सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चेक बाउंस मामले में कानूनी नोटिस अगर आरोपी के सही पते पर रजिस्टर्ड डाक से भेजा गया है, तो परिवार के किसी सदस्य द्वारा नोटिस लेने पर भी उसकी सेवा मान्य मानी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में आरोपी को यह साबित करना होगा कि उसे नोटिस की जानकारी नहीं थी या नोटिस गलत पते पर भेजा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत भेजा गया मांग नोटिस सही पते पर रजिस्टर्ड डाक से भेजा गया है, तो उसे केवल इस वजह से गलत नहीं माना जा सकता कि नोटिस खुद चेक जारी करने वाले व्यक्ति ने नहीं, बल्कि उसके परिवार के किसी सदस्य ने लिया था। कोर्ट ने साफ किया कि सही पते पर नोटिस भेजे जाने के बाद उसके पहुंचने की कानूनी धारणा बनती है। सुप्रीम कोर्ट ने 30 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए केरल हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने सिर्फ इस आधार पर आरोपी की सजा खत्म कर दी थी कि नोटिस उसे व्यक्तिगत रूप से नहीं मिला था और उसकी मां ने उसे प्राप्त किया था।
क्या है पूरा मामला
यह मामला 3 लाख रुपये के कर्ज से जुड़ा था। कर्ज लेने वाले व्यक्ति ने भुगतान के लिए चेक दिया था, लेकिन चेक बैंक में जमा करने पर बाउंस हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने 31 अगस्त 2016 को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कानूनी नोटिस भेजा।
नोटिस रजिस्टर्ड डाक से आरोपी के सही पते पर भेजा गया था। यह नोटिस आरोपी की मां अमीना ने प्राप्त किया। नोटिस मिलने के बाद भी आरोपी की ओर से रकम का भुगतान नहीं किया गया और न ही नोटिस का कोई जवाब दिया गया।
ट्रायल कोर्ट ने 10 जुलाई 2019 को आरोपी को दोषी मानते हुए छह महीने की साधारण जेल और 3 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके बाद अपीलीय अदालत ने भी 16 फरवरी 2023 को इस सजा को बरकरार रखा।
मामला जब केरल हाई कोर्ट पहुंचा तो उसने आरोपी की सजा रद्द कर दी। हाई कोर्ट का कहना था कि धारा 138 के प्रावधान के तहत नोटिस आरोपी को खुद मिलना चाहिए था। चूंकि नोटिस उसकी मां ने लिया था, इसलिए कानूनी नोटिस की शर्त पूरी नहीं हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को सही नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता की जिम्मेदारी यह है कि कानूनी नोटिस आरोपी के सही पते पर भेजा जाए।
सही पते पर रजिस्टर्ड डाक से नोटिस भेजे जाने के बाद उसके पहुंचने की कानूनी धारणा बनती है। इसके बाद आरोपी को यह साबित करना होगा कि उसे नोटिस की जानकारी नहीं थी, पता गलत था या डाक से जुड़ी जानकारी सही नहीं थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता से यह साबित करने की उम्मीद नहीं की जा सकती कि आरोपी ने नोटिस वास्तव में अपने हाथ में लिया या जानबूझकर उसे लेने से बचा।
मां ने नोटिस लिया, फिर भी सेवा क्यों मानी गई?
इस मामले में नोटिस जिस पते पर भेजा गया था, वही पता बाद की कानूनी कार्रवाई में भी आरोपी की ओर से इस्तेमाल किया गया। अदालत में पेश होने के लिए भेजा गया समन भी इसी पते पर पहुंचा था। इसके अलावा आरोपी के वकालतनामा, अपील और रिवीजन याचिकाओं में भी यही पता दर्ज था। धारा 313 Cr.P.C. के तहत दिए गए बयान में भी आरोपी ने इस पते को गलत नहीं बताया था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया कि आरोपी और उसकी मां अलग-अलग रहते थे या उनके बीच ऐसा संबंध था कि मां को मिला नोटिस आरोपी तक पहुंच ही नहीं सकता था।
C.C. Alavi Haji फैसले का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2007 के तीन जजों वाली पीठ के फैसले C.C. Alavi Haji बनाम Palapetty Muhammed का भी हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया था कि अगर नोटिस सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा गया है, तो धारा 138 के तहत नोटिस देने की शर्त पूरी मानी जा सकती है। आरोपी के पास इस कानूनी धारणा को गलत साबित करने का मौका रहता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केरल हाई कोर्ट ने M.D. Thomas बनाम P.S. Jaleel के 2009 के फैसले पर भरोसा किया था। उस मामले में भी नोटिस आरोपी की पत्नी ने लिया था। लेकिन उस फैसले में C.C. Alavi Haji के तीन जजों वाली पीठ के फैसले पर ध्यान नहीं दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने** M.D. Thomas** के फैसले को कानून के तय सिद्धांतों पर ध्यान नहीं देने वाला फैसला माना और कहा कि उस पर भरोसा करना सही नहीं था।
आरोपी को क्या साबित करना होगा?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के अनुसार, अगर कानूनी नोटिस सही पते पर भेजा गया है तो सिर्फ यह कहना काफी नहीं होगा कि नोटिस खुद आरोपी ने नहीं लिया था। आरोपी को यह बताना और साबित करना होगा कि पता सही नहीं था, उसे नोटिस की जानकारी नहीं हुई या डाक से जुड़ी जानकारी गलत थी। इस मामले में आरोपी का पता सही था और उसी पते पर बाद की अदालत की कार्रवाई से जुड़े दस्तावेज भी पहुंचे। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नोटिस की सेवा को केवल इस आधार पर गलत नहीं कहा जा सकता कि उसे आरोपी की मां ने प्राप्त किया था।
क्या है धारा 138 का मामला
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 चेक बाउंस से जुड़े मामलों में लागू होती है। जब किसी चेक का भुगतान नहीं होता और कानून में तय शर्तों के अनुसार नोटिस भेजा जाता है, तो उसके बाद भुगतान न होने पर आपराधिक मामला सामने आ सकता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर कानूनी नोटिस की सेवा से जुड़े सवाल पर फैसला दिया। कोर्ट ने शिकायतकर्ता के पक्ष में अपील मंजूर करते हुए केरल हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।
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