WHO ने साफ कहा है कि क्लाइमेट चेंज अब सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि सीधा हेल्थ इमरजेंसी बन चुका है। सबसे ज्यादा असर बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और उसके साझेदार संस्थानों ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सीधा “हेल्थ इमरजेंसी” बन चुका है। हालिया विश्लेषण के मुताबिक, 2030 से 2050 के बीच कुपोषण, मलेरिया, डायरिया और हीट स्ट्रेस जैसी समस्याओं के कारण हर साल करीब 2.5 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।
नई रिसर्च में साफ बताया गया है कि गर्भवती महिलाएं, नवजात, छोटे बच्चे और बुज़ुर्ग सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। बढ़ता तापमान, बाढ़, सूखा और वायु प्रदूषण अब सीधे लोगों की रोज़मर्रा की सेहत को प्रभावित कर रहे हैं।
WHO की क्लाइमेट–हेल्थ फैक्टशीट पहले भी दिखा चुकी है कि जलवायु परिवर्तन साफ हवा, सुरक्षित पीने का पानी, पर्याप्त भोजन और सुरक्षित घर जैसी बुनियादी जरूरतों को कमजोर कर रहा है। पिछले कुछ सालों में हीटवेव, जंगलों में आग, बाढ़ और तूफानों की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं, जिसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई दे रहा है। चिंता, तनाव और ट्रॉमा जैसे मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
नई रिसर्च यह भी बताती है कि हर उम्र के लोग अलग-अलग तरह के क्लाइमेट रिस्क झेल रहे हैं। गर्भ में पल रहे बच्चों पर गर्मी और प्रदूषण का असर उनके विकास को प्रभावित कर सकता है, जबकि बुज़ुर्गों में हीटवेव के दौरान मौत का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
एक डॉक्यूमेंट्री स्टाइल रिपोर्ट में यह सामने आया है कि बढ़ता तापमान, सूखा और प्रदूषण दुनिया भर में अस्थमा, दिल की बीमारियां, किडनी फेलियर और प्री-टर्म बर्थ जैसे मामलों को बढ़ा रहे हैं। यानी क्लाइमेट क्राइसिस अब भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि आज अस्पतालों की OPD और ICU में दिखने वाली सच्चाई बन चुका है।
WHO के अनुसार, दुनिया के करीब 3.6 अरब लोग ऐसे इलाकों में रह रहे हैं जो क्लाइमेट चेंज के लिए बेहद संवेदनशील हैं। अनुमान है कि 2030 से 2050 के बीच हर साल करीब 2.5 लाख अतिरिक्त मौतें क्लाइमेट से जुड़ी बीमारियों के कारण होंगी। साथ ही, 2030 तक हेल्थ सिस्टम पर हर साल 2 से 4 अरब डॉलर का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है।
यह स्थिति खासकर उन देशों के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, जहां हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से ही कमजोर है। कम संसाधनों वाले इलाकों में गर्मी, बाढ़ या सूखे जैसी आपदाओं से निपटना और भी मुश्किल हो जाता है, जिससे बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब सिर्फ पर्यावरण की सुरक्षा ही काफी नहीं है, बल्कि हेल्थ सिस्टम को भी क्लाइमेट चेंज के हिसाब से तैयार करना होगा। इसमें मजबूत अस्पताल, बेहतर आपदा प्रबंधन, साफ पानी और पोषण की उपलब्धता, और लोगों में जागरूकता बढ़ाना शामिल है।
कुल मिलाकर, जलवायु परिवर्तन अब एक बहुआयामी संकट बन चुका है, जो पर्यावरण के साथ-साथ सीधे इंसानी सेहत और जीवन पर असर डाल रहा है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में इसका प्रभाव और भी गंभीर हो सकता है।
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