80 वर्षीय हिरोशिमा सर्वाइवर जीरो होमासुमी ने संयुक्त राष्ट्र में भावुक भाषण देकर दुनिया से परमाणु हथियार खत्म करने की अपील की। उन्होंने इन्हें “शैतान के हथियार” बताते हुए कहा कि ये मानवता के साथ नहीं रह सकते। उन्होंने युवाओं से शांति और निरस्त्रीकरण को मजबूत करने की भी अपील की और बढ़ते वैश्विक तनाव को परमाणु खतरे के लिए चेतावनी बताया।
हिरोशिमा पर परमाणु बमबारी से बचे 80 वर्षीय जीरो होमासुमी ने संयुक्त राष्ट्र (UN) में एक भावुक भाषण देते हुए पूरी दुनिया से परमाणु हथियारों को खत्म करने की जोरदार अपील की। वे जापान के प्रमुख सर्वाइवर संगठन “निहोन हिडनक्यो” के सेक्रेटरी जनरल हैं और न्यूयॉर्क में आयोजित परमाणु अप्रसार संधि (NPT) समीक्षा सम्मेलन में उन्होंने अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा किया। “परमाणु हथियार शैतान के हथियार हैं” अपने संबोधन में होमासुमी ने परमाणु हथियारों को “शैतान के हथियार” बताया और कहा कि ये मानवता के साथ सह-अस्तित्व में नहीं रह सकते। उन्होंने जोर देकर कहा कि दुनिया को अब तुरंत इन हथियारों को खत्म करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए। दर्दनाक बचपन की यादें उन्होंने अपने बचपन की भयावह घटनाओं और बमबारी के बाद के मंजर का जिक्र करते हुए कहा कि हिरोशिमा का विनाश आज भी उनकी यादों में ताजा है। उन्होंने बताया कि उस तबाही ने न केवल शहर को खत्म किया बल्कि लाखों जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। आज की दुनिया में बढ़ता खतरा होमासुमी ने कहा कि आज जब दुनिया कई युद्धों और टकरावों से गुजर रही है, तब परमाणु हथियारों की होड़ और भी खतरनाक हो गई है। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं से अपील की कि वे शांति और निरस्त्रीकरण (disarmament) की आवाज को मजबूत करें। वैश्विक सुरक्षा पर चेतावनी उनके अनुसार, परमाणु शक्ति रखने वाले देशों की जिम्मेदारी केवल अपनी सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी मानव सभ्यता को बचाने की भी है। उन्होंने चेतावनी दी कि वर्तमान वैश्विक तनाव—जैसे यूक्रेन युद्ध, ईरान से जुड़ा टकराव और एशिया में बढ़ता तनाव—इस खतरे को और गंभीर बना रहे हैं। आम लोगों के लिए संदेश हालांकि परमाणु हथियारों की बहस आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से दूर लगती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अस्थिरता किसी भी समय बड़े संकट को जन्म दे सकती है। दुर्घटना, गलत निर्णय या साइबर हमलों के जरिए भी बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। होमासुमी का संदेश साफ था—सुरक्षा सिर्फ सैन्य ताकत से नहीं आती, बल्कि समझदारी, संयम और शांति की सोच से ही संभव है।
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