टाटा समूह के अंदर एक नया विवाद शुरू हो गया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के अनुसार टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट होना है (यानी अपना आईपीओ लाना है)। लेकिन टाटा समूह इस आईपीओ से बचना चाहता है।
भारत के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित व्यावसायिक घरानों में से एक टाटा समूह (Tata Group) के भीतर एक नया और बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। यह पूरा मामला टाटा संस (Tata Sons) के संभावित आईपीओ (IPO) यानी शेयर बाजार में लिस्टिंग और कंपनियों के आपस में मर्जर (Merger Plan) को लेकर है।
टाटा ट्रस्ट्स के दो वरिष्ठ वाइस चेयरमैन—वेणु श्रीनिवासन (Venu Srinivasan) और विजय सिंह (Vijay Singh)—ने टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा (Noel Tata) के उस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसके तहत दो सहायक कंपनियों को टाटा संस में मिलाकर शेयर बाजार में लिस्ट होने से बचने की योजना बनाई जा रही थी।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के कड़े नियमों के अनुसार, टाटा संस को 'अपर लेयर' गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC - Upper Layer) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। केंद्रीय बैंक के नियमानुसार इस श्रेणी की बड़ी कंपनियों को एक तय समयसीमा के भीतर शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य होता है, जिसके लिए उन्हें अपना आईपीओ (IPO) लाना पड़ता है।
टाटा संस इस शेयर बाजार की लिस्टिंग से हर हाल में बचना चाहती है। इसी कड़ी में, 28 सितंबर को नोएल टाटा की ओर से एक बड़ा मर्जर प्रस्ताव सामने आया।
इस योजना के तहत टाटा संस की दो पूरी तरह से अपनी मालिकाना हक वाली कंपनियों—टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस (Tata Electronics Systems Solutions) और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (Tata Consulting Engineers)—का विलय सीधे होल्डिंग कंपनी 'टाटा संस' में करने का प्रस्ताव रखा गया।
ऐसा करने के पीछे मकसद यह था कि कंपनी का ढांचा इस तरह बदल जाए कि उसे शेयर बाजार में लिस्ट होने की मजबूरी से राहत मिल सके।
टाटा ट्रस्ट्स के दोनों वाइस चेयरमैन—वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह—ने 30 सितंबर को सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) और सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) के बोर्ड को एक कड़ा पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने नोएल टाटा के काम करने के तरीके और इस फैसले पर कई बड़े सवाल खड़े किए हैं:
बिना सलाह के फैसला लेने का आरोप: दोनों वरिष्ठ ट्रस्टियों का कहना है कि उन्हें इस महत्वपूर्ण मर्जर प्लान और उससे जुड़ी प्रेस रिलीज की कोई जानकारी पहले नहीं दी गई थी। उन्हें इस बात का पता सार्वजनिक स्रोतों और मीडिया के जरिए चला। उनका साफ कहना है कि इस पूरे मामले में उनसे या अन्य ट्रस्टियों से कोई आधिकारिक मंत्रणा नहीं की गई।
बोर्ड की कोई बैठक नहीं बुलाई गई: पत्र में यह भी बताया गया कि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) की इस मुद्दे पर कोई औपचारिक बैठक ही आयोजित नहीं की गई थी। वहीं, सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) पर कानूनी और प्रशासनिक कारणों से बैठक बुलाने पर पहले से रोक थी, इसलिए ऐसी स्थिति में इस प्रस्ताव को पूरे 'टाटा ट्रस्ट्स' का आधिकारिक और संयुक्त फैसला नहीं माना जा सकता है।
पुराने फैसलों का गलत हवाला: नोएल टाटा की तरफ से 28 जुलाई 2025 के एक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया गया था, जिसमें कंपनी को प्राइवेट रखने की बात कही गई थी। इस पर दोनों वाइस चेयरमैन ने स्पष्ट किया कि वह अधिकार उस समय टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन (N Chandrasekaran) को विभिन्न विकल्प तलाशने के लिए दिया गया था, न कि नोएल टाटा को यह अधिकार था कि वह अकेले ही इस तरह का बड़ा मर्जर प्लान आगे बढ़ा दें।
आरबीआई (RBI) के बदले हुए नियम: 11 सितंबर 2026 को आरबीआई ने टाटा संस की उस अर्जी को सीधे तौर पर खारिज कर दिया था, जिसमें उसने खुद को एनबीएफसी श्रेणी से हटाने की मांग की थी। आरबीआई ने साफ निर्देश दिया था कि कंपनी तुरंत नियमों का पालन करे। इन नए और बदले हुए हालातों को देखते हुए 2025 के पुराने फैसले अब पूरी तरह लागू नहीं हो सकते।
दोनों वरिष्ठ ट्रस्टियों ने इस बात पर जोर दिया है कि हालांकि शेयरधारक अपनी राय या इच्छा व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन अंतिम और स्वतंत्र फैसला लेने का अधिकार पूरी तरह से टाटा संस के बोर्ड (Tata Sons Board) के पास होना चाहिए। बोर्ड के डायरेक्टर्स को किसी भी बाहरी दबाव के बिना इस पूरे रीऑर्गेनाइजेशन (पुनर्गठन) के कानूनी, नियामक, वित्तीय और कारोबारी प्रभावों को स्वतंत्र रूप से परखने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए।
वेणु श्रीनिवासन, जो टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर भी हैं, ने पहले भी कंपनी की लिस्टिंग का पुरजोर समर्थन किया था। उनका मानना है कि शेयर बाजार में लिस्टिंग होने से टाटा समूह के छोटे शेयरधारकों को बड़ा वित्तीय फायदा मिलेगा, शापूरजी पालोनजी ग्रुप (Shapoorji Pallonji Group) को अपनी हिस्सेदारी बाहर निकालने का एक साफ और कानूनी रास्ता मिल जाएगा, और साथ ही टाटा संस के पास अपने भविष्य के बड़े व्यापारिक विस्तार के लिए पर्याप्त पूंजी (Capital) भी उपलब्ध होगी।
इस पत्र में उद्योग जगत के दिग्गज रतन टाटा (Ratan Tata) के पुराने कार्यकाल और उनके सिद्धांतों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। उन्होंने याद दिलाया कि टाटा ट्रस्ट्स का मुख्य और पवित्र उद्देश्य हमेशा से समाज सेवा और परोपकार (Charitable work) करना रहा है, न कि सीधे तौर पर किसी बिजनेस को चलाना।
यदि ट्रस्ट इस तरह से कंपनियों के रोजमर्रा के कारोबारी फैसलों और मैनेजमेंट में दखल देना शुरू कर देगा, तो इससे ट्रस्ट के चैरिटेबल दर्जे और टाटा संस की साख, दोनों पर गंभीर आंच आ सकती है।
यह पूरा आंतरिक मतभेद अब सिर्फ बैठकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कानूनी रूप ले चुका है। वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने इस मामले को लेकर चैरिटी कमिश्नर के समक्ष अपनी अलग-अलग शिकायतें दर्ज करा दी हैं।
इसके जवाब में नोएल टाटा, उनके बेटे नेविल टाटा (Neville Tata) (जो खुद भी एक ट्रस्टी हैं), और टाटा संस में कुल 66% हिस्सेदारी रखने वाले 6 मुख्य ट्रस्टों ने किसी भी प्रतिकूल कानूनी आदेश से बचने के लिए कानून के विभिन्न प्रावधानों के तहत कुल 36 कैविएट (Caveats) दाखिल कर दी हैं।
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि टाटा समूह के भीतर नेतृत्व और कंपनी के भविष्य को लेकर रणनीतिक स्तर पर भारी खींचतान चल रही है। टाटा संस को शेयर बाजार की लिस्टिंग से बचाने का यह दूसरा बड़ा प्रयास था, लेकिन इस पर उठे इन नए सवालों ने समूह की आंतरिक कलह को पूरी तरह से उजागर कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि टाटा संस का बोर्ड और आरबीआई के कड़े नियमों का यह ऊंट किस करवट बैठता है।
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