सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतरात्मा या धार्मिक मान्यता के कारण वंदे मातरम् नहीं गाने वाले व्यक्ति को सजा नहीं दी जानी चाहिए। कोर्ट ने केंद्र से 1986 के उस फैसले को ध्यान में रखने को कहा, जिसमें राष्ट्रगान नहीं गाने वाले बच्चों के अधिकारों की रक्षा की गई थी। मामला गायक टीएम कृष्णा की याचिका से जुड़ा है, जिसमें 2026 के कानून और वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपनी अंतरात्मा या धार्मिक मान्यता के कारण वंदे मातरम् गाने से मना करता है, तो उसे सजा नहीं दी जानी चाहिए। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि इस मामले में 1986 के उस फैसले को ध्यान में रखा जाए, जिसमें राष्ट्रगान नहीं गाने वाले स्कूली बच्चों के अधिकारों की रक्षा की गई थी।
यह मामला कर्नाटक संगीत गायक टीएम कृष्णा की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने 2026 में बदले गए कानून और गृह मंत्रालय के कुछ आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनका कहना है कि वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों को गाने की बात देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे से जुड़े सवाल खड़े करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा और कहा कि 1986 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जो बात कही गई थी, उसे इस मामले में भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
1986 के बिजो एमैनुएल बनाम केरल सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन स्कूली बच्चों की रक्षा की थी, जिन्होंने अपनी अंतरात्मा के कारण राष्ट्रगान गाने से मना किया था। बच्चों ने राष्ट्रगान के दौरान सम्मान बनाए रखा था।
जस्टिस बागची ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक आजादी से जुड़े अपने अधिकारों के कारण वंदे मातरम् गाने से मना करता है, तो उसे केवल इस वजह से सजा नहीं दी जानी चाहिए।
वंदे मातरम् को लेकर क्या है मामला? टीएम कृष्णा की याचिका में 1971 के राष्ट्रीय सम्मान के अपमान से रोकने वाले कानून की धारा 3 में 2026 में किए गए बदलाव को चुनौती दी गई है। इसके साथ ही गृह मंत्रालय की 28 जनवरी और 9 जुलाई 2026 की ओर से जारी किए गए आदेशों को भी चुनौती दी गई है।
बदली हुई धारा 3 के तहत अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत गाने से जानबूझकर रोकता है या ऐसे कार्यक्रम में परेशानी पैदा करता है, तो उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
कोर्ट ने साफ किया कि वह इस समय यह तय नहीं कर रहा है कि देश का राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए। जस्टिस बागची ने कहा कि यह फैसला करना सरकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था का काम है।
कोर्ट का ध्यान इस बात पर है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यता या अंतरात्मा के कारण वंदे मातरम् गाने से मना करता है, तो क्या उसके अधिकार सुरक्षित हैं।
याचिकाकर्ता ने उठाए ये सवाल टीएम कृष्णा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एस. मुरलीधर ने कहा कि बदले गए कानून में 'राष्ट्रीय गीत' की साफ परिभाषा नहीं दी गई है। उनका कहना था कि इससे आगे चलकर कानून के गलत इस्तेमाल की गुंजाइश बन सकती है।
वकील ने यह भी कहा कि वंदे मातरम् को लेकर पहले से चली आ रही समझ उसके पहले दो अंतरों से जुड़ी थी। उन्होंने सवाल उठाया कि अब सभी छह अंतरों को आधिकारिक रूप से गाने की बात किस आधार पर तय की गई।
याचिका में यह भी कहा गया है कि वंदे मातरम् और राष्ट्रगान दोनों गाए या बजाए जाने की स्थिति में वंदे मातरम् को पहले रखने की बात भी चुनौती के दायरे में है।
केंद्र सरकार ने क्या कहा? केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका पर नोटिस जारी करने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस मामले को लेकर ऐसी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जिससे यह मुद्दा जरूरत से ज्यादा बड़ा बन जाए।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों के बीच तीखी बहस भी हुई। मेहता ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि धर्मनिरपेक्षता को इतना सीमित नहीं देखा जा सकता।
इसके बाद मुरलीधर ने एक टिप्पणी पर आपत्ति जताई और उसे वापस लेने की मांग की। मेहता ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि कानून बनाने की प्रक्रिया संविधान के अनुसार होनी चाहिए।
इस बहस पर कोर्ट ने कोई फैसला नहीं दिया और कहा कि वह इन टिप्पणियों को रिकॉर्ड में नहीं ले रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब मुख्य सवाल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट अभी वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों को राष्ट्रीय गीत मानने या न मानने पर फैसला नहीं कर रहा है। कोर्ट का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि धार्मिक मान्यता या अंतरात्मा के कारण गीत गाने से मना करने वाले व्यक्ति के साथ कानून के तहत क्या किया जा सकता है।
कोर्ट ने केंद्र से 1986 के बिजो एमैनुएल फैसले को ध्यान में रखने की बात कही है। आगे की सुनवाई में इस मामले से जुड़े कानूनी सवालों पर और चर्चा हो सकती है।
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