धरती के बढ़ते तापमान का असर अब ध्रुवीय इलाकों की बर्फ पर साफ दिखाई दे रहा है। एक नई वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, 1979 से 2023 के बीच ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से करीब 12.5 ट्रिलियन टन (11.3 ट्रिलियन मीट्रिक टन) बर्फ कम हो गई। यह मात्रा इतनी ज्यादा है कि अगर इस पूरी बर्फ को पिघलाकर पानी की जगह जमा किया जाए तो इससे पूरे अमेरिका की जमीन पर करीब 1.5 मीटर यानी 5 फीट मोटी बर्फ की परत बनाई जा सकती है।
धरती के बढ़ते तापमान का असर अब ध्रुवीय इलाकों की बर्फ पर साफ दिखाई दे रहा है। एक नई वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, 1979 से 2023 के बीच ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से करीब 12.5 ट्रिलियन टन (11.3 ट्रिलियन मीट्रिक टन) बर्फ कम हो गई। यह मात्रा इतनी ज्यादा है कि अगर इस पूरी बर्फ को पिघलाकर पानी की जगह जमा किया जाए तो इससे पूरे अमेरिका की जमीन पर करीब 1.5 मीटर यानी 5 फीट मोटी बर्फ की परत बनाई जा सकती है।
यह अध्ययन Scientific Data जर्नल में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार, धरती के गर्म होने के साथ दोनों प्रमुख ice sheets से बर्फ तेजी से कम हो रही है। खास बात यह है कि बर्फ के नुकसान का करीब पांच-छठा हिस्सा केवल गर्म हवा के कारण नहीं, बल्कि समुद्र के गर्म पानी के कारण हो रहा है। गर्म समुद्री पानी बर्फ की चादरों को नीचे और किनारों से तेजी से पिघला रहा है और ग्लेशियरों को समुद्र की ओर धकेल रहा है। पिघली बर्फ ने समुद्र का स्तर कितना बढ़ाया?
वैज्ञानिकों के अनुसार, पिघली हुई बर्फ से करीब 3 क्वाड्रिलियन गैलन यानी 11.3 क्वाड्रिलियन लीटर पानी समुद्र में पहुंचा। इससे 1979 के बाद से दुनिया के औसत समुद्री जलस्तर में लगभग 3.1 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हुई है।
पहली नजर में 3.1 सेंटीमीटर बहुत छोटा आंकड़ा लग सकता है, लेकिन इसका असर बड़ा है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका Ines Otosaka के अनुसार, समुद्र के जलस्तर में हर करीब 1 सेंटीमीटर बढ़ोतरी से दुनिया में 20 से 30 लाख अतिरिक्त लोग साल में कम से कम एक बार बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं।
ग्रीनलैंड का Jakobshavn Glacier भी तेजी से पीछे हट रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह ग्लेशियर अब एक दिन में करीब 50 मीटर तक पीछे जा रहा है।
पहले स्थिर थी बर्फ, फिर तेजी से शुरू हुआ नुकसान वैज्ञानिकों ने 45 अलग-अलग सर्वे और 27 satellites से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल किया है। पहले वैज्ञानिक ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में बर्फ के बदलाव को मुख्य रूप से 1990 के दशक से देख पा रहे थे। लेकिन NASA satellites के आंकड़ों को शामिल करने के बाद वैज्ञानिक अंटार्कटिका में 1979 और ग्रीनलैंड में 1972 तक के बदलावों को भी समझ सके।
Disclaimer
Disclaimer :
Images are for illustrative purposes only and some editing of images done by using AI. अस्वीकरण: इस्तेमाल की गई तस्वीरें केवल जानकारी/उदाहरण के उद्देश्य से हैं और तस्वीरों में कुछ बदलाव या एडिटिंग AI की मदद से की गई है।
Published by: Zoya. For newsroom standards, byline transparency, and correction requests, review our editorial standards and corrections policy.
Need to contact the newsroom directly? Email netgramnews@gmail.com or visit the team page.
अध्ययन से पता चला कि 1970, 1980 और 1990 के दशक की शुरुआत तक दोनों ice sheets अपेक्षाकृत स्थिर थीं। इसके बाद बर्फ का नुकसान बढ़ने लगा और 2010 के दशक में यह तेजी से बढ़ गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह बदलाव जलवायु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। चिंता की बात यह भी है कि अगर दुनिया तापमान बढ़ने की प्रक्रिया को रोक भी दे, तब भी बर्फ की चादरों में हो रहे बदलावों का असर कई दशकों तक जारी रह सकता है।
2020 से 2023 के बीच दिखी थोड़ी राहत अध्ययन में 2020 से 2023 के बीच बर्फ के नुकसान की तेजी में थोड़ी कमी दिखाई दी। लेकिन वैज्ञानिक इसे लंबे समय के बदलाव में कोई बड़ा सुधार नहीं मानते। उनके अनुसार, यह कुछ समय के मौसम संबंधी बदलावों का असर हो सकता है।
अंटार्कटिका में इस दौरान पूर्वी हिस्से में रिकॉर्ड स्तर की बर्फबारी हुई। इससे वहां जमा हुई अतिरिक्त बर्फ ने पश्चिमी अंटार्कटिका में हो रहे तेज बर्फ नुकसान की कुछ भरपाई कर दी। वैज्ञानिकों ने इसे लंबे समय की गिरावट में केवल एक अस्थायी बदलाव माना है।
वैज्ञानिकों को किस बात की सबसे ज्यादा चिंता है? वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ धीरे-धीरे पिघलती बर्फ नहीं, बल्कि dynamic ice loss है। इसका मतलब है कि बर्फ का समुद्र की ओर तेजी से खिसकना और टूटना। ऐसी प्रक्रिया अचानक तेज हो सकती है और ice sheets की स्थिरता पर बड़ा असर डाल सकती है।
अध्ययन में शामिल वैज्ञानिक Eric Rignot के अनुसार, ध्रुवीय इलाकों की बर्फ तेजी से कम हो रही है और इसका असर दुनिया भर में समुद्र के बढ़ते स्तर के रूप में दिखाई दे रहा है। दूसरे वैज्ञानिकों ने भी कहा है कि अंटार्कटिका में बर्फ के नुकसान की भविष्य की दिशा अभी एक बड़ी चुनौती है।
इस अध्ययन से साफ है कि ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ में बदलाव केवल ध्रुवीय इलाकों की समस्या नहीं है। बर्फ के पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ता है, जिसका सीधा असर दुनिया के तटीय इलाकों और वहां रहने वाली बड़ी आबादी पर पड़ सकता है।
ग्रीनलैंड की बर्फ पिघली, अंटार्कटिका की बर्फ, 12.5 ट्रिलियन टन बर्फ, ग्लेशियर पिघलना, समुद्र का जलस्तर, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, पृथ्वी का बढ़ता तापमान, समुद्री स्तर बढ़ना, बर्फ पिघलने का असर
Greenland ki barf pighalna, Antarctica ki barf, 12.5 trillion ton ice loss, glacier melting, samundar ka jalstar, climate change, global warming, dharti ka badhta temperature, sea level rise, barf pighalne ka asar
47 saal mein Greenland aur Antarctica se kitni barf pighli, 12.5 trillion ton ice loss ka samundar par asar, Greenland Antarctica ice melting and sea level rise, climate change se glaciers kyon pighal rahe hain, Antarctica mein barf pighalne ka duniya par asar, 1979 se 2023 tak ice sheet loss
Climate Change, Global Warming, Greenland, Antarctica, Glacier, Ice Sheet, Sea Level Rise, Environment, Science News, Earth, NASA Satellites, Climate News, NetGramNews, NetGram News