जोधपुर का सर्किट हाउस ऑस्कर विजेता निर्देशक सत्यजीत रे की फिल्म ‘सोनार किला’ की शूटिंग की वजह से खास पहचान रखता है। पश्चिम बंगाल से आने वाले सिने प्रेमी इसे सांस्कृतिक और भावनात्मक विरासत मानते हैं। लोग यहां ठहरकर फिल्म से जुड़ी यादों को जीते हैं और भारतीय सिनेमा के उस दौर को महसूस करते हैं, जब उसने दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई थी। अब सर्किट हाउस सिर्फ सरकारी विश्राम गृह नहीं, बल्कि सिनेमा, संस्कृति और यादों का जीवंत केंद्र बन चुका है।
यह जगह सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सिनेमा प्रेमियों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। ऑस्कर विजेता निर्देशक सत्यजीत रे की अमर फिल्म ‘सोनार किला’ की शूटिंग जोधपुर के सर्किट हाउस में हुई थी, और यही वजह है कि यह स्थान आज भी खास पहचान रखता है।
सूर्यनगरी जोधपुर आमतौर पर अपने किलों, महलों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जानी जाती है, लेकिन शहर का सर्किट हाउस सिनेमा और संस्कृति के अनोखे मेल की मिसाल बन चुका है। दशकों पहले यहां ‘सोनार किला’ की शूटिंग हुई थी, जिसने इस जगह को खासतौर पर पश्चिम बंगाल से आने वाले सिने प्रेमियों के दिल के बेहद करीब ला दिया।
आज भी बंगाल से आने वाले लोग इस सर्किट हाउस को किसी भावनात्मक विरासत की तरह देखते हैं। फिल्म से जुड़ी यादों को ताजा करने के लिए वे यहां ठहरते हैं, तस्वीरें लेते हैं और उस दौर को महसूस करने की कोशिश करते हैं जब भारतीय सिनेमा ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई थी।
सर्किट हाउस प्रबंधन के मुताबिक, बंगाल से आने वाले मेहमानों का यह भावनात्मक जुड़ाव जोधपुर को एक नया सांस्कृतिक आयाम देता है। अब यह सरकारी विश्राम गृह सिर्फ ठहरने की जगह नहीं, बल्कि सिने इतिहास और यादों का जीवंत केंद्र बन गया है।
सर्किट हाउस के स्टाफ का कहना है कि पश्चिम बंगाल से आने वाले मेहमानों का लगाव केवल फिल्म तक सीमित नहीं रहता। पारंपरिक स्वागत, सहज व्यवहार और अपनापन उन्हें घर जैसा एहसास कराता है। यही कारण है कि सिने प्रेमी बार-बार यहां रुकते हैं और सत्यजीत रे व ‘सोनार किला’ से जुड़ी यादों को फिर से जीते हैं।
इस मानवीय जुड़ाव ने सर्किट हाउस को एक साधारण सरकारी भवन से आगे बढ़ाकर सांस्कृतिक और भावनात्मक धरोहर का रूप दे दिया है। पश्चिम बंगाल से आए एक पर्यटक ने बताया कि ‘सोनार किला’ उनके लिए सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि बचपन और बंगाली संस्कृति की अहम याद है।
उनका कहना है कि जोधपुर सर्किट हाउस पहुंचकर ऐसा लगता है जैसे वे सीधे फिल्म के उसी दौर में लौट गए हों। हर कोना सिनेमा के इतिहास की कहानी कहता है। उनके लिए उस जगह को करीब से देखना, जहां सत्यजीत रे ने शूटिंग की थी, किसी सपने के पूरे होने जैसा अनुभव है।
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