अमेरिका-ईरान वार्ता बिना समझौते खत्म हुई, मुख्य विवाद परमाणु मुद्दा और भरोसे की कमी रहा। फिर भी बातचीत पूरी तरह बंद नहीं हुई है और आगे नई वार्ता की उम्मीद है। हालात अभी भी तनावपूर्ण हैं, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को लेकर।
ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता बिना किसी अंतिम समझौते के खत्म हो गई, लेकिन बातचीत से यह उम्मीद जरूर बनी हुई है कि संवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यह 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच सबसे उच्च स्तर की बैठक थी, जो रात भर चली।
इस बातचीत की खास बात यह रही कि पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। पाकिस्तान के दोनों देशों से अच्छे संबंध हैं और वह इस युद्ध में शामिल भी नहीं था, इसलिए वह दोनों को एक टेबल पर लाने में सफल रहा।
अमेरिका ने ईरान के सामने बड़ा प्रस्ताव रखा था—अगर ईरान मान जाए तो उस पर लगे प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं, उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पूरी तरह शामिल किया जा सकता है और साझेदारी भी संभव है। लेकिन ईरान इस प्रस्ताव को “समर्पण” की तरह देख रहा था और वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
ईरान को लगता है कि युद्ध के दौरान उसने भी कुछ रणनीतिक बढ़त हासिल की है, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पकड़, जिससे उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव मिलता है। इस वार्ता के फेल होने की सबसे बड़ी वजह न्यूक्लियर मुद्दा रहा।
अमेरिका चाहता था कि ईरान पूरी तरह यूरेनियम संवर्धन बंद करे, अपने परमाणु ठिकाने खत्म करे और जमा यूरेनियम देश से बाहर करे। लेकिन ईरान इन शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं था। दूसरी तरफ, ईरान की सबसे बड़ी चिंता भरोसे की थी।
पिछले एक साल में बातचीत के दौरान ही उस पर दो बार हमले हुए, इसलिए वह इस बार पक्का भरोसा चाहता था कि समझौते के बाद फिर हमला नहीं होगा। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका ने “अंतिम और सबसे अच्छा प्रस्ताव” दिया था, लेकिन ईरान ने उसे स्वीकार नहीं किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की शर्तें इतनी सख्त थीं कि ईरान के पास अपनी इज्जत बचाने का कोई रास्ता नहीं था। बातचीत में अन्य मुद्दे भी अटके रहे—जैसे ईरान का क्षेत्रीय समूहों को समर्थन बंद करना और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बिना किसी शुल्क के पूरी तरह खोलना।
ईरान ने इन मांगों को भी खारिज कर दिया। फिर भी, दोनों पक्षों ने बातचीत पूरी तरह खत्म नहीं की है। पाकिस्तान आगे भी दोनों देशों के बीच संदेश पहुंचाने का काम करेगा और उम्मीद है कि ईरान नई शर्तों के साथ वापस आ सकता है।
फिलहाल सीजफायर लागू है, लेकिन अमेरिका द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नौसैनिक नाकाबंदी की घोषणा से तनाव फिर बढ़ सकता है। इस पूरी प्रक्रिया की एक अहम बात यह रही कि दोनों देश आमने-सामने बैठकर बात कर रहे थे, जो पहले नहीं हुआ था।
कई मुद्दों पर सहमति भी बनी, लेकिन कुछ बड़े मुद्दे अभी भी बाकी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों के लिए युद्ध की कीमत बहुत ज्यादा है, इसलिए बातचीत जारी रहने की संभावना है। हालांकि, राजनीतिक दबाव और सख्त रुख इस प्रक्रिया को फिर टकराव की ओर भी ले जा सकते हैं।
कुल मिलाकर, यह वार्ता भले ही सफल नहीं रही, लेकिन इसने भविष्य के समझौते के लिए एक आधार जरूर तैयार कर दिया है—अगर भरोसा और समझदारी दोनों तरफ से बढ़ती है।
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