्जन को सीमित करने के लिए लागू किए गए थे। इस फैसले के बाद स्वास्थ्य विशेषज्ञों, पर्यावरण वैज्ञानिकों और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों ने गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह कदम आने वाले समय में लाखों लोगों की सेहत के लिए खतरा बन सकता है।
ये नियम “Mercury and Air Toxics Standards” यानी MATS के नाम से जाने जाते हैं। इनका मकसद कोयला आधारित बिजलीघरों से निकलने वाले जहरीले प्रदूषण को कम करना था। पावर प्लांट से निकलने वाले धुएँ में पारा, आर्सेनिक, निकेल और दूसरी भारी धातुएँ शामिल होती हैं, जो हवा और पानी के जरिए इंसानी शरीर तक पहुँच जाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये तत्व शरीर में जमा होकर लंबे समय तक नुकसान पहुँचाते हैं।
हार्वर्ड टी. एच.
चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर इन नियमों में ढील जारी रही, तो बच्चों के मस्तिष्क विकास, फेफड़ों की क्षमता और दिल से जुड़ी बीमारियों में वृद्धि हो सकती है। खासतौर पर गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ता है। डॉक्टरों का कहना है कि पारा शरीर के नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुँचाता है और बच्चों की सीखने की क्षमता तथा मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव डाल सकता है।
Continue Reading7 मई 2026
EPA के इस फैसले के समर्थन में उद्योग समूह और कुछ ऊर्जा कंपनियाँ सामने आई हैं। उनका तर्क है कि पुराने नियमों के कारण कोयला आधारित बिजलीघरों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा था। कंपनियों का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण तकनीक लगाने और उसे लगातार बनाए रखने में अरबों डॉलर खर्च हो रहे थे, जिससे बिजली उत्पादन की लागत बढ़ रही थी। उनका दावा है कि इससे आम लोगों के बिजली बिल भी प्रभावित हो सकते हैं।
उद्योग समूहों का यह भी कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में नई तकनीकों और बाजार की प्रतिस्पर्धा के कारण उत्सर्जन पहले ही काफी कम हो चुका है। उनके अनुसार अब पहले जैसी सख्ती की जरूरत नहीं है और अत्यधिक नियमों से उद्योगों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है। कुछ कंपनियाँ इसे “ओवर-रेगुलेशन” बता रही हैं।
हालांकि सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि उद्योगों की लागत की तुलना में लोगों की सेहत कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों के अनुसार अस्पतालों में इलाज का खर्च, बीमारियों से होने वाला आर्थिक नुकसान और समय से पहले होने वाली मौतों की कीमत कहीं अधिक होती है। उनका मानना है कि सख्त पर्यावरण नियम लंबे समय में देश की अर्थव्यवस्था को ही फायदा पहुँचाते हैं।
Continue Reading5 मई 2026
पर्यावरण वैज्ञानिकों ने एक और बड़ी चिंता जताई है। उनका कहना है कि पारा और भारी धातुएँ एक बार वातावरण और जल स्रोतों में पहुँच जाएँ, तो उन्हें पूरी तरह साफ करना लगभग असंभव हो जाता है। ये तत्व नदियों, झीलों और समुद्रों में जाकर मछलियों और दूसरे जीवों के शरीर में जमा हो जाते हैं। फिर यही जहरीले तत्व खाने की चेन के जरिए इंसानों तक पहुँचते हैं। वैज्ञानिक इसे “वन-वे टिकट” जैसी स्थिति बता रहे हैं, यानी नुकसान होने के बाद उसे वापस ठीक करना बेहद मुश्किल हो जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले का सबसे ज्यादा असर उन समुदायों पर पड़ेगा जो पहले से आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर हैं। अमेरिका में कोयला आधारित बिजलीघरों के आसपास रहने वाले लोग अक्सर कम आय वाले और हाशिए पर मौजूद समुदायों से आते हैं। ऐसे इलाकों में पहले से ही प्रदूषण का स्तर ज्यादा रहता है। अब नियमों में ढील से इन इलाकों में जहरीली हवा और पानी की समस्या और बढ़ सकती है।
इसके अलावा क्लीन एनर्जी सेक्टर पर भी इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका में स्वच्छ ऊर्जा और उत्सर्जन नियंत्रण तकनीकों में तेजी से निवेश बढ़ रहा था। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार पर्यावरण नियमों को कमजोर करती है, तो ग्रीन एनर्जी और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े नए रोजगारों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। इससे स्वच्छ ऊर्जा उद्योग को भी झटका लग सकता है।
Continue Reading6 मई 2026
राजनीतिक स्तर पर भी यह फैसला चर्चा का विषय बना हुआ है। पर्यावरण संगठनों का आरोप है कि सरकार उद्योगों के दबाव में आकर सार्वजनिक स्वास्थ्य से समझौता कर रही है। वहीं दूसरी ओर कुछ राजनीतिक समूह इसे आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी कदम बता रहे हैं। अमेरिका में पर्यावरण नीति लंबे समय से राजनीति और उद्योग के बीच बहस का बड़ा मुद्दा रही है, और यह फैसला उसी बहस का नया अध्याय माना जा रहा है।
भारत जैसे देशों के लिए भी यह मामला एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। तेजी से औद्योगिक विकास कर रहे देशों के सामने भी यही चुनौती है कि आर्थिक विकास, रोजगार और पर्यावरण सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरण नीति केवल तकनीकी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, राजनीति, रोजगार और सामाजिक न्याय से जुड़ा बड़ा सवाल है।
वैज्ञानिक समुदाय लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि पर्यावरण से जुड़े फैसले वैज्ञानिक डेटा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के आधार पर लिए जाने चाहिए। उनका मानना है कि अगर अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए पर्यावरण सुरक्षा को कमजोर किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
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6 मई 2026