चांद की सतह पर वैज्ञानिकों को एक ऐसा विशाल गड्ढा मिला है, जो रोम के मशहूर कोलोसियम से भी बड़ा है। हैरानी की बात यह है कि यह गड्ढा बहुत पुराना नहीं है, बल्कि करीब दो साल पहले एक बेहद शक्तिशाली उल्कापिंड के चांद से टकराने के कारण बना था। उस समय इस घटना को दूरबीनों से सीधे नहीं देखा जा सका था। अब NASA की पुरानी तस्वीरों की जांच से वैज्ञानिकों को इस घटना का पता चला है।
चांद की सतह पर वैज्ञानिकों को एक ऐसा विशाल गड्ढा मिला है, जो रोम के मशहूर कोलोसियम से भी बड़ा है। हैरानी की बात यह है कि यह गड्ढा बहुत पुराना नहीं है, बल्कि करीब दो साल पहले एक बेहद शक्तिशाली उल्कापिंड के चांद से टकराने के कारण बना था। उस समय इस घटना को दूरबीनों से सीधे नहीं देखा जा सका था। अब NASA की पुरानी तस्वीरों की जांच से वैज्ञानिकों को इस घटना का पता चला है।
इस नए क्रेटर की खोज NASA के Lunar Reconnaissance Orbiter (LRO) ने की है। LRO लंबे समय से चांद की सतह की तस्वीरें ले रहा है। वैज्ञानिकों ने जब अलग-अलग समय में ली गई इन तस्वीरों की तुलना की, तो चांद की सतह पर एक नया और बड़ा बदलाव नजर आया। जांच के बाद पता चला कि यह बदलाव किसी सामान्य घटना का नतीजा नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली उल्कापिंड के टकराने से बना विशाल क्रेटर है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस क्रेटर की चौड़ाई करीब 728 फीट है, जबकि इसकी गहराई लगभग 141 फीट तक है। इतने बड़े आकार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी चौड़ाई एक विशाल स्टेडियम जैसी संरचना के बराबर है। यही कारण है कि इसे हाल के समय में सौर मंडल में किसी टक्कर से बना सबसे बड़ा ज्ञात क्रेटर माना जा रहा है।
इतनी बड़ी टक्कर कितनी दुर्लभ है? चांद पर छोटे-बड़े उल्कापिंड लगातार गिरते रहते हैं और इनसे उसकी सतह पर नए गड्ढे बनते रहते हैं। लेकिन हर टक्कर इतनी शक्तिशाली नहीं होती कि सैकड़ों फीट चौड़ा और गहरा क्रेटर बना दे। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि चांद पर इस आकार का क्रेटर बनाने वाली घटना लगभग 132 साल में सिर्फ एक बार होती है।
यानी जिस टक्कर ने यह नया गड्ढा बनाया, वह सामान्य अंतरिक्ष घटना नहीं थी। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने का मौका मिलेगा कि बड़े उल्कापिंड चांद की सतह से टकराने पर कितनी ऊर्जा पैदा करते हैं और उस टक्कर का आसपास की जमीन पर किस तरह असर पड़ता है। दूरबीनों से क्यों नहीं दिखा था?
इस खोज का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि जिस समय उल्कापिंड चांद से टकराया, उस समय इस घटना को दूरबीनों से नहीं देखा जा सका। ऐसी घटनाएं बहुत कम समय में होती हैं और उन्हें सही समय पर देख पाना मुश्किल होता है। लेकिन बाद में NASA के Lunar Reconnaissance Orbiter द्वारा ली गई तस्वीरों ने इस घटना का सुराग दे दिया।
पुरानी और नई तस्वीरों की तुलना करके वैज्ञानिक यह पता लगा सकते हैं कि चांद की सतह में कहां और कितना बदलाव आया है। इसी प्रक्रिया में इस नए क्रेटर की पहचान हुई। यह दिखाता है कि अंतरिक्ष में हुई किसी घटना को उसी समय देखना जरूरी नहीं है, क्योंकि बाद की तस्वीरों से भी उसके निशान खोजे जा सकते हैं।
चांद के भविष्य के मिशनों के लिए क्यों जरूरी है यह खोज? चांद पर भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बेस बनाने की तैयारी चल रही है। ऐसे में वहां की सतह को अच्छी तरह समझना बेहद जरूरी है। चांद पर उल्कापिंडों की टक्कर एक ऐसी प्राकृतिक घटना है, जिसे भविष्य के मिशनों में ध्यान में रखना होगा।
यह नया क्रेटर वैज्ञानिकों को चांद की सतह पर होने वाली शक्तिशाली टक्करों के बारे में बेहतर जानकारी दे सकता है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि ऐसी घटनाएं कितनी बार होती हैं और उनसे सतह पर किस तरह के बदलाव आते हैं।
चांद देखने में भले ही शांत और स्थिर नजर आता हो, लेकिन उसकी सतह पर अंतरिक्ष से आने वाले उल्कापिंड लगातार निशान छोड़ते रहते हैं। NASA की तस्वीरों से मिला यह नया क्रेटर उसी सक्रिय अंतरिक्ष वातावरण की एक झलक देता है और यह भी बताता है कि चांद की सतह के बारे में अभी बहुत कुछ खोजा जाना बाकी है।
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