एक पूर्व गूगल लीडर के अनुसार एजेंटिक AI भविष्य में प्रोडक्टिविटी को करीब 30% तक बढ़ा सकता है। हालांकि, इस दावे के साथ जॉब्स और रेगुलेशन को लेकर चिंता भी सामने आ रही है।
हाल के समय में ‘एजेंटिक AI’ तेजी से चर्चा में आया है। इसका मतलब ऐसे AI सिस्टम से है जो सिर्फ सवालों के जवाब देने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि खुद से टास्क प्लान करते हैं, स्टेप-बाय-स्टेप काम पूरा करते हैं और यूज़र की तरफ से कई डिजिटल काम ऑटोमेट कर सकते हैं। एक पूर्व गूगल लीडर और AI उद्यमी ने हाल ही में अनुमान लगाया कि ऐसे सिस्टम भविष्य में मानव प्रोडक्टिविटी को सालाना करीब 30% तक बढ़ा सकते हैं।
इस दावे का सीधा मतलब है कि AI अब केवल एक ‘स्मार्ट टूल’ नहीं रहेगा, बल्कि ‘डिजिटल एजेंट’ की तरह काम करेगा। यानी ऐसा सिस्टम जो आपके ईमेल पढ़े, मीटिंग शेड्यूल करे, रिपोर्ट तैयार करे, कोड लिखे और वेब रिसर्च भी खुद कर ले। अगर ऐसा होता है, तो कंपनियों के काम करने के तरीके, समय और लागत—तीनों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
हालांकि, यह अनुमान अभी किसी बड़े अकादमिक या पियर-रिव्यूड रिसर्च पर आधारित नहीं है। यह एक व्यक्तिगत विश्लेषण और सार्वजनिक बयान है, इसलिए इसे पूरी तरह पक्का मानने से पहले और verification की जरूरत है। फिर भी, बड़े टेक कंपनियों के हालिया निवेश और AI टूल्स के लॉन्च को देखें, तो साफ दिखता है कि इंडस्ट्री इसी दिशा में आगे बढ़ रही है—जैसे ऑटोमेशन-फर्स्ट वर्कफ़्लो, AI-असिस्टेड कोडिंग, CRM सिस्टम और कस्टमर सपोर्ट टूल्स।
आम लोगों के लिए इसका असर सबसे पहले नॉलेज वर्क और डिजिटल सर्विसेस में दिखाई देगा। उदाहरण के तौर पर, एक छोटा बिज़नेस मालिक इनवॉयस भेजने, फॉलो-अप ईमेल करने, इन्वेंट्री अपडेट करने और सोशल मीडिया पोस्टिंग जैसे काम AI एजेंट को सौंप सकता है। इससे वह खुद स्ट्रैटेजी और बड़े फैसलों पर ध्यान दे पाएगा। इससे छोटे बिज़नेस और सोलो उद्यमियों की क्षमता काफी बढ़ सकती है।
लेकिन इसके साथ चिंता भी बढ़ रही है। सवाल यह है कि इतने बड़े स्तर पर ऑटोमेशन से कौन-कौन सी नौकरियां प्रभावित होंगी। कस्टमर सपोर्ट, बेसिक डेटा एंट्री, शुरुआती लीगल ड्राफ्टिंग और रूटीन रिपोर्टिंग जैसे काम पहले ही AI से प्रभावित हो रहे हैं। आने वाले समय में मिड-स्किल ऑफिस जॉब्स पर और ज्यादा दबाव आ सकता है, खासकर अगर समय रहते री-स्किलिंग नहीं की गई।
रेगुलेशन के मामले में भी एजेंटिक AI नई चुनौतियां लाता है। अगर कोई AI एजेंट बिना इंसानी निगरानी के फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन, लीगल बातचीत या हेल्थ सलाह देने लगे, तो जिम्मेदारी किसकी होगी—यूज़र, डेवलपर या प्लेटफॉर्म? अभी इस सवाल का स्पष्ट जवाब दुनिया के ज्यादातर कानूनों में मौजूद नहीं है।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका समाधान ‘ह्यूमन-इन-द-लूप’ मॉडल में है। यानी अंतिम फैसला और जिम्मेदारी इंसान के पास ही रहे, जबकि AI एजेंट केवल रिसर्च, ड्राफ्टिंग और तैयारी का काम करे। इसके साथ ही ट्रांसपेरेंसी और लॉगिंग सिस्टम भी जरूरी होंगे, ताकि यह साफ रहे कि AI ने क्या किया और किस आधार पर किया।
फिलहाल, आम यूज़र्स के लिए यह समय सीखने और प्रयोग करने का है। अलग-अलग AI टूल्स और ऑटोमेशन फीचर्स को समझकर यह तय करना जरूरी है कि कौन सा काम AI को सौंपना सुरक्षित है और कहाँ इंसानी दखल जरूरी है।
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