दुनिया में प्रति छात्र शिक्षा पर खर्च देशों के बीच काफी अलग है—जहां लक्ज़मबर्ग जैसे देश बहुत ज्यादा खर्च करते हैं, वहीं कई देशों में यह काफी कम है। OECD औसत करीब $15,000 है, लेकिन चीन, मैक्सिको जैसे देशों में खर्च इससे काफी नीचे है। इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता, टीचर्स की सैलरी और उच्च शिक्षा के अवसरों पर पड़ता है।
हालिया रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में प्रति छात्र शिक्षा पर होने वाला खर्च देशों के बीच काफी अलग-अलग है। यह फर्क इस बात पर निर्भर करता है कि किसी देश की प्राथमिकताएं, संसाधन और आर्थिक स्थिति कैसी है। रिपोर्ट के मुताबिक, लक्ज़मबर्ग इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां हर छात्र पर सालाना 31,000 डॉलर से ज्यादा खर्च किया जाता है। यह दूसरे नंबर पर मौजूद नॉर्वे से भी करीब 9,000 डॉलर ज्यादा है। इसके बाद ऑस्ट्रिया, अमेरिका, साउथ कोरिया, डेनमार्क, नीदरलैंड, यूके और बेल्जियम जैसे देश आते हैं, जहां प्रति छात्र खर्च आमतौर पर 18,000 से 21,000 डॉलर के बीच रहता है। OECD देशों का औसत खर्च करीब 15,000 डॉलर है, लेकिन यह औसत असल तस्वीर को पूरी तरह नहीं दिखाता, क्योंकि कई देश इससे काफी ऊपर या नीचे हैं। जैसे जापान, इटली और स्पेन जैसे विकसित देश भी इस औसत से नीचे खर्च करते हैं, जबकि पोलैंड और हंगरी जैसे देश करीब 10,000–11,000 डॉलर के आसपास खर्च करते हैं। वहीं उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शिक्षा पर खर्च काफी कम है। चीन और तुर्किये जैसे देश प्रति छात्र करीब 5,000 डॉलर खर्च करते हैं, जबकि मैक्सिको और साउथ अफ्रीका में यह आंकड़ा करीब 4,000 डॉलर तक है। सबसे नीचे पेरू है, जहां यह खर्च लगभग 2,600 डॉलर है। इस खर्च का सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है—जैसे क्लास का आकार, टीचर्स की सैलरी, टेक्नोलॉजी की उपलब्धता और उच्च शिक्षा के मौके। रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि सिर्फ खर्च ही नहीं, बल्कि टीचर्स की सैलरी में भी बड़ा अंतर है। कुछ देशों में टीचर्स की सैलरी 1.7 लाख डॉलर तक पहुंचती है, जबकि कई देशों में यह 30,000 डॉलर से भी कम रहती है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता और टीचर्स की उपलब्धता पर असर पड़ता है। इसके अलावा, दुनिया में उच्च शिक्षा पाने वाले लोगों की संख्या भी काफी अलग-अलग है। कनाडा में 63% लोग कॉलेज-एजुकेटेड हैं, जबकि भारत, चीन और इंडोनेशिया जैसे देशों में यह आंकड़ा अभी 20% से भी कम है। कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट दिखाती है कि शिक्षा में निवेश का स्तर देशों के भविष्य, रोजगार और आर्थिक विकास पर बड़ा असर डालता है।
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