नई दिल्ली में आयोजित GST काउंसिल की 57वीं बैठक में टैक्स दरों में बदलाव के बजाय नियमों और कागजी कार्रवाई को आसान बनाने (Ease of Doing Business) पर मुख्य जोर दिया जा रहा है। सितंबर 2026 में 2.03 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड टैक्स कलेक्शन से उत्साहित सरकार ने 5 सूत्रीय सुधार योजना तैयार की है।
देश में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी GST लागू हुए अब नौ साल से ज़्यादा का समय बीत चुका है। इस दौरान टैक्स का सिस्टम काफ़ी हद तक स्थिर हो गया है और सरकार की तिज़ोरी में टैक्स का पैसा भी हर महीने अच्छे आंकड़े छू रहा है। ऐसे माहौल में आज, यानी 8 अक्टूबर को नई दिल्ली में GST काउंसिल की 57वीं बैठक हो रही है।
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इस बार टैक्स जानकारों और कारोबारियों का मानना है कि सरकार को टैक्स की दरें (टैक्स रेट्स) घटाने या बढ़ाने के बजाय नियमों को आसान बनाने और रोज़मर्रा के झंझटों को खत्म करने पर पूरा ध्यान देना चाहिए। वित्त मंत्रालय के सूत्रों ने भी यह साफ़ कर दिया है कि इस बैठक में टैक्स दरों में बदलाव पर कोई चर्चा नहीं होगी, बल्कि व्यापारियों और कंपनियों के लिए कामकाज को सुगम बनाने पर बात होगी।
1 जुलाई 2026 को देश में GST व्यवस्था ने अपने 9 साल पूरे कर लिए हैं। इस लंबे सफ़र में काउंसिल की कुल 56 बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें टैक्स स्लैब तय किए गए और राज्यों को मिलने वाला मुआवज़ा भी सफलता से दिया गया।
हाल ही में सितंबर 2026 में GST कलेक्शन में 14.7% की ज़बरदस्त बढ़त दर्ज की गई और कुल वसूली 2.03 लाख करोड़ रुपये के बड़े आंकड़े को पार कर गई। टैक्स एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब सरकार की कमाई इतनी मज़बूत स्थिति में है, तो अब सरकार को यह डर नहीं होना चाहिए कि नियमों में ढील देने से उसकी कमाई घट जाएगी। इसलिए यह सही मौका है जब छोटे और बड़े व्यापारियों की पुरानी परेशानियों को दूर किया जाए।
केंद्र सरकार ने इस बैठक के लिए पांच अहम बिंदुओं का एक सुधार प्लान तैयार किया है। इसका मक़सद देश में कारोबार करना और आसान बनाना है:
एक राज्य में रजिस्ट्रेशन, पूरे देश में बिज़नेस:
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मौजूदा नियम के मुताबिक, अगर कोई व्यापारी कई राज्यों में सामान बेचना चाहता है, तो उसे हर राज्य में अलग से GST नंबर लेना पड़ता है। अब यह प्रस्ताव रखा गया है कि एक कंपनी को सिर्फ़ एक ही राज्य में रजिस्ट्रेशन कराना पड़े और वह पूरे भारत में बिना किसी नई कागज़ी कार्रवाई के कारोबार कर सके।
ऑडिट का झंझट होगा खत्म:
अभी अलग-अलग राज्यों के टैक्स अफ़सर एक ही कंपनी की जांच अलग-अलग तरीके से करते हैं। इससे व्यापारियों को बार-बार एक जैसे दस्तावेज़ दिखाने पड़ते हैं और मुक़दमेबाज़ी बढ़ती है। नए प्रस्ताव के तहत पूरे देश के लिए एक जैसी जांच और ऑडिट की व्यवस्था बनेगी, जिससे समय और पैसे दोनों की बचत होगी।
रिफंड में तेज़ी और आसानी:
सामान बाहर भेजने वाले व्यापारियों (एक्सपोर्टर्स) का बहुत सारा पैसा टैक्स रिफंड में फंसा रहता है। जानकारों का कहना है कि सिस्टम ऐसा होना चाहिए कि रिफंड अपने आप बिना किसी देरी के सीधे व्यापारी के बैंक खाते में आ जाए। इससे कंपनियों के पास रोज़मर्रा के खर्च के लिए पैसों की तंगी नहीं होगी।
ऑफिस और बिज़नेस के खर्चों पर टैक्स छूट (ITC):
अभी तक कई ऐसे सामान्य खर्च होते हैं जिन पर व्यापारियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट (टैक्स छूट) नहीं मिलती। नियम सख्त होने के कारण यह लागत सीधे सामान की कीमत बढ़ा देती है। अब इस नियम (सेक्शन 17(5)) को आसान बनाकर बिज़नेस के लगभग सभी पक्के खर्चों पर टैक्स क्रेडिट देने की तैयारी है।
ई-कॉमर्स और सर्विस सेक्टर के नियम सरल करना:
इंटरनेट के ज़रिए सामान बेचने वालों और सर्विस देने वाले छोटे उद्यमियों के लिए नियमों को बहुत सरल बनाया जाएगा ताकि उन्हें बार-बार नोटिस और शिकायतों का सामना न करना पड़े।
टैक्स विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भले ही सिस्टम ऑनलाइन हो चुका है, लेकिन आज भी एक आम व्यापारी के लिए कई नियम समझना बहुत सिरदर्द भरा है।
अक्सर इस बात पर भ्रम पैदा हो जाता है कि किसी ख़ास सामान पर 12% टैक्स लगेगा या 18%। अलग-अलग राज्यों के अधिकारी एक ही चीज़ पर अलग राय रखते हैं, जिससे व्यापारियों को अदालत और दफ़्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। जानकारों की राय है कि टैक्स के मौजूदा कई स्लैब को समेटकर ज़्यादा से ज़्यादा तीन स्लैब कर देने चाहिए और अतिरिक्त सेस (Cess) को पूरी तरह हटा देना चाहिए।
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कुल मिलाकर, इस 57वीं बैठक से देश भर के व्यापारियों को बड़ी राहत की उम्मीद है। जब टैक्स भरने की प्रक्रिया बिना किसी डर और जटिलता के आसान हो जाएगी, तो देश में व्यापार तेज़ी से बढ़ेगा और सरकार की कमाई में भी अपने आप बढ़ोतरी होगी। बैठक खत्म होने के बाद काउंसिल के अंतिम फ़ैसलों का आधिकारिक ऐलान किया जाएगा।
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