ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के नेतृत्व में किए गए एक बड़े वैश्विक अध्ययन में सामने आया है कि दुनिया में लगभग हर व्यक्ति कम से कम तीन गंभीर बीमारियों के उच्च आनुवंशिक जोखिम (High Genetic Risk) के दायरे में आता है। शोधकर्ताओं ने करीब 10 लाख लोगों के जीनोम डेटा का विश्लेषण कर बताया कि डीएनए में जोखिम वाले वैरिएंट्स का होना एक सामान्य बात है, और जरूरी नहीं कि हर जोखिम वाली बीमारी व्यक्ति को वास्तव में हो ही।
लंदन / नई दिल्ली: दुनियाभर के अधिकांश लोग कम से कम तीन आम लेकिन गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के उच्च आनुवंशिक जोखिम (हाई जेनेटिक रिस्क) की श्रेणी में आते हैं। इनमें टाइप-2 डायबिटीज, दिल से जुड़ी बीमारियां (कार्डियोवैस्कुलर डिजीज) और सिजोफ्रेनिया जैसी मानसिक समस्याएं शामिल हैं। प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका जीनोम मेडिसिन (Genome Medicine) में प्रकाशित एक नए शोध में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
ब्रिटेन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर (University of Exeter) के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में 'औसत मानव जीनोम' (Average Human Genome) का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि किसी व्यक्ति की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति चाहे जैसी भी हो, केवल आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) के आधार पर लगभग हर इंसान कई बीमारियों के संभावित जोखिम के दायरे में आता है।
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डीएनए में 50 लाख से अधिक बदलाव मौजूद शोधकर्ताओं की टीम ने ब्रिटेन के 'यूके बायोबैंक' (UK Biobank) और अमेरिका के 'ऑल ऑफ अस' (All of Us) प्रोग्राम से लगभग 10 लाख लोगों के होल जीनोम सीक्वेंसिंग डेटा का गहन अध्ययन किया।
अध्ययन के अनुसार, एक सामान्य इंसान के जीनोम में करीब 50 लाख 'वैरिएंट्स' (DNA के वे स्थान जो एक व्यक्ति को दूसरे से अलग बनाते हैं) पाए जाते हैं। इनमें से लगभग 10,000 वैरिएंट्स ऐसे होते हैं जो जीन के सीक्वेंस को बदल देते हैं। इनका प्रभाव सकारात्मक, नकारात्मक या कई बार निष्प्रभावी (न्यूट्रल) हो सकता है। यह प्रभाव लैक्टोज इनटोलरेंस (दूध न पचना) से लेकर दवाओं के असर तक अलग-अलग रूपों में दिखता है।
इसके अलावा, हर व्यक्ति के डीएनए में 1 से 3 ऐसे दुर्लभ वैरिएंट्स पाए जाते हैं जो गंभीर आनुवंशिक बीमारियों का कारण बन सकते हैं। साथ ही लगभग 50 ऐसे दुर्लभ वैरिएंट्स भी मौजूद होते हैं जिनके चिकित्सीय प्रभाव के बारे में अभी पूरी तरह जानकारी स्पष्ट नहीं है।
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अध्ययनकर्ताओं ने 28 आम बीमारियों के लिए 'पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर' (PGS) का आकलन किया। यह स्कोर किसी व्यक्ति में किसी बीमारी के विकसित होने के आनुवंशिक जोखिम को मापता है। विश्लेषण में सामने आया कि एक औसत व्यक्ति लगभग तीन बीमारियों के मामले में शीर्ष 10 प्रतिशत (Top 10%) सबसे अधिक जोखिम वाले दायरे में आता है।
वहीं, हर पांच में से एक व्यक्ति (लगभग 20%) कम से कम एक बीमारी के मामले में शीर्ष 1 प्रतिशत (Top 1%) अति-उच्च जोखिम श्रेणी में शामिल है।
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जोखिम का मतलब बीमारी नहीं: विशेषज्ञों की राय अध्ययन की वरिष्ठ लेखिका कैरोलिन राइट ने स्पष्ट किया कि डीएनए में आनुवंशिक बदलाव (Genetic Variation) होना एक सामान्य प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि लगभग हर व्यक्ति के शरीर में बीमारियों से जुड़े कुछ जेनेटिक वैरिएंट्स होते हैं, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि वे वैरिएंट्स उस व्यक्ति में बीमारी पैदा ही करेंगे।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जेनेटिक टेस्टिंग के परिणामों को समझते समय केवल डीएनए रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। इसके साथ मरीज के लक्षण, पारिवारिक इतिहास (फैमिली हिस्ट्री), खान-पान, रहन-सहन और पर्यावरणीय कारकों पर भी ध्यान देना बेहद जरूरी है।
शोधकर्ताओं ने यह भी स्वीकार किया कि इस अध्ययन में शामिल अधिकांश डेटा पश्चिमी यूरोपीय मूल के लोगों का था। इसलिए दुनिया भर की विविध आबादियों पर इसके सटीक असर को समझने के लिए और अधिक वैश्विक डेटा की आवश्यकता है।
Q1: इस नए आनुवंशिक अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष क्या है?
अध्ययन के अनुसार, दुनिया का लगभग हर व्यक्ति अपने डीएनए के आधार पर 28 में से कम से कम तीन आम बीमारियों (जैसे डायबिटीज, हृदय रोग, सिजोफ्रेनिया) के उच्च आनुवंशिक जोखिम के दायरे में आता है।
Q2: क्या हाई जेनेटिक रिस्क होने का मतलब है कि बीमारी निश्चित रूप से होगी?
नहीं। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि जेनेटिक वैरिएंट्स होना सामान्य है। जीवनशैली, खान-पान, पर्यावरण और पारिवारिक इतिहास जैसे कारक यह तय करते हैं कि बीमारी वास्तव में विकसित होगी या नहीं।
Q3: एक सामान्य इंसान के डीएनए में कितने बदलाव या वैरिएंट्स होते हैं?
एक औसत मानव जीनोम में लगभग 50 लाख वैरिएंट्स होते हैं, जिनमें से करीब 10,000 वैरिएंट्स जीन के सीक्वेंस में बदलाव लाते हैं।
Q4: यह रिसर्च किस संस्थान द्वारा और कितने लोगों पर की गई?
यह शोध यूके की यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के नेतृत्व में यूके बायोबैंक और अमेरिकी प्रोजेक्ट के करीब 10 लाख लोगों के जीनोम डेटा पर किया गया।
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