अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने FY27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ 6.5% और FY25 के लिए 7.6% रहने का अनुमान दिया है, जो मजबूत आर्थिक संकेत है। लेकिन मध्य-पूर्व तनाव और ऊर्जा कीमतों के कारण रुपया 93.39 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया और बाजार में गिरावट देखी गई। Nomura के मुताबिक FY27 में महंगाई करीब 5% तक जा सकती है। ऐसे में ग्रोथ के साथ महंगाई और वैश्विक जोखिम बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। अपनी ताजा रिपोर्ट में IMF ने वित्त वर्ष 2026–27 (FY27) के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान 6.4% से बढ़ाकर 6.5% कर दिया है।
वहीं FY25 के लिए यह अनुमान बढ़ाकर 7.6% कर दिया गया है, जिसका कारण चौथी तिमाही और साल के मध्य में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन रहा। हालांकि, वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बनी हुई है।
मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष और ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव के बावजूद IMF का मानना है कि भारत की ग्रोथ “अनिश्चित लेकिन सकारात्मक” दिशा में आगे बढ़ रही है। अगर वैश्विक हालात ज्यादा नहीं बिगड़ते, तो 2026 और 2027 में वैश्विक ग्रोथ क्रमशः 3.1% और 3.2% रह सकती है, जो महामारी-पूर्व औसत से कम है।
ऐसे माहौल में भारत की 6.5% वृद्धि दर मजबूत मानी जा रही है। आम लोगों के लिए इसका मतलब है कि अगर घरेलू नीतियां स्थिर रहती हैं और महंगाई नियंत्रण में रहती है, तो आने वाले वर्षों में नौकरियां, आय और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के अवसर बढ़ सकते हैं।
लेकिन यह भी साफ है कि सिर्फ तेज ग्रोथ ही पर्याप्त नहीं है—समावेशी विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, स्किल डेवलपमेंट और ग्रामीण-शहरी संतुलन पर भी ध्यान देना जरूरी होगा।
दूसरी ओर, वैश्विक तनाव का असर भारतीय बाजारों पर भी दिखने लगा है। खासकर मध्य-पूर्व में तनाव और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के कारण ऊर्जा कीमतों और सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा है। इसी के चलते भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 93.39 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया, जहां यह 56 पैसे गिरकर बंद हुआ।
इसका सीधा असर शेयर बाजार पर भी पड़ा—निफ्टी 50 और सेंसेक्स दोनों में करीब 1% की गिरावट दर्ज की गई। विदेशी निवेशकों की बिकवाली और बढ़ती ऊर्जा कीमतों की आशंका से बैंकिंग और ऑटो सेक्टर पर ज्यादा दबाव देखने को मिला।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, Nomura ने अनुमान लगाया है कि ऊर्जा झटकों के कारण FY27 में भारत की औसत मुद्रास्फीति करीब 5% तक पहुंच सकती है। मार्च 2026 में CPI महंगाई 3.2% से बढ़कर 3.4% हुई, जो अभी RBI के 4% लक्ष्य से नीचे है, लेकिन आगे इसमें बढ़ोतरी की संभावना है।
खाद्य महंगाई Q4 तक लगभग 6% तक पहुंच सकती है, जबकि कोर CPI भी धीरे-धीरे ऊपर जा सकता है।
आने वाले समय में ईंधन, ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ने का दबाव बना रह सकता है। रुपये की कमजोरी के कारण आयातित सामान—जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन और कच्चा तेल—महंगे हो सकते हैं, जिसका असर सीधे आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
हालांकि, इसका एक सकारात्मक पहलू भी है। IT सेवाएं और निर्यात करने वाली कंपनियों को कमजोर रुपये से फायदा मिल सकता है। लेकिन कुल मिलाकर, बढ़ती और अस्थिर महंगाई अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बनी रहती है।
विश्लेषकों का मानना है कि अगर वैश्विक तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में कटौती की योजना पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है और वह 2026 के अंत तक “होल्ड” मोड में रह सकता है।
इसके साथ ही सरकार को भी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोत बढ़ाने, स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व मजबूत करने और लक्षित सब्सिडी जैसे कदम उठाने होंगे, ताकि महंगाई का बोझ खासकर कमजोर वर्गों पर कम किया जा सके।
कुल मिलाकर, भारत की अर्थव्यवस्था एक संतुलन के दौर से गुजर रही है—एक तरफ मजबूत ग्रोथ की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ महंगाई और वैश्विक जोखिम बड़ी चुनौती बने हुए हैं। आने वाले समय में सही नीतिगत फैसले ही तय करेंगे कि यह ग्रोथ कितनी स्थिर और समावेशी बन पाती है।
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