'नेचर' जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक के नन्हे कण पानी के संपर्क में आकर रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज (ROS) बनाते हैं, जो कोशिकाओं को सीधे नष्ट करते हैं।शरीर के भीतर निरंतर पैदा होने वाले ये फ्री रेडिकल्स अंदरूनी सूजन का कारण बनते हैं, जिससे हार्ट अटैक, डिमेंशिया और प्रजनन संबंधी विकार पैदा होते हैं।
हमारे चारों तरफ प्लास्टिक का जाल फैल चुका है। जिस पानी को हम पीते हैं, जिस हवा में हम सांस लेते हैं और जिस खाने को हम खाते हैं, उन सबमें प्लास्टिक के बेहद महीन कण यानी माइक्रोप्लास्टिक मौजूद हैं। लंबे समय से वैज्ञानिक यह जानते थे कि प्लास्टिक हमारे शरीर के लिए बुरा है, लेकिन यह शरीर के अंदर जाकर असल में क्या खराबी करता है, इसका पक्का कारण साफ नहीं था।
हाल ही में मशहूर साइंस जर्नल नेचर (Nature) में छपी एक नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने आखिरकार यह पता लगा लिया है कि प्लास्टिक के ये नन्हे कण हमारे अंगों को कैसे बीमार बनाते हैं।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की इस रिसर्च के मुताबिक, असली खतरा तब शुरू होता है जब माइक्रोप्लास्टिक पानी के संपर्क में आता है। जब प्लास्टिक बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटता है, तो उसका सरफेस एरिया (सतह का फैलाव) बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।
रिसर्च में पाया गया कि जब ये नन्हे कण पानी से मिलते हैं, तो ये अपने आसपास के पानी में केमिकल रिएक्शन शुरू कर देते हैं। इससे बेहद खतरनाक और एक्टिव मॉलिक्यूल्स पैदा होते हैं, जिन्हें मेडिकल भाषा में रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज (ROS) या फ्री रेडिकल्स कहा जाता है। ये कण शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगते हैं।
रिसर्च की खास बात: साबुत या बड़ा प्लास्टिक उतना नुकसान नहीं पहुंचाता, जितना उसके टूटने से बने नन्हे कण पहुंचाते हैं। छोटा होने की वजह से इनकी रासायनिक ताकत कई गुना बढ़ जाती है।
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जब ये एक्टिव कण शरीर के अंदर लगातार बनते रहते हैं, तो शरीर के भीतर अंदरूनी सूजन (क्रोनिक इन्फ्लेमेशन) पैदा हो जाती है। यह सूजन धीरे-धीरे कई जानलेवा बीमारियों की जड़ बन जाती है:
दिल की बीमारियां (Cardiovascular Disease): खून की नलियों में सूजन आने से ब्लॉकेज और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है।
दिमाग की कमजोरी और डिमेंशिया (Dementia): यह दिमाग की नसों को कमजोर करता है, जिससे याददाश्त खोने का जोखिम रहता है।
प्रजनन क्षमता पर असर (Fertility Issues): शरीर के हार्मोनल बैलेंस को बिगाड़कर यह बच्चे पैदा करने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है।
वैज्ञानिकों ने अपनी जांच में रोजाना इस्तेमाल होने वाले लगभग सभी आम प्लास्टिक को शामिल किया था:
| प्लास्टिक का नाम | आम इस्तेमाल | नुकसान की वजह |
|---|---|---|
| पॉलीथीन (Polyethylene) | थैलियां और पैकेजिंग | पानी में घुलकर जहरीले कण बनाना |
| पॉलीप्रोपाइलीन (Polypropylene) | डिब्बे, ढक्कन और बोतलें | तेजी से टूटकर नन्हे कणों में बदलना |
| पीवीसी (PVC) | पाइप और खिलौने | केमिकल छोड़ना और सूजन बढ़ाना |
| पीईटी (PET) | पानी और कोल्ड ड्रिंक की बोतलें | लंबे समय तक शरीर में टिके रहना |
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यह समस्या सिर्फ पेट या खून तक सीमित नहीं है। पिछले साल यानी 2025 की एक पुरानी रिसर्च में वैज्ञानिकों ने जब इंसानी दिमाग के नमूनों की जांच की, तो बेहद डराने वाले नतीजे सामने आए।
न्यू मैक्सिको यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स के अनुसार, पुराने सालों के मुकाबले अब इंसानी दिमाग में 50 फीसदी ज्यादा प्लास्टिक मिल रहा है। कुछ नमूनों में तो लगभग एक चम्मच जितना प्लास्टिक पाया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि आज के समय में हमारे दिमाग का करीब 0.5% हिस्सा प्लास्टिक बन चुका है, जो कि बेहद चिंता की बात है।
माइक्रोप्लास्टिक से पूरी तरह बचना आज के समय में मुमकिन नहीं है, लेकिन कुछ आसान आदतें बदलकर इसके खतरे को कम जरूर किया जा सकता है:
प्लास्टिक की बोतलों से बचें: पानी पीने के लिए कांच, तांबे या स्टील की बोतलों का इस्तेमाल करें।
प्लास्टिक के बर्तनों में गर्म खाना न रखें: गर्म खाने या चाय से प्लास्टिक पिघलकर उसमें आसानी से घुल जाता है।
माइक्रोवेव में प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद करें: खाना गर्म करने के लिए हमेशा कांच या सेरेमिक के बर्तनों का ही उपयोग करें।
ताजा खाना खाएं: डिब्बाबंद और बहुत ज्यादा प्लास्टिक पैकिंग वाले खाने से दूरी बनाएं।
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