फेफड़ों के कैंसर का नाम सुनते ही आमतौर पर दिमाग में उम्रदराज और धूम्रपान करने वाले व्यक्ति की तस्वीर आती है। लेकिन रासिका बोम्बटकर की कहानी बताती है कि यह बीमारी हमेशा इसी तरह सामने नहीं आती। वह कम उम्र की थीं, फिट थीं और धूम्रपान भी नहीं करती थीं। इसके बावजूद उन्हें फेफड़ों का कैंसर हुआ और इसकी पहचान तब हुई, जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी थी।
फेफड़ों के कैंसर का नाम सुनते ही आमतौर पर दिमाग में उम्रदराज और धूम्रपान करने वाले व्यक्ति की तस्वीर आती है। लेकिन रासिका बोम्बटकर की कहानी बताती है कि यह बीमारी हमेशा इसी तरह सामने नहीं आती। वह कम उम्र की थीं, फिट थीं और धूम्रपान भी नहीं करती थीं। इसके बावजूद उन्हें फेफड़ों का कैंसर हुआ और इसकी पहचान तब हुई, जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी थी।
करीब चार साल पहले मानसून के दौरान रासिका को लगातार खांसी रहने लगी। शुरुआत में डॉक्टरों को इसमें ज्यादा चिंता की बात नहीं लगी। उनकी कम उम्र और धूम्रपान न करने की वजह से उन्हें फेफड़ों के कैंसर के सामान्य मरीज की तरह नहीं देखा गया।
खांसी दो हफ्ते बाद भी ठीक नहीं हुई तो रासिका दोबारा डॉक्टर के पास गईं। इस बार उन्हें एक जागरूकता अभियान से भी मदद मिली। अभिनेता अमिताभ बच्चन से जुड़े इस अभियान में लोगों को लंबे समय तक रहने वाली खांसी की स्थिति में टीबी की जांच कराने के लिए जागरूक किया गया था।
लेकिन उनकी परेशानी का कारण टीबी नहीं था। लक्षण शुरू होने के करीब दो महीने बाद डॉक्टरों ने आखिरकार उन्हें फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित पाया। तब तक कैंसर फेफड़ों से निकलकर लिम्फ नोड्स (लसीका ग्रंथियों) तक फैल चुका था। लिम्फ नोड से लिए गए सैंपल में भी कैंसर की पुष्टि हुई।
CT Scan कराने पर सामने आई पूरी तस्वीर रासिका ने बताया कि उन्होंने खुद CT Scan कराने पर जोर दिया था। डॉक्टरों ने उन्हें बिना जरूरत स्कैन कराने के संभावित साइड इफेक्ट के बारे में समझाया था, लेकिन वह जांच कराने पर अड़ी रहीं।
रासिका उस समय क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर में फिजियोथेरेपिस्ट के तौर पर काम कर रही थीं। हेल्थ सेक्टर से जुड़ी होने के कारण वह खुद बीमारी के बारे में जानकारी जुटा सकीं और अस्पताल में जांच कराने पर जोर दे सकीं।
CT Scan के बाद स्थिति साफ हो गई और पता चला कि कैंसर पहले ही फेफड़ों से आगे बढ़ चुका था। युवा और गैर-धूम्रपान करने वालों में क्यों छूट सकता है कैंसर? रासिका का मामला इस बात पर ध्यान दिलाता है कि फेफड़ों का कैंसर केवल बुजुर्ग या धूम्रपान करने वाले लोगों की बीमारी नहीं है। जब किसी युवा और गैर-धूम्रपान करने वाले व्यक्ति में लगातार खांसी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, तो शुरुआत में डॉक्टरों के लिए कैंसर की संभावना कम लग सकती है।
यही वजह है कि ऐसे मरीजों में सही बीमारी तक पहुंचने में समय लग सकता है। स्क्रीनिंग कार्यक्रम भी आमतौर पर उन लोगों पर ज्यादा ध्यान देते हैं जिनमें उम्र और धूम्रपान के कारण फेफड़ों के कैंसर का खतरा अधिक माना जाता है।
रासिका की कहानी इसी अंतर को सामने लाती है। उनकी लगातार बनी रहने वाली खांसी को शुरुआत में कैंसर से नहीं जोड़ा गया, लेकिन बाद में CT Scan ने वह बीमारी सामने ला दी, जिसकी पहचान पहले नहीं हो सकी थी।
यह मामला यह भी बताता है कि लगातार बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि हर लंबे समय की खांसी कैंसर का संकेत नहीं होती, लेकिन अगर समस्या बनी रहती है तो डॉक्टर से दोबारा सलाह लेना जरूरी है।
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