दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) बढ़कर 187 पर पहुंच गया है, जो 'मध्यम' श्रेणी का उच्चतम स्तर और पिछले करीब तीन महीनों (83 दिनों) का सबसे अधिक स्तर है।
देश की राजधानी दिल्ली में एक बार फिर प्रदूषण का असर दिखने लगा है। पिछले कुछ हफ्तों से राहत महसूस कर रहे दिल्लीवासियों के लिए हवा की गुणवत्ता अब धीरे-धीरे बिगड़ने लगी है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के ताज़ा 24 घंटे के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) बढ़कर 187 पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा हवा की 'मध्यम' (Moderate) श्रेणी के सबसे ऊपरी हिस्से में आता है।
चिंता की बात यह है कि पिछले करीब तीन महीनों (83 दिनों) में यह दिल्ली में दर्ज किया गया सबसे ज्यादा AQI स्तर है।
सर्दियों की शुरुआत से ठीक पहले हवा का इस तरह खराब होना आने वाले दिनों के लिए बड़े संकेत दे रहा है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने दिल्ली में लगे कुल 46 मॉनिटरिंग स्टेशनों में से 43 स्टेशनों के आंकड़ों का अध्ययन करके यह रिपोर्ट जारी की है। इस जांच में सामने आया कि दिल्ली की हवा में सबसे ज्यादा नुकसान 'PM10' (धूल और मोटे कण) की वजह से हो रहा है। यही प्रदूषक इस समय पूरी दिल्ली की आबोहवा में सबसे प्रमुख बना हुआ है।
जब हवा में धूल-मिट्टी और धुएं के कण बढ़ जाते हैं, तो सांस लेना भारी होने लगता है। CPCB का कहना है कि 101 से 200 के बीच का AQI भले ही मध्यम माना जाता है, लेकिन यह फेफड़ों, अस्थमा और दिल की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए सांस लेने में परेशानी पैदा कर सकता है।
हवा कितनी साफ है या कितनी जहरीली, इसे नापने के लिए एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के पैमाने को छह हिस्सों में बांटा गया है:
0 से 50: अच्छा (Good) – हवा पूरी तरह साफ रहती है।
51 से 100: संतोषजनक (Satisfactory) – हवा में मामूली असर होता है।
101 से 200: मध्यम (Moderate) – बीमार लोगों को हल्की तकलीफ हो सकती है।
201 से 300: खराब (Poor) – ज्यादातर लोगों को सांस लेने में भारीपन महसूस होता है।
301 से 400: बहुत खराब (Very Poor) – लंबे समय तक बाहर रहने से सेहत बिगड़ने का खतरा रहता है।
401 से 500: गंभीर (Severe) – स्वस्थ इंसानों के लिए भी हवा खतरनाक हो जाती है।
दिल्ली के मुकाबले उसके आसपास के शहरों यानी एनसीआर (NCR) के इलाकों में हवा की हालत ज्यादा खराब हो गई है। कई शहर तो 'खराब' (Poor) श्रेणी में पहुंच चुके हैं:
नोएडा: यहां का AQI 281 दर्ज किया गया, जो 'खराब' श्रेणी के ऊपरी हिस्से में है।
गाजियाबाद: यहां AQI 248 रहा।
फरीदाबाद: यहां हवा का स्तर 224 दर्ज किया गया।
ग्रेटर नोएडा और गुरुग्राम: ग्रेटर नोएडा में AQI 171 और गुरुग्राम में 166 रिकॉर्ड हुआ, जो अभी दिल्ली की तरह मध्यम श्रेणी में हैं।
नोएडा, गाजियाबाद और फरीदाबाद में PM10 के साथ-साथ बेहद बारीक और खतरनाक कण यानी PM2.5 भी हवा को खराब करने के लिए जिम्मेदार पाए गए हैं।
प्रदूषण बढ़ने के पीछे मौसम का मिज़ाज भी एक बड़ी वजह है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, दिल्ली में इस समय सूखा और गर्म मौसम बना हुआ है। बारिश न होने और हवा की रफ्तार धीमी पड़ने से हवा में मौजूद धूल और धुआं एक ही जगह ठहरने लगे हैं।
रविवार को दिल्ली का अधिकतम तापमान 36.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ, जो इस मौसम के सामान्य स्तर से 2.2 डिग्री ज्यादा था। वहीं न्यूनतम तापमान 23.8 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से 1.5 डिग्री ज्यादा था। हवा में नमी (नमी का स्तर) 51 प्रतिशत रही और पिछले 24 घंटों में बारिश बिल्कुल नहीं हुई।
मौसम विभाग का कहना है कि सोमवार को आसमान साफ रहेगा, लेकिन मंगलवार को हल्की बारिश या गरज-चमक के साथ छींटे पड़ने की संभावना है। अगर बारिश होती है, तो हवा में घुली धूल धुल सकती है और लोगों को कुछ समय के लिए थोड़ी राहत मिल सकती है।
हैरानी की बात यह है कि पिछले महीने यानी सितंबर में दिल्ली की हवा पिछले 5 सालों में सबसे साफ रही थी। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मुताबिक, सितंबर 2026 में दिल्ली का औसत AQI सिर्फ 102 था।
जनवरी से सितंबर 2026 तक के आंकड़ों को देखें तो इस साल 194 दिन ऐसे रहे जब हवा का स्तर 200 से नीचे (मध्यम या उससे बेहतर) रहा। इसके अलावा इस साल 'खराब से बहुत गंभीर' श्रेणी वाले दिन घटकर सिर्फ 79 रह गए, जो पिछले पांच सालों में सबसे कम हैं।
हालांकि, अब अक्टूबर का महीना शुरू होते ही मौसम बदल रहा है। सर्दियों में जैसे ही तापमान गिरता है और धुंध बढ़ती है, प्रदूषण के कण जमीन के करीब जमने लगते हैं। इसके साथ ही खेतों में पराली जलने और वाहनों के धुएं से आने वाले दिनों में चुनौती और बढ़ सकती है।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) और सरकारी एजेंसियां हालात पर नज़र बनाए हुए हैं। निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के नियम, सड़कों पर पानी का छिड़काव और पुराने वाहनों पर निगरानी बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं ताकि सर्दियों के महीनों में हालात हाथ से बाहर न जाएं।
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