मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) के खिलाफ विपक्षी गठबंधन की सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर रजिस्ट्री ने 14 तकनीकी खामियां निकाली हैं।रजिस्ट्री ने मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र की धुंधली कॉपी, गायब व अस्पष्ट पन्नों और ₹220 की कम कोर्ट फीस को मुख्य आपत्ति के रूप में रेखांकित किया है।
नई दिल्ली, 13 अक्टूबर 2026। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA ब्लॉक की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में रजिस्ट्री ने 14 तकनीकी खामियाँ पाई हैं। इनमें कुछ आवश्यक दस्तावेजों की कमी, अस्पष्ट प्रतियाँ, वकालतनामों से जुड़ी खामियाँ और ₹220 की कोर्ट फीस कम जमा होना शामिल है।
राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित 11 विपक्षी नेताओं की इस याचिका में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR), मतदाताओं के नाम हटाए जाने और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, रजिस्ट्री की आपत्तियाँ प्रक्रियागत हैं और इन्हें याचिका के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला नहीं माना जा सकता।
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विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जा रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जा रही है, जिससे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। विपक्ष ने आयोग के महत्वपूर्ण निर्णयों में सभी चुनाव आयुक्तों की सामूहिक भागीदारी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई है।
हालांकि, ये विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोप और उठाई गई चिंताएँ हैं। इन आरोपों को अदालत द्वारा प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में किसी याचिका को न्यायिक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने से पहले रजिस्ट्री उसके दस्तावेजों और दाखिल करने की औपचारिकताओं की जाँच करती है। इसी प्रक्रिया के दौरान विपक्ष की याचिका में 14 तकनीकी आपत्तियाँ दर्ज की गईं।
मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र की अस्पष्ट प्रति: रजिस्ट्री ने कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र की प्रति स्पष्ट नहीं होने पर आपत्ति जताई। संबंधित दस्तावेज की साफ और पढ़ने योग्य प्रति उपलब्ध कराने को कहा गया।
कुछ पन्ने गायब और दस्तावेज अस्पष्ट: याचिका के साथ लगाए गए कुछ दस्तावेजों और पन्नों में कमियाँ पाई गईं। कुछ प्रतियाँ पर्याप्त रूप से पढ़ने योग्य नहीं थीं, जबकि कुछ आवश्यक पन्ने उपलब्ध नहीं थे।
₹220 कोर्ट फीस की कमी: याचिका दाखिल करते समय निर्धारित कोर्ट फीस में ₹220 की कमी पाई गई। रजिस्ट्री ने बकाया शुल्क जमा करने की आपत्ति दर्ज की।
नौ याचिकाकर्ताओं के वकालतनामों से जुड़ी कमी: रिपोर्टों के अनुसार, नौ याचिकाकर्ताओं के आवश्यक वकालतनामे या अधिकृत हस्ताक्षर संबंधी दस्तावेज निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उपलब्ध नहीं थे।
शपथपत्र और अन्य दस्तावेजों में खामियाँ: कुछ शपथपत्रों, सहायक दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड से संबंधित औपचारिकताओं पर भी आपत्तियाँ दर्ज की गईं।
प्रतिवादी बनाए जाने पर स्पष्टीकरण: चुनाव आयोग के साथ व्यक्तिगत चुनाव आयुक्तों को प्रतिवादी बनाने से संबंधित प्रक्रियागत सवाल भी उठाए गए।
इन आपत्तियों को दूर करना याचिकाकर्ताओं की कानूनी टीम की जिम्मेदारी है। तकनीकी कमियों को ठीक किए जाने के बाद याचिका को आगे की न्यायिक प्रक्रिया के तहत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है।
इस संयुक्त याचिका में विभिन्न विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं की भागीदारी है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इनमें कांग्रेस के राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव, तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के संजय राउत, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सुप्रिया सुले, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी.
राजा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एम. ए. बेबी, झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माजी और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के ई. टी. मोहम्मद बशीर शामिल हैं।
विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के पुनरीक्षण से संबंधित अपनी चिंताओं को न्यायिक मंच के माध्यम से उठाने का रास्ता अपनाया है।
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मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, विपक्ष की याचिका में मुख्य रूप से मतदाता सूचियों की निष्पक्षता, आयोग की जवाबदेही और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ी राहत माँगी गई है।
SIR प्रक्रिया की निष्पक्षता की जाँच: विपक्ष ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए हैं और प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की माँग की है।
पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने की व्यवस्था: जिन योग्य मतदाताओं के नाम कथित रूप से अनुचित तरीके से हटाए गए हैं, उनके मामलों की समीक्षा कर उन्हें नियमानुसार मतदाता सूची में दोबारा शामिल करने की व्यवस्था सुनिश्चित करने की माँग की गई है।
स्वतंत्र जाँच समिति: विपक्ष ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति गठित करने की माँग की है। प्रस्तावित समिति में तकनीकी विशेषज्ञों और अन्य स्वतंत्र सदस्यों को शामिल करने की बात भी सामने आई है।
चुनाव आयोग के फैसलों में पारदर्शिता: याचिका में आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं और महत्वपूर्ण फैसलों में संस्थागत जवाबदेही तथा सभी चुनाव आयुक्तों की उचित भागीदारी सुनिश्चित करने की माँग की गई है।
इन माँगों पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना है।
मतदाता सूची और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े मुद्दों पर विपक्षी नेताओं ने दिल्ली में विरोध प्रदर्शन और मार्च भी किया था। राहुल गांधी सहित विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं ने इन मुद्दों को सार्वजनिक रूप से उठाया।
विपक्षी प्रतिनिधिमंडल की मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात के प्रयास को लेकर भी खबरें सामने आई थीं। इसके बाद अपनी शिकायतों को औपचारिक याचिका के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया में रखने का रास्ता अपनाया गया।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि किसी न्यायाधीश या मुख्य न्यायाधीश से व्यक्तिगत मुलाकात के बजाय औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया के जरिए अदालत के समक्ष मामला प्रस्तुत करना सामान्य कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है।
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने संकेत दिया कि आवश्यक प्रक्रियागत कमियाँ दूर होने के बाद संबंधित मामलों को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इस तारीख तक विपक्ष की संयुक्त याचिका की औपचारिक सुनवाई शुरू नहीं हुई थी।
इसलिए रजिस्ट्री की 14 आपत्तियों को याचिका खारिज होने, विपक्ष के आरोप गलत साबित होने या चुनाव आयोग के पक्ष में अदालत का फैसला आने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
अब विपक्ष की कानूनी टीम को रजिस्ट्री द्वारा बताई गई दस्तावेजी और प्रक्रियागत कमियों को दूर करना होगा। इसके बाद याचिका को न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है।
इस मामले में अहम सवाल यह होगा कि मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया में पारदर्शिता, पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े विपक्ष के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट क्या रुख अपनाता है।
फिलहाल यह मामला प्रक्रियागत चरण में है और विपक्ष के आरोपों के गुण-दोष पर कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
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