Dr. Sanjay Reddy के अनुसार भारत में डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है और लाखों लोग बिना जांच के इससे अनजान हैं। खराब लाइफस्टाइल, मोटापा और कम फिजिकल एक्टिविटी इसके मुख्य कारण हैं, और अब यह युवाओं में भी तेजी से फैल रही है। बचाव के लिए सही खान-पान, नियमित व्यायाम, वजन कंट्रोल और समय-समय पर जांच जरूरी है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत को इस समस्या से निपटने के लिए एक मजबूत नेशनल प्रिवेंशन प्रोग्राम की जरूरत है।
भारत समेत पूरी दुनिया में डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है और यह अब एक बड़ा पब्लिक हेल्थ चैलेंज बन चुका है। एक इंटरव्यू में Dr. Sanjay Reddy ने बताया कि इस समस्या से निपटने के लिए भारत को तुरंत एक मजबूत नेशनल डायबिटीज प्रिवेंशन प्रोग्राम की जरूरत है।
इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के अनुसार, 2025 तक दुनिया में लगभग 583 मिलियन लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं। भारत में यह संख्या 101 मिलियन से ज्यादा है और करीब 11.7% आबादी इससे प्रभावित है। चिंता की बात यह है कि जितने लोग डायबिटीज से ग्रस्त हैं, उतने ही लोग बिना जांच के अनजान रहते हैं।
भारत में करीब 120 मिलियन लोग प्रीडायबिटिक हैं, यानी उन्हें भविष्य में डायबिटीज होने का खतरा ज्यादा है। आजकल बच्चे भी कम खेलते हैं और ज्यादा स्क्रीन टाइम बिताते हैं, जिससे भविष्य में जोखिम और बढ़ रहा है। पहले टाइप-2 डायबिटीज 40 साल के बाद ज्यादा दिखती थी, लेकिन अब 20–40 उम्र के लोगों में भी तेजी से बढ़ रही है।
कम उम्र में डायबिटीज होने का मतलब है कि व्यक्ति को लंबे समय तक बीमारी झेलनी पड़ती है और जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। डायबिटीज अक्सर बिना लक्षण के होती है। कुछ मामलों में प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, वजन घटना, थकान या धुंधला दिखना जैसे लक्षण दिखते हैं, लेकिन ये बहुत कम लोगों में होते हैं।
इसलिए 30 साल के बाद या जिन लोगों को जोखिम है, उन्हें नियमित जांच करानी चाहिए। लो ब्लड शुगर (हाइपोग्लाइसीमिया) से पसीना, चक्कर, कन्फ्यूजन और अजीब व्यवहार हो सकता है। वहीं लंबे समय तक हाई शुगर दिमाग पर असर डाल सकती है और डिमेंशिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकती है।
क्या डायबिटीज ठीक हो सकती है? विशेषज्ञों के अनुसार “रिवर्सल” शब्द सही नहीं है, लेकिन “रिमिशन” संभव है। अगर व्यक्ति वजन कम करे (लगभग 15%) और सही डाइट व दवाइयां ले, तो कुछ समय के लिए डायबिटीज कंट्रोल में आ सकती है और दवा बंद भी हो सकती है।
टाइप-1 डायबिटीज बच्चों में ज्यादा होती है और इसमें शरीर इंसुलिन बनाना बंद कर देता है। इसके लिए जीवनभर इंसुलिन लेना जरूरी होता है और इसका मैनेजमेंट शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है। अगर माता-पिता दोनों को डायबिटीज है, तो बच्चों में इसका खतरा 80–90% तक हो सकता है।
आजकल CGM (Continuous Glucose Monitoring), इंसुलिन पंप और नई दवाएं जैसे GLP-1 और SGLT2 inhibitors इलाज को बेहतर बना रही हैं। स्टेम सेल थेरेपी पर भी रिसर्च चल रही है, लेकिन यह अभी शुरुआती स्तर पर है। डायबिटीज अब सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं रही, यह हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर रही है।
अगर समय रहते जागरूकता, जांच और लाइफस्टाइल में सुधार किया जाए, तो इस बढ़ती समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है।
Disclaimer
Disclaimer:
Images are for illustrative purposes only and some editing of images done by using AI.
Published by: Netgram Team. For newsroom standards, byline transparency, and correction requests, review our editorial standards and corrections policy.
Need to contact the newsroom directly? Email netgramnews@gmail.com or visit the team page.