अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) द्वारा ग्रीनहाउस गैसों और भारी धातुओं पर पुराने पर्यावरणीय सुरक्षा नियमों को कमजोर करने के फैसले ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सिर्फ नीति बदलाव नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और क्लाइमेट सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम बन सकता है।
दुनिया जब लगातार बढ़ते तापमान, जहरीली हवा और चरम मौसम की घटनाओं से जूझ रही है, उसी समय अमेरिका से एक ऐसा फैसला आया जिसने पर्यावरण विशेषज्ञों और स्वास्थ्य वैज्ञानिकों को चौंका दिया। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी यानी EPA ने 2009 की उस ऐतिहासिक “एंडेंजरमेंट फाइंडिंग” को कमजोर करने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जिसने पहली बार आधिकारिक तौर पर माना था कि ग्रीनहाउस गैसें मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा हैं।
यह वही कानूनी आधार था जिसके सहारे अमेरिका ने पिछले कई वर्षों में क्लीन एयर नियम लागू किए थे। वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन से लेकर कोयला आधारित पावर प्लांट्स तक, कई बड़े उद्योगों पर पर्यावरणीय नियंत्रण इसी फैसले के कारण लागू हुए थे। लेकिन अब इस आधार को कमजोर करने की कोशिश ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक जलवायु संकट को लेकर पीछे हट रही है?
मामला सिर्फ ग्रीनहाउस गैसों तक सीमित नहीं है। हाल ही में EPA ने पावर प्लांट्स से निकलने वाली मरकरी, कैडमियम, लेड, निकल और क्रोमियम जैसी भारी धातुओं पर बने सख्त नियमों में भी ढील दी है। इन जहरीले तत्वों को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका में Mercury and Air Toxics Standards यानी MATS लागू किए गए थे। 2012 से यह नियम कोयला आधारित बिजलीघरों पर लागू थे और 2024 में इनमें और सख्ती की गई थी ताकि कम गुणवत्ता वाले कोयले का इस्तेमाल करने वाले प्लांट्स भी प्रदूषण नियंत्रण के दायरे में आ सकें।
अब EPA द्वारा इन सुधारों को वापस लेने की प्रक्रिया ने वैज्ञानिक समुदाय में गंभीर चिंता पैदा कर दी है। हार्वर्ड T.H. Chan School of Public Health के विशेषज्ञों ने JAMA में प्रकाशित रिपोर्ट में साफ कहा कि ऐसे कदमों का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सीधे मानव स्वास्थ्य पर दिखाई देगा।
विशेषज्ञों के अनुसार मरकरी और अन्य भारी धातुएं हवा के जरिए शरीर में पहुंचकर फेफड़ों, दिल और दिमाग को प्रभावित करती हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से बच्चों के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है, गर्भवती महिलाओं में जटिलताएं बढ़ सकती हैं और बुजुर्गों में सांस और दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कई गुना तक बढ़ सकता है।
हार्वर्ड की डॉक्टर Mary Rice और पर्यावरण वैज्ञानिक Elsie Sunderland ने चेतावनी दी कि एयर पॉल्यूशन के प्रभाव धीरे-धीरे ही नहीं, बल्कि कई बार तुरंत भी सामने आते हैं। प्रदूषित हवा एयरवे को सिकोड़ सकती है, ब्लड क्लॉटिंग बढ़ा सकती है और दिल पर अचानक दबाव डाल सकती है। यही वजह है कि कई बार खराब हवा के दिनों में हार्ट अटैक और सांस की गंभीर समस्याओं के केस तेजी से बढ़ जाते हैं।
पर्यावरण संगठनों ने भी इस फैसले को बेहद खतरनाक बताया है। Earth Island Institute जैसी संस्थाओं ने इसे हाल के वर्षों के सबसे चिंताजनक पर्यावरणीय रोलबैक में शामिल किया है। उनका कहना है कि जब पूरी दुनिया कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, तब अमेरिका जैसे देश का पीछे हटना वैश्विक क्लाइमेट एक्शन को कमजोर कर सकता है।
इस फैसले का राजनीतिक असर भी कम नहीं माना जा रहा। एंडेंजरमेंट फाइंडिंग अब तक अमेरिकी जलवायु नीति की कानूनी रीढ़ मानी जाती थी। अगर इसे कमजोर किया जाता है, तो भविष्य में कोर्ट में क्लाइमेट रेगुलेशंस को चुनौती देना आसान हो सकता है। यानी उद्योगों पर लगाए गए कई पर्यावरणीय प्रतिबंध कानूनी विवादों में फंस सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया के कई देश अमेरिकी नीतियों को संकेत की तरह देखते हैं। अगर अमेरिका अपने पर्यावरणीय स्टैंड को नरम करता है, तो दूसरे देशों में भी उद्योगों पर दबाव कम करने की मांग तेज हो सकती है। इससे वैश्विक स्तर पर कार्बन कटौती की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
आम लोगों के लिए इसका मतलब समझना भी जरूरी है। मान लीजिए किसी औद्योगिक इलाके के पास रहने वाला परिवार रोज उस हवा में सांस ले रहा है जिसमें पावर प्लांट्स और वाहनों का धुआं मिला हुआ है। अगर नियम कमजोर होते हैं, तो वही हवा और ज्यादा जहरीली हो सकती है। छोटे बच्चों के फेफड़े कमजोर पड़ सकते हैं, बुजुर्गों को सांस लेने में दिक्कत बढ़ सकती है और गर्भवती महिलाओं के लिए स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं।
विशेषज्ञ बार-बार यह भी कह रहे हैं कि क्लाइमेट चेंज और एयर पॉल्यूशन अब अलग-अलग समस्याएं नहीं रह गई हैं। बढ़ता तापमान, जंगलों में आग, हीटवेव और जहरीली हवा मिलकर स्वास्थ्य संकट को और गंभीर बना रहे हैं। ऐसे समय में सुरक्षा नियमों को कमजोर करना आने वाले वर्षों में भारी सामाजिक और आर्थिक कीमत पैदा कर सकता है।
भारत जैसे विकासशील देशों के लिए भी यह एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। अगर बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपने पर्यावरणीय वादों से पीछे हटती हैं, तो विकासशील देशों पर दोहरी जिम्मेदारी आ सकती है। एक तरफ उन्हें आर्थिक विकास की जरूरत है, दूसरी तरफ उन्हें अपनी आबादी को साफ हवा और सुरक्षित पर्यावरण भी देना है।
यही वजह है कि EPA का यह फैसला अब सिर्फ अमेरिकी नीति बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे वैश्विक क्लाइमेट राजनीति के एक नए मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह तय करेगा कि दुनिया पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन कैसे बनाती है—और क्या सार्वजनिक स्वास्थ्य को आर्थिक राहत से ऊपर प्राथमिकता दी जाएगी या नहीं।
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