आज के दौर में अगर कोई पूछे कि महात्मा गांधी को किस राजनीतिक खांचे में रखा जाए, तो जवाब आसान नहीं है। क्या वे एक दार्शनिक अराजकतावादी (Philosophical Anarchist) थे, जिन्होंने राज्य की सत्ता को कभी सर्वोपरि नहीं माना? या फिर एक ऐसे उदारवादी विचारक, जिनके लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता सरकार से भी बड़ी थी? बाल्टिक देशों की 'सिंगिंग क्रांति' से लेकर 'अरब स्प्रिंग' तक, बापू के विचारों ने दुनिया भर के आंदोलनों को ऊर्जा दी है। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों (कॉकरोच जनता पार्टी) का प्रदर्शन यह साबित करता है कि गांधीवादी प्रतिरोध आज भी सबसे अचूक हथियार है।
"सच्चा लोकतंत्र सिर्फ संसद में नहीं, जनता के बेखौफ होकर सवाल पूछने में बसता है।" — महात्मा गांधी
आज के दौर में महात्मा गांधी को किसी एक दायरे में बांधना नामुमकिन है। क्या वे सिर्फ एक आदर्शवादी थे, या एक ऐसे इंसान जिनके लिए आम नागरिक की आज़ादी किसी भी सरकार से ऊपर थी? दुनिया के बड़े-बड़े आंदोलनों की तरह ही, दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों (कॉकरोच जनता पार्टी) का ताज़ा प्रदर्शन दिखाता है कि गांधी का तरीका आज के डिजिटल दौर में भी कितना असरदार है।
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गांधी जी की अहिंसा की बात आते ही हमें दक्षिण अफ्रीका याद आता है, लेकिन इसकी असली शुरुआत उनके छात्र जीवन में लंदन में हुई थी।
जंतर-मंतर पर छात्रों का प्रदर्शन किसी पारंपरिक नेता या पार्टी का मोहताज नहीं था।
| बात | पुरानी दलगत राजनीति | आज के युवाओं का तरीका |
|---|---|---|
| जुड़ाव | ऊपर से आदेश आना (पार्टी हाईकमान) | सोशल मीडिया और आपसी सूझबूझ |
| तरीका | तोड़फोड़, भाषण और शक्ति-प्रदर्शन | शांतिपूर्ण धरना, अनशन और सवाल |
| अंदाज़ | भारी-भरकम और डरा हुआ माहौल | मज़ाक, मीम्स, व्यंग्य और निडरता |
| मकसद | कुर्सी या सत्ता हासिल करना | गलत नीतियों को जनता के सामने लाना |
गांधी जी का सबसे बड़ा मंत्र था—डर को दिल से निकाल फेंकना।
गांधी जी के लिए राजनीति कुर्सी पाने का खेल नहीं, बल्कि लोगों के दर्द और दुख को कम करने का ज़रिया थी। आज जब विरोध के पुराने तरीके बेअसर हो रहे हैं, तो जंतर-मंतर के इन युवाओं ने साबित कर दिया कि गांधी के विचार आज भी पूरी तरह ज़िंदा हैं।
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