राजस्थान के जालोर जिले के आहोर में करीब 250 साल पुरानी ‘भाटा गेर’ परंपरा योद्धा तैयार करने के लिए शुरू की गई थी। होली पर आयोजित इस खेल में प्रतिभागियों को पत्थरों और कांटों की बाड़ पार करनी होती थी, और विजेता को सेना में भर्ती किया जाता था। साल 2003 में एक युवक की गंभीर चोट के बाद मौत हो गई, जिसके बाद जोधपुर हाई कोर्ट ने इस खतरनाक परंपरा पर रोक लगा दी। तब से यह आयोजन बंद है और नई पीढ़ी धीरे-धीरे इसे भूलती जा रही है।
राजस्थान में योद्धा तैयार करने के लिए शुरू की गई एक अनोखी परंपरा अब इतिहास बन चुकी है। करीब 250 साल पुरानी ‘भाटा गेर’ (पत्थर मार गेर) की शुरुआत जालोर के आहोर में उस समय के राजाओं ने की थी। साल 2003 में एक युवक की मौत के बाद कोर्ट के आदेश से इस पर रोक लगा दी गई।
तब से यह परंपरा पूरी तरह बंद है। ग्रामीणों का कहना है कि इस गेर को देखने के लिए सिर्फ जिले से ही नहीं, बल्कि देश और विदेश से भी लोग आते थे। लेकिन अब पहले जैसे हालात नहीं रहे और नई पीढ़ी इस परंपरा को धीरे-धीरे भूलती जा रही है।
गांव के निवासी महिपाल सिंह के अनुसार, करीब ढाई सौ साल पहले उनके पूर्वज ठाकुर अनार सिंह का शासन आहोर में था। उस समय आहोर का रावला जोधपुर के अधीन था। जब भी युद्ध या किसी और जरूरत के कारण सेना जोधपुर चली जाती थी, तब आहोर में डाकुओं का आतंक बढ़ जाता था।
गांव की सुरक्षा और युवाओं में साहस व युद्ध कौशल बढ़ाने के लिए ठाकुर अनार सिंह ने चामुंडा माता के आशीर्वाद से होली के मौके पर ‘भाटा गेर’ की शुरुआत की। यह देखने में एक खेल जैसा आयोजन था, लेकिन इसके पीछे गांव की रक्षा का उद्देश्य जुड़ा था।
होली के दूसरे दिन खेले जाने वाले इस आयोजन के अपने खास नियम थे। मान्यता थी कि आहोर में जन्मा व्यक्ति इस गेर में हिस्सा नहीं ले सकता था। माताजी मंदिर की पोल के बीच कांटों की बाड़ लगाई जाती थी। पोल के अंदर ग्रामीण खड़े रहते और बाहर से प्रतिभागी पत्थरों की बारिश के बीच कांटों की बाड़ पार करने की कोशिश करते थे।
मान्यता के अनुसार, माता के आशीर्वाद के संकेत के रूप में एक चील पोल के अंदर से उड़कर गुजरती थी। उसके बाद ही गेर शुरू होती थी। यह आयोजन कुछ समय तक चलता था और इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे।
जो प्रतिभागी पत्थरों से बचते हुए कांटों की बाड़ पार कर पोल के अंदर पहुंच जाता था, उसे विजेता माना जाता और आहोर की सेना में भर्ती कर लिया जाता था। इस परंपरा से गांव को मजबूत और बहादुर जवान मिलते थे।
लोगों का दावा है कि गेर में भाग लेने वाले को अगर गंभीर चोट भी लग जाए, तो वह सात दिन में ठीक हो जाता था और किसी की जान नहीं जाती थी। ग्रामीण हरिशंकर रावल का कहना है कि आहोर की जागीर वर्ष 1706 में मिली थी। इसके बाद वंशज ठाकुर अनार सिंह ने इस परंपरा की शुरुआत की, जो करीब 250 साल तक चलती रही।
वर्ष 2003 में आहोर गांव के एक युवक ने इस गेर में हिस्सा लिया। कांटों की बाड़ पार करते समय वह बुरी तरह घायल हो गया। उसे इलाज के लिए मथुरादास माथुर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 8 दिन बाद उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद कोर्ट में रिट दायर की गई और जोधपुर हाई कोर्ट ने इस खतरनाक परंपरा पर रोक लगा दी।
तब से ‘पत्थर मार गेर’ का आयोजन नहीं हो रहा है। राजस्थान के एक गांव में होली पर पूरा गांव एक साथ इकट्ठा होता है। बुजुर्गों की अगुवाई में यहीं सामाजिक मुद्दों से जुड़े फैसले लिए जाते हैं। फैसले सिर्फ पंच नहीं, बल्कि पूरा गांव मिलकर करता है।
इस बार गांव पंचायत चुनाव और शराब से जुड़े दो बड़े फैसले लेने की तैयारी में है।
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