सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग सैनिकों की पेंशन और अन्य लाभों से जुड़े 270 से अधिक मामलों में केंद्र सरकार की अपीलें खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सैनिकों को लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में नहीं उलझना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग सैनिकों को मिलने वाले पेंशन और दूसरे लाभों से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय के रुख पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने सरकार की ओर से दायर 270 से ज्यादा अपीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सैनिकों को लंबे समय तक अदालतों के चक्कर नहीं लगाने चाहिए।
नई दिल्ली में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने 2015 की रक्षा मंत्री रिपोर्ट का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि कई दिव्यांग सैनिकों को तकनीकी कारणों से दिव्यांगता लाभ नहीं मिल पा रहे हैं। रिपोर्ट में ऐसे मामलों से जुड़ी अपील वापस लेने की बात कही गई थी, लेकिन कोर्ट ने कहा कि इस सिफारिश को पूरी तरह लागू नहीं किया गया।
270 से ज्यादा सरकारी अपीलें खारिज सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि सरकार की ओर से दिव्यांग सैनिकों से जुड़े करीब 271 सिविल अपील और विशेष अनुमति याचिकाएं सामने आईं। इनमें से ज्यादातर मामले तय समय के बाद दाखिल किए गए थे। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के कई मामलों को पहले भी समय सीमा के कारण खारिज किया जा चुका है।
पीठ ने यह भी कहा कि मेडिकल बोर्ड के फैसले के बाद पहली अपील में खारिज होने वाले मामलों की संख्या, स्वीकार किए जाने वाले मामलों से काफी ज्यादा है। इसी वजह से कोर्ट ने सरकार की ओर से दायर 270 से ज्यादा अपीलों को खारिज कर दिया।
आरटीआई से मिली जानकारी का भी अदालत ने जिक्र किया। इसके अनुसार पहली अपील वाली संस्था के सामने 2,997 अपील आई थीं। इनमें 2,855 अपील खारिज हुईं, जबकि सिर्फ 142 अपील स्वीकार की गईं। दूसरी अपील वाली संस्था के सामने 456 मामले पहुंचे। इनमें 439 खारिज हुए और केवल 17 मामले स्वीकार किए गए।
दिव्यांग सैनिकों के लाभ का मामला सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग सैनिकों को मिलने वाले पेंशन और दूसरे लाभों से जुड़े नियमों को भी देखा। अदालत ने 2008 के Entitlement Rules पर विचार किया, जिन्हें 2010 में लागू किया गया था। इन नियमों ने 1982 के पुराने नियमों की जगह ली थी।
पुराने नियमों में यह माना जाता था कि अगर कोई सैनिक सेना में शामिल होते समय पूरी तरह स्वस्थ था और सेवा से बाहर आते समय उसे कोई दिव्यांगता हो गई, तो सामान्य तौर पर उसे सैन्य सेवा से जुड़ा माना जा सकता है।
2008 के नियमों में इस बात को बदलते हुए यह जोड़ा गया कि दिव्यांगता और सैन्य सेवा के बीच संबंध होना जरूरी है। केवल सेना में रहते हुए किसी बीमारी के सामने आने से यह अपने आप साबित नहीं होता कि बीमारी सेना की सेवा के कारण हुई है या सेवा के कारण बढ़ी है।
बीमारी का कारण साफ न हो तो क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के नियमों को सही माना। अदालत ने कहा कि नए नियमों में सेवा और दिव्यांगता के बीच संबंध की बात जोड़ने से नियमों का मूल फायदा खत्म नहीं होता।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर दिव्यांगता सेना की सेवा से जुड़ी नहीं है, तो इसे साबित करने की जिम्मेदारी कर्मचारी पर नहीं, बल्कि नियोक्ता यानी सरकार पर रहती है। अदालत ने कहा कि दिव्यांगता का कारण अगर पता नहीं है, तो उससे जुड़े नियमों के तहत उसे सैन्य सेवा से जुड़ा माना जा सकता है।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि सरकार ने पहले दिव्यांग सैनिकों से जुड़े ऐसे मामलों को वापस लेने की सिफारिश स्वीकार की थी। इसके बावजूद इस तरह की अपीलें जारी रहीं।
कोर्ट के फैसले से दिव्यांग सैनिकों के पेंशन और दूसरे लाभों से जुड़े मामलों में एक बार फिर सरकार की ओर से की जा रही कानूनी कार्रवाई पर ध्यान गया है। अदालत ने साफ किया कि ऐसे मामलों में नियमों को समझते समय सैनिकों को मिलने वाले लाभों से जुड़े प्रावधानों को भी ध्यान में रखना होगा।
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