बाल रोग विशेषज्ञों और हालिया अध्ययनों के अनुसार, बच्चों में माइग्रेन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसमें परिवार और बच्चे की अस्त-व्यस्त दिनचर्या तथा नींद की कमी मुख्य वजह बन रही है। प्रसिद्ध 'CHAMP' ट्रायल और मिलान के नए अध्ययनों से सामने आया है कि माइग्रेन की रोकथाम के लिए दी जाने वाली पारंपरिक दवाएं प्लेसबो जितनी ही असरदार हैं और लगभग 30% मामलों में दुष्प्रभाव (साइड-इफेक्ट्स) पैदा करती हैं। ऐसे में दवाओं के बजाय जीवनशैली में सुधार को ही प्राथमिक समाधान माना जा रहा है।
नई दिल्ली / हेल्थ डेस्क: आधुनिक दौर में बच्चों की बदलती जीवनशैली, अत्यधिक व्यस्तता, देर रात तक जागने की आदत और अधूरी नींद उनके न्यूरोलॉजिकल स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। बच्चों में सिरदर्द और माइग्रेन (Pediatric Migraine) की समस्या तेजी से एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है।
जाने-माने अमेरिकी बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विलियम जी. विल्कोफ के अनुसार, जिस तरह बचपन में मोटापे की समस्या एक अस्वास्थ्यकर जीवनशैली का परिणाम होती है, ठीक उसी प्रकार बच्चों में माइग्रेन का सीधा संबंध उनकी दिनचर्या और नींद से है।
हालांकि, सबसे बड़ी समस्या माता-पिता को यह समझाने में आती है कि उनके बच्चे का सिरदर्द दवाओं की कमी से नहीं, बल्कि दैनिक आदतों में छिपी गड़बड़ी से जुड़ा हुआ है।
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वैश्विक स्तर पर बच्चों में माइग्रेन के मामले पिछले पांच दशकों में काफी तेजी से बढ़े हैं। 'ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज' के 2025 में प्रकाशित विश्लेषण के मुताबिक, वर्ष 1990 में जहां बच्चों में माइग्रेन के मामले 22% दर्ज किए गए थे, वहीं 2021 तक यह आंकड़ा उछलकर 36.8% तक पहुंच गया।
फिनलैंड में 7 वर्ष के बच्चों पर किए गए ऐतिहासिक अध्ययन में भी देखा गया था कि वर्ष 1974 में जहां माइग्रेन की व्यापकता 14.4% थी, वहीं 1992 तक बढ़कर 51.5% हो गई थी।
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जिन बच्चों को साल में केवल कुछ ही बार माइग्रेन का दौरा पड़ता है, उनके ट्रिगर्स को तलाशने के लिए माता-पिता से कई बार बातचीत करनी पड़ती है। कई मामलों में किसी रोमांचक यात्रा (जैसे एम्यूजमेंट पार्क जाने की खुशी) के कारण देर रात तक जागना, बिना आराम के लंबी हवाई या कार यात्रा करना, या किसी बीमारी की शुरुआती स्थिति (प्रोड्रोम) इसके मुख्य कारण बनते हैं।
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वयस्क मरीजों के विपरीत, छोटे बच्चे माइग्रेन के दौरे से पहले दिखने वाले 'ऑरा' (Aura) या प्रारंभिक दृष्टि-दोष के संकेतों को शब्दों में बयां नहीं कर पाते। यहां तक कि सबसे सतर्क माता-पिता भी बच्चे की शुरुआती थकान और बेचैनी के सूक्ष्म संकेतों को पहचान नहीं पाते।
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वहीं, जिन बच्चों को महीने में एक या दो बार या उससे भी अधिक बार माइग्रेन होता है, उनके मामले में असली ट्रिगर की पहचान करना और भी पेचीदा हो जाता है क्योंकि ऐसे बच्चे आमतौर पर क्रोनिक स्लीप डिप्रिवेशन (लगातार नींद की भारी कमी) से जूझ रहे होते हैं। उनकी दिनचर्या इतनी व्यस्त और गतिविधियां इतनी अधिक होती हैं कि असली ट्रिगर उसी शोर में दब जाता है।
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लगातार होने वाले माइग्रेन से परेशान होकर डॉक्टर अक्सर प्रिवेंटिव दवाओं (Prophylactic Medications) का सहारा लेते हैं, लेकिन इन दवाओं का एक स्याह पहलू भी है। मिलान से सामने आए एक हालिया अध्ययन में 40 क्लिनिकल ट्रायल्स और 2,500 से अधिक बाल मरीजों के डेटा की जांच की गई। इसमें पाया गया कि लगभग 30% मरीजों ने कम से कम एक गंभीर प्रतिकूल प्रभाव (Adverse Event) का अनुभव किया।
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इसके अलावा, प्रसिद्ध 'चाइल्डहुड एंड एडोलसेंट माइग्रेन प्रिवेंशन' (CHAMP) ट्रायल (2012 से 2018) के नतीजों ने भी पारंपरिक दवाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस ट्रायल में बच्चों और किशोरों को एमिट्रिप्टिलाइन (Amitriptyline), टोपिरामेट (Topiramate) और प्लेसबो (डमी दवा) दी गई थी।
24 हफ्तों तक चले परीक्षण के अंत में यह बात सामने आई कि माइग्रेन के दिनों को 50% या उससे अधिक कम करने के मामले में इन दवाओं और प्लेसबो के परिणामों में कोई सांख्यिकीय अंतर नहीं था। यानी दवाएं सामान्य प्लेसबो से बेहतर साबित नहीं हुईं।
हाल के वर्षों में माइग्रेन की जैविक प्रक्रियाओं को समझने के लिए वैज्ञानिक 'कैल्सीटोनिन जीन-रिलेटेड पेप्टाइड' (CGRP) पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। CGRP संवेदी तंत्रिका तंत्र में मौजूद एक पेप्टाइड है, जिसे ब्लॉक करके माइग्रेन को रोका जा सकता है।
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जीवों पर किए गए एक अध्ययन में देखा गया कि जब चूहों को नींद से वंचित रखा गया, तो वे CGRP के बेहद कम स्तर के संपर्क में आने पर भी माइग्रेन जैसी प्रतिक्रिया देने लगे, जबकि पूरी नींद लेने वाले चूहों पर इसका कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा।
अमेरिका में पिछले छह वर्षों से वयस्कों के लिए CGRP-रिसेप्टर ब्लॉकर्स ('गैपेंट्स' - Gepants) उपलब्ध हैं, लेकिन अमेरिकी एफडीए (FDA) ने हाल ही में इनके उपयोग से हाई ब्लड प्रेशर होने या मौजूदा बीपी बिगड़ने की चेतावनी जारी की है। अहम बात यह है कि गैपेंट्स को अभी तक बच्चों और किशोरों के लिए नियामक मंजूरी नहीं दी गई है।
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विशेषज्ञों का स्पष्ट निष्कर्ष है कि बच्चों को भारी दवाओं और उनके दुष्प्रभावों से बचाने के लिए सबसे पहला और प्रभावी कदम उनकी जीवनशैली में अनुशासन लाना ही है।
बच्चों के सोने और जागने का समय बिल्कुल तय होना चाहिए, स्क्रीन्स और अत्यधिक तनावपूर्ण गतिविधियों को सीमित करना चाहिए, और दिनभर में आराम के लिए पर्याप्त समय निर्धारित करना चाहिए। दिनचर्या को व्यवस्थित करके बच्चों के माइग्रेन के दौरों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
Q1: बच्चों में माइग्रेन के मुख्य कारण और ट्रिगर्स क्या हैं?
उत्तर: नींद की लगातार कमी, अनियमित और अस्त-व्यस्त दिनचर्या, अत्यधिक थकान, भावनात्मक तनाव, लंबी यात्राएं और डिजिटल स्क्रीन्स का अधिक इस्तेमाल बच्चों में माइग्रेन के प्रमुख ट्रिगर माने जाते हैं।
Q2: क्या बच्चों के माइग्रेन में रोकथाम वाली दवाएं सुरक्षित और असरदार हैं?
उत्तर: अध्ययनों के अनुसार, लगभग 30% बच्चों में इन दवाओं के साइड-इफेक्ट्स देखे गए हैं। साथ ही प्रसिद्ध CHAMP ट्रायल में पाया गया कि ये दवाएं सामान्य प्लेसबो (डमी दवा) की तुलना में सिरदर्द के दिनों को कम करने में कोई खास बेहतर परिणाम नहीं दे सकीं।
Q3: CGRP और नींद की कमी का माइग्रेन से क्या संबंध है?
उत्तर: वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, नींद की कमी से शरीर CGRP पेप्टाइड के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है, जिससे माइग्रेन का दौरा पड़ने का जोखिम बढ़ जाता है।
Q4: क्या गैपेंट्स (Gepants) दवाएं बच्चों के लिए सुरक्षित हैं?
उत्तर: नहीं, गैपेंट्स वर्तमान में बच्चों और किशोरों के लिए स्वीकृत नहीं हैं। इसके अलावा, वयस्कों में भी इससे नए सिरे से या बढ़े हुए हाई ब्लड प्रेशर का खतरा देखा गया है।