माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण अब सिर्फ पानी और समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती की मिट्टी में भी एक गंभीर खतरे के रूप में सामने आ रहा है। पांच साल तक चले एक अंतरराष्ट्रीय शोध में पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक मिट्टी में ‘ट्रोजन हॉर्स’ की तरह काम कर सकता है। यानी ये छोटे प्लास्टिक कण अपने साथ प्रदूषक, कीटनाशक और बैक्टीरिया को मिट्टी के अंदर पहुंचा सकते हैं।
माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण अब सिर्फ पानी और समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती की मिट्टी में भी एक गंभीर खतरे के रूप में सामने आ रहा है। पांच साल तक चले एक अंतरराष्ट्रीय शोध में पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक मिट्टी में ‘ट्रोजन हॉर्स’ की तरह काम कर सकता है। यानी ये छोटे प्लास्टिक कण अपने साथ प्रदूषक, कीटनाशक और बैक्टीरिया को मिट्टी के अंदर पहुंचा सकते हैं।
यूरोपीय संघ की मदद से किए गए Minagris Research Project में 11 यूरोपीय देशों के 227 कृषि क्षेत्रों की जांच की गई और सभी जगह मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह प्रदूषण खेती के मौजूदा तरीकों के साथ-साथ जमीन के पुराने इस्तेमाल से भी जुड़ा हो सकता है और लंबे समय तक मिट्टी में बना रह सकता है।
शोध में यह भी सामने आया कि माइक्रोप्लास्टिक कीटनाशकों और पशु चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली दवाओं जैसे दूसरे कृषि प्रदूषकों के साथ मिलकर अलग तरह का असर पैदा कर सकता है। स्विट्जरलैंड में किए गए एक अध्ययन में जिन खेतों में टायर घिसने से निकलने वाले कण ज्यादा मिले, वहां अन्य जहरीले रसायनों और धातुओं की मात्रा भी ज्यादा पाई गई।
माइक्रोप्लास्टिक की सतह पर सूक्ष्म जीवों के लिए एक नया वातावरण बन सकता है, जिसे ‘प्लास्टिस्फीयर’ कहा जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन जगहों पर प्लास्टिक, सूक्ष्म जीव और कृषि रसायनों के बीच ज्यादा संपर्क होता है। यहां एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट जीन की मात्रा भी सामान्य स्थिति की तुलना में बढ़ी हुई मिली। कीटनाशक इस प्रभाव को और बढ़ा सकते हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, माइक्रोप्लास्टिक के कण जितने छोटे होते हैं, वे प्रदूषकों, सूक्ष्म जीवों और DNA को अपनी सतह पर उतना ही ज्यादा जमा कर सकते हैं। इससे रोग फैलाने वाले जीवों और एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन के फैलने का खतरा बढ़ सकता है।
इसका असर मिट्टी के जीवों पर भी पड़ सकता है। एक अध्ययन में पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक का यह प्रभाव केंचुओं और अन्य मिट्टी के जीवों की महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। वहीं, पौधों पर भी इसका असर देखा गया। ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक वाली मिट्टी में लेट्यूस के पत्तों का क्षेत्रफल, क्लोरोफिल, प्रकाश संश्लेषण की क्षमता और पौधे का कुल बायोमास कम पाया गया। सूखे की स्थिति में यह असर और ज्यादा दिखाई दिया।
शोध की एक अहम बात यह भी है कि बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक को हर स्थिति में सुरक्षित नहीं माना जा सकता। अध्ययन में पाया गया कि ये प्लास्टिक भी टूटकर माइक्रोप्लास्टिक बना सकते हैं और इससे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि मिट्टी में पहुंच चुके माइक्रोप्लास्टिक को हटाना बेहद मुश्किल है। इसलिए मिट्टी की सेहत और लंबे समय तक खाद्य उत्पादन को सुरक्षित रखने के लिए प्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी, निर्माताओं से पूरी जानकारी और माइक्रोप्लास्टिक के साथ दूसरे प्रदूषकों के संयुक्त प्रभाव का आकलन जरूरी है।
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