सरकार ने लोकसभा सीटें 850 करने और 33% महिला आरक्षण लागू करने के लिए नए विधेयक पेश किए हैं, जो 2029 चुनाव से लागू हो सकते हैं। दक्षिणी राज्यों को डर है कि इससे उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा, इसलिए विरोध हो रहा है। विपक्ष ने इसे चुनाव से पहले राजनीतिक कदम बताया, जबकि सरकार इसे बड़ा सुधार बता रही है।
केंद्र सरकार ने 15 अप्रैल 2026 को तीन अहम ड्राफ्ट विधेयक पेश किए, जिनमें दो बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं—लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करना और लोकसभा व राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना। इन विधेयकों को 16 से 18 अप्रैल के बीच होने वाले संसद के विशेष सत्र में पेश किया जाएगा। ये तीन विधेयक हैं: केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 परिसीमन विधेयक 2026 ये प्रस्ताव 2023 के नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर आधारित हैं, जिसमें महिला आरक्षण का प्रावधान था, लेकिन इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया था। अगर नए विधेयक पास हो जाते हैं, तो 2029 के आम चुनाव में महिला आरक्षण लागू हो सकता है।
लोकसभा सीटें 850 करने का प्रस्ताव नए संविधान संशोधन के तहत लोकसभा में अधिकतम 850 सीटों का प्रस्ताव है—815 राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से। अभी लोकसभा में 543 सीटें हैं और अधिकतम सीमा 550 तय है। इस बदलाव के लिए संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का प्रस्ताव है, ताकि 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों पर लगी रोक हटाई जा सके। 1976 के बाद से सीटों की संख्या नहीं बढ़ी है। परिसीमन विधेयक के अनुसार, सीटों का पुनर्निर्धारण “ताजा प्रकाशित जनगणना” के आधार पर होगा, यानी 2011 की जनगणना। यही मुद्दा विवाद का मुख्य कारण बना हुआ है।
दक्षिणी राज्यों की चिंता दक्षिण भारत के राज्यों ने इस प्रस्ताव पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जनसंख्या के आधार पर सीटें तय होने से उनकी प्रतिनिधित्व क्षमता कम हो सकती है। इन राज्यों का तर्क है कि उन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है, लेकिन अब उसी के कारण उन्हें नुकसान झेलना पड़ सकता है। वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में सीटें ज्यादा बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इसे “लोकतंत्र पर हमला” बताया और कहा कि बिना राज्यों से सलाह लिए यह फैसला नहीं होना चाहिए। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी अन्य दक्षिणी राज्यों से मिलकर इसका विरोध करने की अपील की है। सरकार का कहना है कि राज्यों की हिस्सेदारी से छेड़छाड़ नहीं होगी, लेकिन आलोचकों का मानना है कि विधेयकों में इसकी स्पष्ट गारंटी नहीं है।
परिसीमन प्रक्रिया और बदलाव विधेयक के अनुसार, परिसीमन आयोग—जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जज करेंगे—सीटों का अंतिम निर्धारण करेगा। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त सदस्य होंगे। एक और बड़ा बदलाव यह है कि भविष्य में किस जनगणना को आधार बनाया जाएगा, यह संसद साधारण बहुमत से तय कर सकेगी, जबकि अभी इसके लिए संविधान संशोधन जरूरी होता है।
33% महिला आरक्षण भारत में अभी लोकसभा में सिर्फ 14% और राज्यसभा में करीब 18% महिला सांसद हैं, जो वैश्विक औसत (27.2%) से कम है। नए प्रस्ताव के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यह आरक्षण 15 साल तक लागू रहेगा और हर परिसीमन के बाद सीटों का रोटेशन होगा। हालांकि अधिकांश राजनीतिक दल इस आरक्षण के समर्थन में हैं, लेकिन इसके लागू करने के समय और प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
विपक्ष की आलोचना विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार इन विधेयकों को पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनावों से पहले लाकर महिला वोटर्स को प्रभावित करना चाहती है। कुछ नेताओं का कहना है कि महिला आरक्षण को बहाना बनाकर परिसीमन का असली एजेंडा आगे बढ़ाया जा रहा है। साथ ही यह भी सवाल उठाया गया कि 2023 में इसे तुरंत लागू क्यों नहीं किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे चुनावों में कुछ प्रतिशत महिला वोट का झुकाव बदल सकता है, जो नतीजों पर बड़ा असर डाल सकता है।
निष्कर्ष लोकसभा सीटों को 850 तक बढ़ाने और 33% महिला आरक्षण जैसे बड़े प्रस्ताव भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। लेकिन इनसे जुड़े विवाद—खासकर दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व और चुनावी टाइमिंग—ने इसे एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। अब सबकी नजर संसद के विशेष सत्र और इन विधेयकों के भविष्य पर टिकी है।
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